जीएसटी के मारे, राज्य बेचारे!

अटल बिहारी वाजपेयी ने एक समय कहा था कि जब जनता पार्टी बनी तो सबने अपनी-अपनी नौकाएं जला दीं और जनता पार्टी के जहाज पर सवार हो गए। बाद में जब जहाज पर सवार लोगों में झगड़े होने लगे और जहाज डूबने लगा तो सब बारी बारी से उस पर से कूदने लगे। जनता पार्टी के जहाज से कूदने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने भारतीय जनता पार्टी बनाई। उसके बाद की कहानी सबको पता है।

इसी तरह जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने ‘एक देश, एक कर’ का ढिंढोरा पीटते हुए आधी रात को संसद का सत्र बुला कर वस्तु व सेवा कर, जीएसटी लागू किया तब सभी राज्य अपनी अपनी नौकाएं जला कर जीएसटी के जहाज पर सवार हो गए थे। अब जीएसटी का यह जहाज डूब रहा है। जीएसटी की वसूली कभी भी इसके अनुमानित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाई थी और जहां तक पहुंची थी, वहां भी टिके रहना इसके लिए मुश्किल हो गया। इसी बीच कोरोना का संकट शुरू हुआ और जीएसटी की वसूली औसत पैमाने से भी नीचे चली गई। अब जो राज्य अपने-अपने कर स्रोतों की नाव जला कर इस जहाज पर सवार हुए थे उनको न तो इस पर सवारी करते बन रहा है और न कूद कर भागते बन रहा है।

जीएसटी की अनगिनत बैठकों के बाद तय हुआ था कि जीएसटी लागू होने के बाद केंद्र सरकार राज्यों को पहले से मिलने वाले कर राजस्व के ऊपर 14 फीसदी ज्यादा कर देगी। यह भी वादा किया गया कि अगर इतनी वसूली नहीं हो पाती है तो पांच साल तक केंद्र सरकार मुआवजा देकर नुकसान की भरपाई करेगी। इस शर्त पर राज्यों ने अपने सारे कर छोड़े थे और कर वसूली का जिम्मा केंद्र सरकार को सौंपा था। जैसे पुराने जमाने में राजे-महाराजे और छोटे सामंतों-ठिकानेदारों ने अपनी प्रजा से कर वसूलने का जिम्मा ईस्ट इंडिया कंपनी को दिया था कुछ-कुछ उसी तरह से राज्यों ने कर वसूली का जिम्मा केंद्र सरकार को दे दिया। अब केंद्र सरकार कह रही है कि राज्य सरकारें मुआवजा भूल जाएं क्योंकि वह तय फार्मूले के हिसाब से राजस्व का बंटवारा करने में सक्षम नहीं है।

केंद्र सरकार ने संसदीय समिति के सामने यह बात कही है। मंगलवार को वित्त सचिव ने वित्त विभाग की स्थायी समिति को बताया कि सरकार जीएसटी कौंसिल में तय किए गए राजस्व बंटवारे के फार्मूले के हिसाब से राज्यों को मुआवजा देने की स्थिति में नहीं है। सवाल है कि केंद्र सरकार संसद से मंजूर कानून से कैसे पीछे हट सकती है? इसका जवाब देते हुए वित्त सचिव ने कहा कि अगर जीएसटी वसूली एक निश्चित लक्ष्य से कम रहती है तो जीएसटी कानून में तय किए गए मुआवजा देने के प्रावधान को बदला जा सकता है।

असल में संकट यह है कि अर्थव्यवस्था की बिगड़ती स्थिति के कारण जीएसटी का संग्रह बहुत कम हो गया है। इसमें 40 फीसदी तक की कमी आने की खबर है। जीएसटी के ऊपर लगाए गए उपकर में भी बड़ी गिरावट आई है। यह स्थिति कोरोना से पहले ही शुरू हो गई थी और अब स्थिति भयावह हो गई है। खुद वित्त सचिव ने संसदीय समिति के सामने स्वीकार किया कि देश में आर्थिक मंदी के चलते जीएसटी का राजस्व और उपकर की वसूली कम हो रही है। हालांकि न उन्होंने यह स्वीकार किया है और न सरकार में कोई मानेगा कि ऐसा नवंबर 2016 में किए गए नोटबंदी की वजह से हुआ है। सरकार के उस एक फैसले ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी और सब जानते हैं कि टूटी हुई कमर से साथ आप सीधे खड़े नहीं हो सकते हैं, घसीट-घसीट कर चाहे जितना चल लें! सो, भारत की अर्थव्यवस्था उसी समय से खुद को घसीट रही है।

इस घसीटती अर्थव्यवस्था की पीठ पर सवार हुए राज्य अब किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। केंद्र सरकार के यहां मुआवजे के रूप में उनके हजारों करोड़ रुपए बकाया हैं। एक आकलन के मुताबिक वित्त वर्ष 2019-20 का बकाया मुआवजा 70 हजार करोड़ रुपए है। अगर राज्यों को यह पैसा नहीं मिला तो वे बरबाद होंगे। कोरोना संकट से उनकी राजस्व वसूली इतनी कम हो गई है कि उनके पास अपने कर्मचारियों का वेतन और पेंशन देने के पैसे नहीं हैं। राज्यों ने कर के अपने सारे स्रोत केंद्र के हवाले किए हुए हैं। उनके पास सिर्फ पेट्रोलियम उत्पाद और शराब पर कर वसूली का अधिकार है। कोरोना संकट में इन उत्पादों की बिक्री करीब तीन महीने तक तो लगभग पूरी तरह से बंद रही और अब भी इतनी बिक्री नहीं हो रही है कि इससे उनका काम चले।

अब सवाल है कि राज्य क्या करेंगे? क्या वे आसानी से केंद्र को राजस्व बंटवारे का फार्मूला बदलने देंगे? केरल के वित्त मंत्री थॉमस इसाक ने कहा है कि सभी राज्य मिल कर केंद्र को एकतरफा फैसला करने से रोकेंगे। मुआवजे के नियम को बदलने की वित्त सचिव की बात पर इसाक का कहना है कि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने बताया है कि जीएसटी कौंसिल की गोवा बैठक में वित्त आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह ने मुआवजा फार्मूले पर फिर से विचार की बात कही थी, जिसे सभी राज्यों ने एक स्वर से खारिज कर दिया था। तभी इसाक को भरोसा है कि जब यह मामला जीएसटी कौंसिल में आएगा तो राज्य इसे पास नहीं होने देंगे। जीएसटी कौंसिल में केंद्र के पास एक-चौथाई वोट की ताकत है और राज्यों के पास बचे हुए तीन-चौथाई वोट हैं। कौंसिल में कोई भी फैसला मंजूर कराने के लिए तीन-चौथाई वोट की जरूरत होती है। पर इसाक शायद यह भूल रहे हैं कि केंद्र सरकार जब तय कर लेगी कि उसे मुआवजे का नियम बदलना है तो भाजपा शासित राज्यों की मजबूरी होगी कि वे उसका समर्थन करें। उन्होंने देखा नहीं कि कैसे लोक लेखा समिति में भाजपा के सदस्यों ने एकजुट होकर पीएम केयर्स फंड की जांच रूकवाई!

केंद्र सरकार भाजपा और सहयोगियों के शासन वाले राज्यों को मजबूर करेगी कि वे फार्मूला बदलने के फैसले का समर्थन करें क्योंकि केंद्र की अब ऐसी स्थिति नहीं है कि वह राज्यों को मुआवजा दे सके। एक अनुमान के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में जिस दर से जीएसटी की वसूली घट रही है उसके हिसाब से केंद्र को इस साल 4.1 लाख करोड़ रुपए का मुआवजा देना होगा। केंद्र सरकार कहां से यह पैसा लाएगी? उसके पास तो रेलवे के कर्मचारियों को पेंशन देने के लिए 55 हजार करोड़ रुपए नहीं हैं और उसका जुगाड़ करना भारी पड़ रहा है तो वह राज्यों को देने के लिए चार लाख दस हजार करोड़ रुपए कहां से लाएगी? तभी वह किसी तरह से मुआवजा देने वाले फार्मूले को बदलने का प्रयास करेगी और तब जीएसटी कौंसिल में जंग छिड़ेगी। विपक्षी पार्टियों की सरकारें किसी हाल में यह फार्मूला नहीं बदलने दे सकती हैं क्योंकि उन्होंने तो अपने सारे स्रोत केंद्र को दे दिए हैं। केंद्र ने तय हिसाब से पैसा नहीं दिया तो राज्य कंगाल हो जाएंगे। सो, उनके सामने दो ही रास्ते हैं या तो केंद्र तय फार्मूले के हिसाब से पैसे दे या फिर वे जीएसटी के जहाज से कूद कर भागें!

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