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महंगाई रोकने की चुनौती

चुनौती मूल्य नियंत्रण के उपाय करके यह सुनिश्चित करने की है कि टैक्स कटौती के लाभ आम उपभोक्ता तक पहुंचे। ऐसा नहीं हुआ, तो राजकोष की कीमत पर कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा, जबकि महंगाई जस की तस बनी रहेगी। 

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर शक्तिकांत दास ने उचित ही यह कहा कि आरबीआई जून में फिर से ब्याज दरें बढ़ाएगा, यह समझने के लिए बहुत ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है। अब जबकि यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) ने भी ब्याज दरों बारे में अपनी नीति को पलटने का एलान दिया है, तो पारंपरिक समझ के अनुसार भारत जैसे उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के सामने इसके अलावा कोई चारा भी नहीं रह गया है। अब तक दुनिया के वित्तीय और मौद्रिक बाजार अमेरिकी सेंट्रल बैंक- फेडरल रिजर्व के ब्याज दरें बढ़ाने से हिचकोले खा रहे थे। ईसीबी की नीति अब एक नई स्थिति पैदा करेगी। गौरतलब है कि ईसीबी ने 2014 से नकारात्मक ब्याज दर की नीति अपना रखी थी। इस वक्त वहां ब्याज दर माइनस 0.5 प्रतिशत है। यानी सौ रुपये बैंक में रखने पर जमाकर्ता को 50 पैसे का ब्याज देना पड़ता है। लेकिन अब ईसीबी की प्रमुख क्रिस्टीन लगार्ड ने कहा है कि ये नीति समाप्त की जा जाएगी। संभावना जताई गई है कि शुरुआत में ईसीबी अगले जुलाई में ब्याज दर में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी करेगा।

ये खबर आते ही यूरोपियन यूनियन क्षेत्र की मुद्रा यूरो के भाव में बढ़ोतरी देखी गई, जिसमें यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से लगातार गिरावट का रुख था। बहरहाल, यह भारत जैसे देश के लिए नई चुनौती है। इसका परिणाम यह होगा कि निवेशकों को अब यहां से पैसा निकाल कर लगाने के लिए अमेरिका के अलावा एक और बाजार मिल जाएगा। ऐसे में आरबीआई का ब्याज दर बढ़ाने की राह पर आगे बढ़ना एक स्वाभाविक अनुमान है। मगर असल सवाल यह है कि क्या उससे भारत में महंगाई रोकने में मदद मिलेगी? शक्तिकांत दास ने कहा है कि आरबीआई ब्याज दर बढ़ाने के साथ ही कुछ वित्तीय उपायों की घोषणा भी करेगा। मसलन, अभी जैसे पेट्रोल-डीजल और कुछ आयातों पर टैक्स घटाया गया है, वैसे कदम और उठाए जा सकते हैँ। बहरहाल, चुनौती मूल्य नियंत्रण के उपाय करके यह सुनिश्चित करने की है कि ऐसी कटौतियों के लाभ आम उपभोक्ता तक पहुंचे। ऐसा नहीं हुआ, तो राजकोष की कीमत पर कंपनियों का मुनाफा बढ़ जाएगा, जबकि महंगाई जस की तस बनी रहेगी।

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