खेती में बदलती प्राथमिकताएं

कोरोना महामारी का एक असर यह हुआ है कि विकास नीति के मामलों में दुनिया की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। स्थानीय उत्पादन और खेती अब विभिन्न देशों की प्राथमिकताओं में ऊपर आ गए हैं। इसकी एक झलक पिछले दिनों देखने को मिली, जब यूरोपीय देशों के बीच पूरे यूरोपीय संघ पर लागू होने वाले कृषि सुधारों पर सहमति बन गई। उनके कृषि मंत्रियों की बैठक में बड़े स्तर पर बदलाव लाने की जरूरत महसूस की गई। उसके बीच सबसे ज्यादा ध्यान इसे पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के लिहाज से मुफीद बनाने पर रहा। नई कृषि नीति को संघ के सभी 27 देशों ने स्वीकार कर लिया है। ईयू के सभी सदस्य देशों और यूरोपीय संसद को अब से लेकर अगले साल के बीच इस नीति के तहत आने वाले सभी नियम तय करने होंगे। उसके बाद जनवरी 2023 से नई नीति अनिवार्य रूप से लागू हो जाएगी। 2021 से शुरु कर पहले दो सालों तक इसका पायलट फेज चलेगा।

नई कृषि नीति को पहले से ज्यादा ‘ग्रीन, फेयर और सिम्पल’ बताया गया है। यूरोपीय संघ ने नई कृषि नीति के तहत लाए जाने सुधारों के मद में अगले सात सालों में 387 अरब यूरो खर्च करने का बजट तय किया है। साझा कृषि नीति पर खर्च होने वाला यह ईयू के कुल बजट का सबसे बड़ा हिस्सा होगा। नई नीति में तय किया गया है कि अगर किसान सरकारों से वित्तीय मदद लेना चाहेंगे, तो उन्हें पर्यावरण के लिहाज से और भी ज्यादा सख्त नियमों का पालन करना होगा।  जलवायु परिवर्तन की रफ्तार, जैव विविधता में ह्रास, मिट्टी का क्षरण और जल प्रदूषण जैसी समस्याएं दिन पर दिन गंभीर होती जा रही हैं। यही कारण है कि कृषि नीति में बड़े बदलावों की जरूरत महसूस की जा रही थी। यूरोपीय परिषद ने सन 2018 में कृषि सुधारों की एक विस्तृत रूपरेखा पेश की थी, जिसे 2021 से 2027 के बीच लागू किए जाने का प्रस्ताव था। अब इसमें पहले दो सालों को पायलट फेज मानने और फिर 2023 से इसे अनिवार्य बनाने पर सहमति बन गई है। इसी साल मई में यूरोपीय परिषद ने ‘फार्म टू फोर्क’ रणनीति पेश की थी जिसका मकसद ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देना और खेती में कीटनाशकों और रासायनिक उत्पादों के इस्तेमाल को कम करना था। इन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए तमाम विस्तृत नियम भी नई साझा कृषि नीति का भी हिस्सा होंगे।

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