साइबर बुलीइंग की गंभीर समस्या

भारत में हर दस में एक बच्चा साइबर दादागीरी (बुलीइंग) की चपेट में आता है। इनमें से आधे बच्चे ऐसे हैं जो अपने साथ हो रही ऑनलाइन बदतमीजी या बदमाशी की शिकायत अपने परिजनों, शिक्षकों या अन्य कानूनी संस्थाओं या कंपनियों से कर पाते। या तो वो इसे समझते नहीं हैं या फिर इतने भयभीत हो जाते हैं कि शिकायत की हिम्मत नहीं जुटा पाते। एक हालिया अध्ययन से सामने आया कि 13-18 साल के करीब 28 प्रतिशत वे बच्चे जो चार घंटों से ज्यादा इंटरनेट पर थे, वे बुलीइंग के शिकार ज्यादा बने। उनमें से सिर्फ 35 प्रतिशत बच्चे ही एनसीईआरटी से प्रकाशित इंटरनेट सेफ्टी गाइड के बारे में जानते हैं या उससे परिचित हैं। बच्चो और किशोरों के कल्याण के लिए गठित स्वयंसेवी संस्था- चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई)- ने पिछले दिनों दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में एक सर्वे किया था। इस रिपोर्ट से सोशल मीडिया दौर की नई भयावहता का अंदाजा लगता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि साइबर प्रताड़ना के मामले में भारत के अलावा ब्राजील और अमेरिका वैश्विक सूची में सबसे ऊपर के तीन देश हैं। अंतरराष्ट्रीय एजेंसी प्यू के 2007 के एक अध्ययन के मुताबिक 32 प्रतिशत किशोर साइबर प्रताड़ना के शिकार बनते हैं। उसके मुताबिक 80 प्रतिशत किशोर नियमित रूप से मोबाइल फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और इनमें से अधिकतर किसी न किसी रूप में साइबर बुलीइंग झेलते हैं। यूनिसेफ के आंकड़ों के मुताबिक वैश्विक स्तर पर हर तीन में एक इंटरनेट यूजर बच्चा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2017 से 2018 की एक साल की अवधि में साइबर अपराधों में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखी गई। साइबर बुलीइंग का अर्थ है कंप्यूटर, लैपटॉप, स्मार्टफोन, टैबलेट आदि किसी डिजीटल उपकरण के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म या चैटरूप या गेमिंग के प्लेटफॉर्म पर किसी यूजर को (खासकर बच्चों और किशोरों और महिलाओं) अश्लील, आपत्तिजनक टेक्स्ट, वीडियो, ऑडियो, ग्राफिक्स या चित्र भेजना, गलत तथ्य देना, मानहानि करना, ब्लैकमेल, अफवाह फैलाना, और मानसिक रूप से उसे प्रताड़ित करना। इसके अलावा ऑनलाइन गालीगलौज या अपशब्दों के जरिए बदतमीजी या दुर्व्यवहार, किसी की निजी सूचना लीक करना आदि भी साइबर बुलीइंग के दायरे में आते हैं। साइबर स्टॉकिंग यानी यूजर की ऑनलाइन गतिविधियों को टटोलने की प्रवृत्ति भी साइबर बुलीइंग का हिस्सा मानी जाती है। सवाल यह है कि इन सबसे बच्चों को कैसे बचाया जाए? अपने देश में इसके कोई इंतजाम नजर नहीं आते।

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