चीन के लिए सबक

हांगकांग ने स्थानीय चुनावों के जरिए वहां की सरकार और उसके साथ ही चीन को स्पष्ट संदेश दे दिया है। इन चुनावों को लेकर काफी समय तक दुविधा बनी हुई थी। हांगकांग की चीफ एग्जिक्यूटिव कैरी लाम ने कई बार कहा था कि अगर हिंसक प्रदर्शन जारी रहे, तो चुनाव रोक दिए जाएंगे। हालांकि चुनाव के दिन शांति रही। यहां तक कि जब कैरी लाम खुद भी अपना वोट डालने गईं तब पोलिंग स्टेशन के बाहर प्रदर्शनकारियों ने कोई नारेबाजी या प्रदर्शन नहीं किया। इन चुनावों में लोकतंत्र समर्थक उम्मीदवारों ने भारी सफलता हासिल की है। जबकि सरकार समर्थक खेमे ने करारी शिकस्त का मुंह देखा। इससे पहले कभी भी हांगकांग में इतनी बड़ी संख्या में लोग वोट डालने के लिए नहीं निकले थे। यह दिखाता है कि हांगकांग के लोग अपनी अपनी बात कहने के लिए कितने बेसब्र थे।

चुनावों से पहले इस बात के लिए बड़े कयास लग रहे थे कि कई महीनों से जारी सरकार विरोधी प्रदर्शनों के लिए अब कितना समर्थन लोगों में रह गया है। दोनों तरफ से पिछले कुछ हफ्तों में भारी हिंसा हुई। अब जिला चुनाव के नतीजों ने साफ तौर पर इसका जवाब दे दिया है कि जनमत किस तरफ है। ये साफ है कि प्रदर्शनों के अभियान के लिए अब भी लोगों का समर्थन मजबूत है। साथ ही एक और बात बड़ी मजबूती से साफ हो गई है कि हांगकांग के लोग कैरी लाम और उनके कामकाज से पूरी तरह असंतुष्ट हैं। अब सवाल है कि हांगकांग के भविष्य पर इन चुनावों के नतीजे का क्या असर होगा? जिला परिषदें केवल स्थानीय कामों के लिए जिम्मेदार होती हैं और राजनीति में इनका कोई खास दखल नहीं होता। साथ ही 2022 में जब हांगकांग के नए चीफ एग्जिक्यूटिव का चुनाव होगा, तो अनुमान है कि उस पर भी जिला परिषद के चुनावों का बहुत मामूली असर ही होगा। वजह यह है कि शहर के नेता का चुनाव करने वाली 1,200 सदस्यों की चुनाव कमेटी में अब भी चीन समर्थक ताकतों का बोलबाला है। बहरहाल, ये भी साफ है कि स्थानीय चुनावों के इतने स्पष्ट नतीजों के बाद सरकार के लिए हांगकांग के लोगों की मांग पर ध्यान देना होगा। वरना, उसके लिए आगे और मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। चीन की सरकार को भी इससे सबक मिला है। जन भावनाओं की अनदेखी उसके लिए महंगी पड़ सकती है। मगर सवाल है कि क्या चीन सरकार ये सबक लेगी?

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