ये टकराव गंभीर है

भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर- खासकर लद्दाख क्षेत्र में- टकराव ने गंभीर रूप ले लिया है। जानकारों में इस बार लगभग आम सहमति है कि इस बार का टकराव गुजरे वर्षों के आम तनाव की तरह नहीं है। अक्सर कहा जाता है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दोनों देशों की समझ अलग है, इसलिए उनके फौजी जब-तब उस स्थान का उल्लंघन कर जाते हैं, जिसे दूसरा देश अपना समझता है। मगर इस बार चीनी फौजियों की तैनाती अधिक समन्वित और योजनाबद्ध दिख रही है। इस आधार पर भारतीय सेना के सूत्रों ने भी मीडिया से कहा है कि चीनी फौज के जमाव के पीछे ऊपरी कमान का निर्देश है। यानी ये स्थानीय मामला नहीं है। तो प्रश्न है कि आखिर इन दिनों लद्दाख और सिक्किम में भारतीय और चीनी सेना के सैनिकों के बीच इतना तनाव क्यों है? गुजरे कुछ हफ्तों में दोनों पक्षों के बीच झड़प के कम से कम चार प्रकरण हो चुके हैं। पांच मई को लद्दाख में और नौ मई को सिक्किम में दोनों तरफ के सिपाहियों के बीच हाथा-पाई तक हो गई थी। अब बताया जा रहा है कि लद्दाख के पांगोंग सो तालाब में चीनी सेना ने गश्ती नावों की संख्या बढ़ा दी है।

भारत और चीन के बीच की सीमा रेखा को लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी कहा जाता है। दोनों देशों की सीमा 4000 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी है। यह भारत के पांच उत्तरी और पूर्वोत्तर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से होकर गुजरती है। लद्दाख में एलएसी करीब 134 किलोमीटर पांगोंग सो झील के बीच से गुजरती है। भारतीय सेना झील में करीब 45 किलोमीटर के इलाके पर पहरा देती है। इस इलाके में सीमा को लेकर झड़पों और छिट-पुट वारदात का लंबा और गंभीर इतिहास है। अतीत में होता यह रहा है कि साल के इन महीनों में सीमा पर सैनिक एक दूसरे की सीमा में प्रवेश कर जाते रहे हैं। ऐसा शायद इसलिए होता रहा है कि बर्फ पिघलने की वजह से दोनों सेनाएं अपनी अपनी तरफ से सीमा तक गश्त लगाने के लिए ज्यादा बार पहुंचती हैं। मगर इस बार के टकराव की एक पृष्ठभूमि है। कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चों पर भारत-चीन संबंधों में तनाव हाल में बढ़ा है। मुमकिन है कि इसकी झलक एलएसी पर मिल रही हो। इसलिए ताजा तनाव को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।

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