पर चीन है पाकिस्तान का सगा! - Naya India
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पर चीन है पाकिस्तान का सगा!

इमरान खान फिर चीन पहुंच रहे हैं। उनकी चीन यात्रा किस मकसद से है, इसे समझना मुश्किल नहीं है। मामूली बात नहीं जो इस सप्ताह चीन के राष्ट्रपति शी से पाकिस्तान और भारत दोनों के प्रधानमंत्री मिल रहे हंै। ध्यान रहे सप्ताहांत में चीन के राष्ट्रपति शी का भारत आ कर महाबलीपुरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनौपचारिक गूफ्तगूं का अपुष्ट कार्यक्रम है। तभी मोदी-शी की मुलाकात से ठीक पहले इमरान खान का बीजिंग जाना चौंकाने वाला है। इसके पीछे मोदी-शी की मुलाकात में फच्चर डालने की रणनीति भी संभव है। बीजिंग में इमरान खान की बातचीत के वक्त पाकिस्तानी सेना के प्रमुख बाजवा वहां होंगे। वैसे खबर अनुसार इमरान खान अपने साथ उन मंत्रियों, अधिकारियों को ले गए है जो चीन के कॉरिडोर को बनवाने के प्रभारी है। कॉरिडोर में काफी जगह काम अटका हुआ है। उस नाते चीन को खुश करने के लिए, कश्मीर के अपने सियासी एजेंडे में उसे प्रतिबद्ध बनाने के दोनों उद्देश्यों पर इमरान खान राष्ट्रपति शी से बात कर सकते हंै। उनकी यह कूटनीति फिर प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी की बातचीत को प्रभावित करने वाली होगी।

भारत सरकार ने मोदी-शी मुलाकात की तैयारियां की हुई है। चीन की तरफ से पक्की पुष्टी नहीं है लेकिन विदेश मंत्रालय आश्वस्त है कि राष्ट्रपति शी भारत आएंगे। खबर है कि वे भारत से फिर नेपाल जाएंगे। सवाल है कि पांच अगस्त को अनुच्छेद-370 खत्म होने के बाद से अब तक चीन जब पूरी तरह पाकिस्तान के साथ खड़ा हुआ है तो इमरान खान अपने विदेश मंत्री, सेना प्रमुख को बीजिंग ले जा कर और क्या सहमति चाहते है? चीन का रूख सौ टका पाकिस्तान परस्त है। उसने सभी वैश्विक मंचों, अपने वक्तव्यों में पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाया है। भारत के खिलाफ बोलने, भारत को चेताने, चिंता जाहिर करने का चीनी रूख दो टूक है। विदेश मंत्री जयशंकर ने बीजिंग जा कर चीन को पटाने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी। यदि शी इस सप्ताह भारत आए तो निश्चित ही प्रधानमंत्री मोदी भी उन्हे समझाने, पटाने की वह हर संभव कोशिश करेंगे जो बस में है।

उस नाते गौरतलब तथ्य है कि पर्दे के पीछे की कूटनीति में भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए चीन और सऊदी अरब वे दो अंहम देश है जो कश्मीर पर हो रही कूटनीति में भारी मतलब लिए हुए है। ये दोनों देश नैसर्गिक तौर पर पाकिस्तान के साथ हैं। दोनों का पाकिस्तान से पुराना भाईचारा है। मगर सऊदी अरब डोनाल्ड ट्रंप के असर में भारत के खिलाफ अभी वैसा स्टेंड लिए हुए नहीं है जैसा चीन ने लिया हुआ है। चीन काबू में नहीं आ रहा है जबकि सऊदी अरब कुछ तटस्थ बना हुआ है। पिछले दिनों भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने सऊदी अरब जा कर कूटनीति की। चर्चा है कि प्रधानमंत्री मोदी भी अचानक सऊदी अरब जा सकते है। मतलब प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्रालय को पता है कि सऊदी अरब यदि पाकिस्तान के साथ खड़ा नहीं हो, उस पर दबाव बनाएं तो कश्मीर घाटी में सामान्य स्थिति बनने तक नियंत्रण रेखा पर चैन बना रह सकता है।

मगर पाकिस्तान की अंदरूनी स्थिति विकट है। इमरान खान के संयुक्त राष्ट्र से लौटने के बाद से आंतकी संगठनो, उग्रवादियों ने जो माहौल बनाया है, नियंत्रण रेखा की तरफ लोगों के कूंच करने, मार्च होने की बातों से माहौल को जैसे भड़काया जा रहा है उससे सेना और सरकार में यह दुविधा निश्चित होगी कि आगे क्या? इमरान खान ने ‘जिहाद’ की घोषणा करते हुए कश्मीरियों के साथ खड़े रहने की बात तो कह दी लेकिन उसके बाद खुद ही इस चिंता में होंगे कि आगे क्या हो? मौटे तौर पर इमरान खान मध्यस्थता बनवाने की कोशिश में है। पर भारत ने मध्यस्थता मानने से दो टूक इंकार किया हुआ है तो न डोनाल्ड ट्रंप से कुछ कराया जा सकता है और न चीन के राष्ट्रपति शी भारत आ कर प्रधानमंत्री मोदी से कह सकते है कि वे सुलह कराने या मध्यस्थ बनने को तैयार है। इसलिए अपना मानना है कि इमरान खान और राष्ट्रपति शी की मुलाकात भारत को घेरने के कूटनैतिक-सैनिक रणनीति पर विचार का मकसद लिए हुए होगी। चीन यदि हर तरह से पाकिस्तान के साथ खड़ा है और छोटी-छोटी अनावश्यक बातों पर भी वह भारत के खिलाफ बयानबाजी कर रहा है तो वह निश्चित ही पाकिस्तान की रणनीति में मदद के पेंतरे सोच रहा होगा।

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तभी सवाल है कि पाकिस्तान-चीन की साझा रणनीति की हकीकत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के राष्ट्रपति शी से बातचीत में क्या हित साध सकते है? क्यों कर भारत लगातार उम्मीद पाले हुए है कि चीन से बार-बार बात करके उसे समझाया, पटाया जा सकता है? संदेह नहीं कि भारत के बाजार, भारत से आर्थिक फायदे का मोह चीन नहीं छोड़ सकता है। भारत की कूटनीति में यह आग्रह पुराना है कि चीन अपना फायदा देंखे और भारत जब खुद राजनैतिक विवाद, सीमा विवाद, दक्षिण एसिया की राजनीति के मतभेद दरकिनार कर चीन से दोस्ती बनाए हुए है तो चीन को भी दोस्ती बनाए रखनी चाहिए।

हिसाब से चीन होशियार बिल्ली की तरह भारत और पाकिस्तान दोनों को अपना बाजार बनाए हुए है। दोनों ही देशों में चीन को व्यापार की, मुनाफा कमाने की खुली छूट है। मगर पाकिस्तान उसका शीत युद्ध के दिनों का पुराना साथी देश है। इस्लामी बिरादरी के देशों में पाकिस्तान के जरिए चीन को कूटनैतिक फायदे है। उसके कहे अनुसार मध्य एसिया में पाकिस्तान राजनीति करता है तो सैनिक-सामरिक साझेदारी भी पुरानी है। इसलिए अपना मानना है कि इस्लामाबाद के हुक्मरान अब उस उधेड़बुन में है जिससे चीन का साझा बनवा कर जिहादी-आंतकी छाया युद्ध का पेंतरां चला जा सके। तभी इमरान खान की बीजिंग यात्रा और फिर राष्ट्रपति शी की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के नतीजे गंभीर और अहम होने है। अगले दस-पंद्रह दिनों में चीन और सऊदी अरब के दो मोर्चो पर भारत की कूटनीति से तय होगा कि कश्मीर का पंगा क्या रूप पाता है। बावजूद इसके अपना मानना यहीं है कि मोदी सरकार कितनी ही कोशिश कर ले चीन को तटस्थ, न्यूट्रल नहीं बनाया जा सकता है।

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