हमारी बुनावट और चीन बनाम भारत

बात मामूली है पर हमारी और चीनियों की बुनावट का फर्क बताती है। महाबलीपुरम में चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा मतभेद को विवाद नहीं बनने देंगे! यहीं बात विदेश मंत्री जयशंकर ने अनुच्छेद 370 खत्म करने के बाद बीजिंग जा कर बातचीत के बाद कही। यह एप्रोच, यह वाक्य भारत का स्थायी मनोभाव, स्थायी मनोवृति का साक्ष्य है। इसी बुनावट में पंडित नेहरू ने अपने वक्त में चीन को, चाउ एन लाई को हैंडल किया था। तब नेहरू ने हिंदी-चीनी भाई-भाई बोला जबकि चीन तब भी डंके की चोट नाजायज दुश्मनी का रुख लिए हुए था और आज भी लिए हुए है। तब न चाउ एन लाई ने नेहरू से मुलाकात के बाद अपनी तरह बोला कि हां, चीनी-हिंदी भाई-भाई और न अभी शी जिनफिंग ने मोदी से मुलाकात के बाद ऐसी कोई बात कहीं जो मोदी के, भारत के इस जुमले से मैच करती हो कि मतभेद को विवाद नहीं बनने देंगे। शी का वाक्य इतना भर था कि दोनों देशों के आपसी संबंधों पर दिल खोल कर विचार हुआ! और इसमें अपने विदेश मंत्रालय की बात मानें तो कश्मीर पर विचार नहीं!

सोचें, पिछले सत्तर दिनों में चीन ने दुनिया में भारत को हर तरह से बदनाम किया है। जम्मू कश्मीर के मामले को वह सुरक्षा परिषद् में ले गया। वह डंके की चोट पाकिस्तान के जिहादी तेवरों को बढ़ावा दे रहा है। इसमें उसे कोई कूटनीतिक शर्म, पछतावा, झिझक या सफाई नहीं है लेकिन बावजूद इसके भारत का रुख है कि हम मतभेद को विवाद नहीं बनने देंगे! जबकि चीन का मत, रुख दो टूक पाकिस्तानपरस्ती, दुश्मनी का है। चीन ने नेहरू के वक्त भारत की जमीन खाई, आज वह भारत के पूरे बाजार को खा रहा है। नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव जैसे पड़ोसियों को वह अपनी गिरफ्त में ले चुका है। वह भारत के लिए परमाणु क्लब, सुरक्षा परिषद् की सदस्यता में बाधा है। उसने पिछले पांच सालों में लगातार कभी डोकलाम, कभी लद्दाख, कभी अरूणांचल में आंखे दिखाई है। उसका व्यवहार दुश्मन की तरह है, भारत को घाटा दे रहा है लेकिन हम लोग और भारत राष्ट्र-राज्य उसकी दुश्मनी को, पंगेबाजी, दादागिरी, लूट को यह कहते हुए प्रकट नहीं होने दे रहे हैं कि मतभेद को विवाद नहीं बनने देंगे!

और यह तब है जब 1960 के मुकाबले आज भारत परमाणु हथियारों से लैस है। भारत के सेनापति ने बोला हुआ है कि हम चीन और पाकिस्तान दोनों के मोर्चों से लड़ सकते हैं। यहीं नहीं अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप आदि में चीन के खिलाफ मोर्चेबंदी का भारी माहौल है। बावजूद इसके भारत की रीति-नीति- उसका व्यवहार, आचरण वहीं जो 1960 में था।

जाहिर है यह भारत का, भारत के हम लोगों की बुनावट का सनातनी व्यवहार है। हम हैं ही ऐसे! उधर चीनी लोग भी बुनावट में बंधे हैं। इन दोनों बुनावट को समझना, उसके फर्क को बूझना ही मोटे तौर पर ऐंथ्रोपोलॉजी याकि मानव शास्त्र है। चीन की तासीर अलग है तो हमारी तासीर अलग है। हम भले अपने चश्मे में नेहरू और मोदी के चेहरों का, वक्त का, व्यवहार का फर्क बूझें लेकिन वैश्विक निगाह में, चीन की निगाह में, यूरोप की निगाह में हम लोगों याकि इंडियंस, हिंदुओं का, भारत राष्ट्र-राज्य को ले कर मोदी का वक्त भी वैसा ही है जैसा नेहरू का था। यह बात दूसरी सभ्यताओं पर भी लागू है। यदि चाइनीज सभ्यता की बुनावट पर हम समग्रता से विचार करें तो माओ, देंग और शी जिनफिंग के आचरण का मूल लक्ष्य, मूल प्रवृति एक ही है। तभी चीन का व्यवहार नेहरू के वक्त भी भारत के साथ वैसा ही था जैसा आज है। वह हम लोगों को समझते हुए अपने स्वार्थ, अपनी दादागिरी से हमारा टेंटुआ दबाए रहता है। सोचें माओ, देंग और शी जिनफिंग तीनों ने किस शिद्दत से, कितने कड़ेपन, खूंखारपने से चीन को ग्रेट बनाने के लांग मार्च, एक एक्सट्रीम से दूसरे एक्सट्रीम के प्रयोग किए? कैसे कंफ्युशियनिज्म-ताओइज्म के अनुशासन की तासीर में चीनियों ने अपने आपको बनाया? चीन के नेताओं ने, उसकी राजनीतिक जमात ने मध्य मार्ग में नहीं, बल्कि अपनी सभ्यतागत इस विशिष्ट जिद्द में व्यवहार किया, राजनीतिक संस्कृति बुनी कि वह दुनिया की धुरी है। इसके यज्ञ में चीनियों ने जितनी जैसी क्रूर बलियां दीं, जैसे प्रयोग किए, जैसे दुस्साहस किए और जो पाया वह इस बात का प्रमाण है कि सहस्त्राब्दियों के थपेड़ों ने चीनियों की बुनावट, उनकी ऐंथ्रोपोलॉजी, उनके मानव व्यवहार को पकाया ही ऐसा था, जिससे बतौर राष्ट्र वह आजादी के बाद भी उसी तरह पका।

मतलब हम हिंदू जहां अपने सभ्यतागत क़ड़ाव में अलग तरह से पके तो चीनी अलग तरह से और यूरोपीय, अफ्रीकी लोग अलग तरह से। इसकी प्रक्रिया को समझने का नाम ही ऐंथ्रोपोलॉजी और उसकी ब्रांचों या समाजशास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान, राजनीति, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र का वह समाज विज्ञान (Social sciences) है, जिसे सवा सौ करोड़ लोगों की हमारी भीड़ में न्यूनतम महत्व प्राप्त है।

तभी यदि हम अपने से पूछें कि हम अपने को क्यों नहीं जानते? तो जवाब होगा कि हममें सामाजिक विज्ञान, सोशल साइंस पढ़ने याकि ऐंथ्रोपोलॉजी, इतिहास, राजनीति, थीओलॉजी (धर्मशास्त्र, ईश्वर मीमांसा) डिवीनिटी, समाज शास्त्र, भाषा शास्त्र, कला-नृत्य-संगीत-सिनेमा-खानपान याकि मानव जीवन के पठन -पाठन का जब क्रेज, ललक, आग्रह ही नहीं है तो खांक अपने को, अपने राष्ट्र-राज्य को समझ सकते हैं! बतौर हिंदू, अपने आदि मानव याकि होमो सेंपियंस के सभ्यतागत विकास को सोशल साइंस के खांचे, उसकी विविध ब्रांचों में जब खोजते और सोचते ही नहीं हैं तो खाक मालूम होगा कि हम हैं क्या?

हां, अपना जो मूल है उसे खोजा नहीं, समझा नहीं, उससे सबक नहीं लिया और कौम और राष्ट्र रच रहे हैं! वह भी उन मॉडल, टेंपलेट्स से, उन जुमलों, उस भाषा और उन सोल्यूशन से, जिनका अपनी मौलिकता से, अपनी बुनावट से नाता नहीं है जो सब दूसरी सभ्यताओं में कहीं की ईंट, कहीं का पत्थर है!

सचमुच सवा सौ करोड़ लोगों की भीड़ की यह सोच कौम, नस्ल की एक गहरी बीमारी है कि हम डॉक्टर इंजीनियर, अफसर, आईटी के कुली बनना चाहेंगे लेकिन मानव शास्त्री, समाज शास्त्री, धर्मशास्त्री, राजनीति शास्त्री, भाषाशास्त्री, इतिहास शास्त्री, कलाशास्त्री नहीं बनना चाहेंगे जबकि मानव जीवन, मानव की कौम की बुनावट इन्हीं में गुंथी हुई है।

इसे भी पढ़े : मनमौजी मॉनसून, लावारिस किसान!

तभी दुनिया में हमारा होना, हमारा अर्थ भीड़, भेड़, अंधविश्वास, मूर्खताओं और लूट की सुरक्षित चरागाह के रूप में है। हमने जब अपने को पढ़ा, खोजा, बूझा हुआ नहीं है तो दूसरी सभ्यताएं जैसे सोचेंगी, जो अर्थ निकालेंगी तो निकालेंगी। माओ, देंग और शी जिनफिंग ने भारत का, हम लोगों का, नेहरू-मोदी का जो अर्थ निकाला हुआ तो हम न तो उसे बदल सकते हैं और न हमारी वह बौद्धिकता है, जिससे हम बदले ताकि वे हमारे प्रति बदलने को मजबूर हों। हमने अपने को नहीं जाना हुआ है, उन्हे नहीं जाना हुआ है उलटे उन्ही से समझ आता है कि हम क्या है! (हकीकत है कि चीनी यात्रियों ने यात्रा वृतांतों से हमें बताया हुआ कि हम हिंदू कैसे हुआ करते थे!)

त्रासद तथ्य है कि दूसरों ने बतौर मानव हमें जैसे पढ़ा तो हम भी उसी के आसरे हैं। लेकिन बतौर कौम, सभ्यता यदि हम सोचें तो बतौर मानव हमें अपना मानवशास्त्र जान कर हमें अपने आपको बदलना, सुधारना चाहिए या नहीं? इतिहास खोज कर, उसके सबक लेते हुए हमें अपना व्यवहार बनाना चाहिए या नहीं? पर हम न इतिहास पढ़ते है, न उसके सबक पर विचारते हैं। नतीजतन पूरा जीना वर्तमान याकि आज पर हैं। आज का मसला, आज का समाधान और उसका जुगाड़। तभी ये वाक्य बनते है कि हिंदी-चीनी भाई-भाई और मतभेद को विवाद नहीं बनने देंगे! हम अपने पर, संबंधों पर बेबाक नहीं होते, अर्थशास्त्र की बारीकी नहीं पकड़ते, उसे राजनीति के रोडमैंप में एप्लाई नहीं करते तभी कभी यह पढ़ने को मिलता है कि नादिरशाह बहुत लूट ले गया। अभी ताजा एक किताब से मालूम हुआ कि उफ! ईस्ट इंडिया कंपनी ने कितना और कैसे हमें लूटा। यह सब (सोशल साइंस) पढ़ते नहीं तभी देख-समझ नहीं पाते कि आजाद भारत के सत्तर सालों में भी कैसे लुटे जा रहे हैं? यदि अंबानी, अदानी सुरसा की तरह कुबेरपति बने हैं तो क्या वह ईस्ट इंडिया कंपनी जैसा अनुभव नहीं है?

मैं भटक गया हूं। सत्व-तत्व का बिंदु है कि बतौर मानव, उसकी रचना, उसके विकास, उसकी बुनावट के सामाजिक विज्ञान, मानवशास्त्र को ले कर हम लोगों की बेखबरी, उदासीनता भयावह है। तभी यह कौम का सभ्यतागत संकट भी है। इसका एक दुष्परिणाम हमारा, हिंदुओं का, भारत राष्ट्र-राज्य का वह व्यवहार है, जिसमें बस आज, आज के संदर्भ में, समाधान याकि जुगाड़ में जीते जाना है! (जारी)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares