दलाई लामामार्ग पर चीनी दूतावास! - Naya India
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दलाई लामामार्ग पर चीनी दूतावास!

समझ में नहीं आता कि इस हकीकत पर क्या कहा जाए कि भारत में पैदा होने के बाद बौद्धधर्म यहां समय के साथ उतना नहीं फला-फूला जितना कि पड़ोस के दक्षिण एशियाई देशों में फैला। इसका हश्र यह भी हुआ  है कि दुनिया भर में खुद को सबसे बढ़ा लठैत साबित करने के लिए उतावले चीन ने बौद्धों के एकमात्र देश तिब्बत पर कब्जा कर उसे अपने देश में मिला लिया। लद्दाख में अभी उसने जो कुछ किया है वह बताता है कि दूसरे की जमीन पर कब्जा करना उसकी पुरानी फितरत है। तिब्बती लोग आध्यात्मिक धर्मगुरू 14वे दलाईलामा को अपना शासक व भगवान मानते हैं जबकि चीन के लिए तो दलाई लामा वैसे ही है जैसे कि भेडि़ए के लिए भेड़ा। चीन से जान बचाने के लिए वे तिब्बत से जान बचाकर भारत आए हैं। तत्कालीन सरकार ने उन्हें आश्रय देने के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में उनके साथ आए तिब्बती नागरिक को ठहरने व अपनी निर्वाचित सरकार चलाने के लिए जगह भी दी थी। इस कारण चीन भारत से काफी नाराज हो गया।

उसने सबसे पहले 196२ में भारत के साथ टकराव लिया था। वह भी चाहता था कि भारत उसे अपने यहां शरण नहीं दे। दलाई लामा की आस्था अहिंसा से है और वे आध्यात्म में ज्यादा रूचि लेते हैं। लंबे समय से तिब्बतियों  के बीच दलाई लामा के निधन के बाद उनके किसी तिब्बती परिवार में ही पुनर्जन्म होने की मान्यता व आस्था रही है। कुछ समय पहले चीन ने एक फर्जी दलाई लामा खड़ा करने की कोशिश की थी मगर उसे इस काम में सफलता नहीं मिली। चीन के लिए दलाई लामा वैसे ही है जैसे कि नाग के सामने बूटी। वह उन्हें देखते ही भड़क जाता है व उनकी जान के पीछे पड़ा हुआ है। लद्दाख में वो क्या कर रहा है यह किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने उसे दलाई लामा के मुद्दे पर उनकी हैसियत बताने के लिए प्रधानमंत्री को जो सुझाव दिए है वे चौकाने वाले हैं।

जहां एक और चीन भारत की हर हरकत से चिढ़ जाता है वहीं उसे उसकी हैसियत याद कराने के लिए भारत के एक वरिष्ठ आईएएस अफसर ओपी मिश्रा ने जोकि लक्षद्वीप में सचिव स्तर के अधिकारी है ने अनोखा कदम उठाया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजी लाइव याचिका में कहा है कि दिल्ली के चाणक्यपुरी में चीनी दूतावास के बाहर स्थित पंचशील मार्ग का दोबारा नामकरण किया जाए। उनका सुझाव है कि इस मार्ग का नाम बदलकर दलाई लामा मार्ग कर देना चाहिए।

दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित चीनी दूतावास के चारो तरफ से प्रमुख सड़के है जिन्हें शांतिपथ, डिप्लीमेटिक एन्कलेव, पंचशील मार्ग व न्याय मार्ग के नाम से जाना जाता है। उसी से चीनी दूतावास धिरा हुआ है। श्री मिश्रा ने अपनी याचिका में कहा है कि भारत और चीन के बीच 1954 में पंचशील समझौता हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस संधि को बनाया था। इसलिए पंचशील मार्ग के रूप में संधि की महत्व को चिन्हित करने के लिए चाणक्यपुरी में एक महत्वपूर्ण सड़क का नाम पंचशील मार्ग रखा गया। पंचशील का अर्थ होता है पांच प्रमुख बातें जो भारत-चीन संबंध का आधार बनी थी।

इसके मुताबिक एक दूसरे की एकता, अखंडता व संप्रभुता के प्रति परस्पर सम्मान, आपसी गैर-आक्रामकता, एक दूसरे के आंतरिक मामलो में हस्तक्षेप न करना, समानता व पारस्परिक लाभ के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांत का पालन करना था। श्री मिश्रा ने अपनी याचिका में कहा है यह बेहद अफसोस की बात है कि आज वह संधि केवल कागजो पर बची हुई है। चीन ने आज तक इसका अनुपालन नहीं किया। श्री मिश्रा के अनुसार, यह पंचशील गुटनिर्पेक्ष आंदोलन का आधार था। लेकिन कभी चीन ने संधि पर पालन करना तो दूर रहा उसके प्रति अपना सम्मान तक प्रकट नहीं किया। जबकि भारत ने पंचशील के बारे में बहुत प्रचार किया।

उसकी तमाम कोशिशो के बावजूद पंचशील बाते आगे नहीं बढ़ी। चीन ने समय-समय पर हमारी सीमा का उल्लंघन किया है और भारत की अखंडता को भंग किया और युद्ध छेड़े। उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि हम एक असफल नेहरूवादी विरासत के साथ जी रहे हैं और आज भी सड़क का नाम पंचशील मार्ग रखा हुआ है। उन्होंने सुझाव दिया है कि 1989 में नोबल शांति पुरुस्कार जीतने वाले 14वे दलाई लामा को सम्मानित करने के लिए दलाई लामा मार्ग के रूप में पंचशील मार्ग का नाम बदल दिया जाना चाहिए।

उनके अनुसार भारत ऐसा करके बीजिंग को एक स्पष्ट व मजबूत संदेश यह दे सकता है कि आज का भारत एकदम अलग है व वह किसी भी आक्रमण को बर्दाश्त नहीं करेगा। हम चीनी राजदूत को दलाई लामा मार्ग से गुजरते हुए देखना पसंद करेंगे। हमारे तिब्बती भाईयो का भी मनोबल बढ़ेगा व उन्हें इससे प्रेरणा मिलेगी। यह हमारी संप्रभुता का सम्मान माना जाएगा। मेरा मानना है कि यह सुझाव बहुत अंहम है। जरा कल्पना कीजिए कि जब दलाई लामा को अपना दुश्मन मानने वाले चीन के भारत स्थित दूतावास के लैटरहैड पर यह पता छापना पड़ कि चीन दूतावास, 50डी परमपावन दलाई लामा पथ, चाणक्यपुरी नई दिल्ली। जब भी चीनियो को किसी को भी दिशा-निर्देश देने होंगे तो उन्हें यह कहना पड़ेगा कि हम तो दलाई लामा पथ पर है। आमतौर पर यह परंपरा रही है कि सड़को का नामकरण मृत व्यक्तियो की याद में किया जाता है मगर इसके कुछ अपवाद भी हैं।

हाल ही में दलाई लामा ने अपना 85वां जन्मदिन मनाया। वह चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा किए जाने के बाद पिछले दशको से हिमाचल प्रदेश के धर्मशालामें निर्वासित जीवन बिता रहे हैं। भारत विश्व में एकमात्र ऐसा देश है जहां दो स्वायत्त देशों की संसद चलती है। ध्यान रहे कि तिब्बत सरकार की निर्वाचित संसद धर्मशाला में है।चीन आध्यात्मिक गुरू दलाई लामा को अपना दुश्मन मानते हुए उनसे घृणा करता है। वह तो उन्हें इस नोबल पुरुस्कार विजेता को अहिंसावादी होने के बावजूद उग्रवादी कहता है। चीन ने हाल ही में यहां तक कह दिया है कि दलाई लाभा की मृत्यु के बाद उनका उत्तराधिकारी भी चीन से ही होगा।

वहीं दलाई लामा ने कहा है कि वे चीनी नियंत्रित तिब्बत या चीन में जन्म लेना पसंद नहीं करेंगे व वहां पुनर्जन्म नहीं लेंगे। उन्होंने भारत में पुनर्जन्म लेने की इच्छा व्यक्त की है। जिससे चीन के तिब्बत पर कब्जे के बाद लाखों तिब्बतियो ने अपने यहां आश्रय देकर उन्हें अनुग्रहीत किया। दलाई लामा को भगवान बुद्ध का अवतार माना जाता है व तिब्बती धर्म की सोच परंपरा के मुताबिक ही पुनर्जन्म लेते हैं व उनके मरने के बाद तिब्बत में उनकी खोज की जाती है। तमाम तिब्बती बुजुर्ग धर्म गुरूओ की टीम अपने तौर-तरीको से उनकी खोज करती है।

दलाई लामा को वापिस लिए जाने को लेकर चीनी सरकार ने बार-बार भारत पर दबाव डाले मगर भारत ने इस मामले में उसकी एक भी नहीं सुनी। हम उन्हें महात्मा गांधी की तरह अहिंसा का पुजारी मानते हैं। उनकी सरलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि काफी पहले अमेरिका खुफिया एजेंसी सीआईए ने उन्हें चीन को सबक सिखाने के लिए अपनी योजना बनाकर उनसे इस बारे में उनकी सहमति मांगी थी मगर दलाई लाभा ने उन्हें  सहमति देने से इंकार कर दिया।85 वर्ष की आयु हो जाने के बाद भी भारत भी वे  निर्वासन में रह रहे हैं।

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