म्यांमार पर चीनी घेरा

श्रीलंका के बाद चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग अब म्यांमार पहुंचे हैं। म्यामांर में अपने दो-दिन के प्रवास में उन्होंने 33 आपसी समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। म्यांमार की नेता सू ची का बयान ध्यान देने लायक है। उसमें कहा गया है कि ‘‘यह कहने की जरुरत ही नहीं है कि पड़ौसी देश (म्यांमार) के पास इसके सिवाय कोई विकल्प ही नहीं है कि वह अपने पड़ौसी देश के साथ इस सृष्टि के अंत तक खड़ा रहे।’’क्या खूब ? यह वही म्यांमार या बर्मा है, जिसने अपने पूर्वी सीमांत पर बसे चीनी मूल के लोगों की बगावत के खिलाफ जंग छेड़ रखा था और कुछ वर्ष पहले तक चीन के साथ उसका तनाव बना हुआ था। लेकिन इधर चीनी सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में म्यांमार की जो मदद की और बांग्लादेश और उसकी बीच मध्यस्थता की, उसने इन दोनों देशों के बीच सदभाव और घनिष्टता की वृद्धि कर दी।

संयुक्तराष्ट्र संघ और दुनिया के कई देश म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थियों के सवाल पर जबकि उसकी भर्त्सना कर रहे हैं, चीन उसका डटकर समर्थन कर रहा है। म्यांमार से भागे हुए 7 लाख 40 हजार शरणार्थियों के सवाल पर चीन का साफ-साफ कहना है कि वह म्यांमार की संप्रभुता का पूर्ण सम्मान करता है और राखीन क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाए रखने का समर्थन करता है।इसके बदले में म्यांमार चीन को सीधे हिंद महासागर तक पहुंचने का रास्ता दे रहा है। लगभग सवा अरब डालर खर्च करके चीन अब म्यांमार के क्योखफ्यू क्षेत्र में एक आर्थिक गलियारा बना रहा है, जिसके जरिए वह फारस की खाड़ी से तेल और गैस ला सकेगा। उसे अंडमान-निकोबार का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा।

पाकिस्तान के ग्वादर, श्रीलंका के हंबनतोता और म्यांमार के क्योखफ्यू से वह हिंदमहासागर में अपनी लिए एक स्वतंत्र जल-मार्ग खड़ा कर लेगा। वह म्यांमार से बांग्लादेश होते हुए गैस और तैल की पाइप लाइनें भी डाल रहा है। इन सुविधाओं का अपना सामरिक महत्व भी कम नहीं है। भारत के पड़ौसी देशों में चीन का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है लेकिन उन्हें यह भी पता है कि वे चीन के कर्जदार बनते जा रहे हैं।

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