चिराग पासवान और परिवारवाद

सुनने में यह उपमा कुछ अजीब-सी लग सकती है मगर कुछ और याद ही नहीं आ रहा है। बचपन में एक चुटकुला पढ़ा था कि अध्यापक ने राम से पूछा कि श्यामू चोरी करता है इसका भविष्यकाल क्या होगा? जवाब में उसने कहा कि जेल जाएगा। मतलब कि इंसान की मौजूदा हैसियत या हरकते उसका भविष्य बता देती है। इसलिए जब लोजपा नेता रामविलास पासवान द्वारा अपने बेटे चिराग पासवान को पार्टी का अध्यक्ष बनाने की खबर आई तो मुझे इतनी देरी पर बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि मुझे लगा कि उन्हें तो यह काम बहुत पहले ही कर देना चाहिए था।

इसकी वजह यह है कि राजनीति में परिवारवाद को उचित न मानने के बावजूद मेरी राय है कि इस देश में ही नहीं बल्कि एशिया के लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए परिवारवाद का होना बहुत जरूरी है। मेरा मानना है कि भारतीय लोकतंत्र में इस शब्द की उत्पत्ति इंदिरा गांधी के सत्ता में आने के बाद तत्कालीन विपक्ष ने की थी जिस पर ज्यादातर समाजवादी व वामपंथी हावी थे।

वे लोग जवाहरलाल नेहरू द्वारा अपनी बेटी को आगे लाने व फिर इंदिरा गांधी को अपने बेटो संजय गांधी व राजीव गांधी को आगे लाने का आरोप लगाते हुए कहते थे कि परिवारवाद की विषबेल तो इंदिरा गांधी के घर में ही पनप व फलफूल रही है। समय का फेर तो दखिए कि जिस इंदिरा गांधी व सबसे ज्यादा समय तक सत्ता में रहने वाली जिस भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस पर यह आरोप लगाया जाता था उसके विरोधियों के ही खुद नेता बनते अपने इस इस आरोप को अपने लिए भी सही बनाए हुए है।

कांग्रेस व इंदिरा गांधी के विरोध में बनी जनता पार्टी के नेताओं ने ही सबसे ज्यादा परिवारवाद को फैलाया है। समाजवादी नेताओं मुलायम सिंह यादव व लालू प्रसाद यादव ने तो अपनी पार्टी को ही परिवार में बदल कर रख दिया है। इसका प्रभाव यह हुआ कि पार्टी नेताओं के खिलाफ पार्टी के अंदर ही विरोध पैदा हुआ। फिर पार्टी के घर वालों में भी झगड़े हुए। मुलायम सिंह यादव ने लोकसभा चुनाव में परिवार के सदस्यों को टिकट दिए व अपने बेटे अखिलेश यादव को अपनी जगह पार्टी का अध्यक्ष बनाया तो वहीं लालू यादव ने जेल जाने के बाद पूरी पार्टी को अपने बेटों के हाथ में छोड़ दिया और अब दोनों बेटों में झगड़ा चल रहा है।

इंदिरा गांधी के परिवारवाद के सबसे बड़े आलोचक रहे देवीलाल ने जब उपप्रधानमंत्री बनने पर अपने रिश्तेदार चौधरी डा स्वरूप सिंह को उपकुलपति बनाया तो उनके इस कदम की आलोचना किए जाने पर उन्होंने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा था कि जिसके नाते रिश्तेदार होंगे वहीं उन्हें कुछ बनाएगा। अभी उनके रिश्तेदारों में एक का हाल यह था कि उसे अपने राज्य में चुनाव लड़ने पर सिर्फ 327 वोट मिले जो साबित करता है कि उसके या तो रिश्तेदार ही नहीं है या उन्होंने उसको अपना वोट ही नहीं दिया।

बाद में उनकी पार्टी उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला के हाथ में आई व उनके जेल जाने के बाद उनके पोतो व बेटो के बीच पार्टी का विभाजन हो गया। मगर आज भी उनकी राजनीतिक परंपरा परिवार के हाथों में ही है व परिवारवाद को कोसती आई भाजपा ने उसके समर्थन से अपनी सरकार बनाई है। भाजपा में महाराष्ट्र की सहयोगी शिवसेना में भी यही हुआ। बाला साहेब ठाकरे के बाद उनकी पार्टी को उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने संभाला व आज पोता मुख्यमंत्री बनने की तैयारी में है।

यही स्थिति शरद यादव की राकांपा के साथ भी है। वहां उनकी बेटी सुप्रिया सुले व भतीजे अजीत पवार को लेकर नेतृत्व पर पकड़ जमाने की कोशिशें जारी है। पंजाब में ऐसा ही अकाली दल के साथ हो रहा है तो जम्मू कश्मीर में मुफ्ती मोहम्मद सईद व अब्दुला परिवार इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। दक्षिण भारत तक में यही देखने को मिल रहा है। आंध्र प्रदेश में तो टीआरएस से लेकर तमिलनाडु में द्रमुक तक में परिवारवाद हावी है। और तो और ममता बनर्जी ने अपने भतीजे को व मायावती ने अपने भाई को आगे कर रखा है।

जब पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु की सरकार थी तब उनका बेटा चंदन अति संविधानेत्तर शक्ति बन बैठा था। बाद में पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने अपनी पत्नी वृंदा करात को राज्यसभा का सदस्य बनाया था। मुझे लगता है कि जब डाक्टर का बेटा डाक्टर, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर, उद्योगपति का बेटा उद्योगपति व हलवाई का बेटा हलवाई बन सकता है तो नेता का बेटा नेता क्यों नहीं बन सकता है? आखिर राजनीति भी तो आज पारिवारिक धंधा हो चुकी है।

सबसे अहम बात है कि नेता को हर पांच साल बाद जनता के सामने जाना पड़ता है। अगर जनता पार्टी के फैसले से संतुष्ट नहीं है तो वह उसे ठुकरा सकती है। अतः राजनीति में परिवारवाद को हावी रखने या बनाए रखने में कोई दिक्कत या आपत्ति नहीं होनी चाहिए। चिराग पासवान नेतृत्व के योग्य है या नहीं इसका फैसला जनता करेगी। परिवारवाद की सबसे बड़ी आलोचक भाजपा तक कहां इससे बची है? पूनम महाजन से लेकर अनुराग ठाकुर इसके जीते जागते उदाहरण हैं।

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