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नागरिकताः सरकारी शीर्षासन

नए नागरिकता कानून ने हमारे नेताओं को अधर में लटका दिया है। पड़ौसी मुस्लिम देशों के मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता दें या न दें, इस सवाल ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को यह कहने के लिए मजबूर कर दिया है कि भारत सरकार अब ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ (एनआरसी) बनाएगी ही नहीं।  ऐसा कहकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भारत सरकार और भाजपा, दोनों को ही शीर्षासन करवा दिया है। उन्होंने कहा है कि सरकार तो सिर्फ ‘राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर’ ही बना रही है, जो अटलजी की भाजपा सरकार और डा. मनमोहनसिंह की कांग्रेस सरकार के दौरान भी बनता रहा है। जनसंख्या रजिस्टर और नागरिक रजिस्टर में फर्क यह है कि पहले में जो भी भारत में छह महिने से रहता है, वह अपना नाम लिखा सकता है लेकिन दूसरे में हर व्यक्ति के बारे में सप्रमाण विस्तृत जानकारी मांगी जाएगी और यदि उसकी जांच में कोई कमी पाई गई तो उसे नागरिकता नहीं दी जाएगी। उसे घुसपैठिया करार दिया जाएगा।

मोदी और शाह देश में फैले जन-आंदोलन से इतना घबरा गए हैं कि दोनों ने कह दिया है कि हम नागरिकता रजिस्टर बना ही नहीं रहे जबकि भाजपा के 2019 के घोषणा-पत्र में उक्त रजिस्टर बनाने का साफ-साफ वादा किया गया है। अमित शाह ने 20 नवंबर 2019 में राज्यसभा में कहा था कि सरकार राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनाने के लिए कृतसंकल्प है। मेरी राय में यह देशहितकारी काम है। राष्ट्रवादी कर्तव्य है। इसे जरुर किया जाना चाहिए लेकिन मोदी और शाह शीर्षासन की मुद्रा में क्यों आ गए हैं? क्योंकि इन्होंने शरणार्थी-कानून बनाने में भूल कर दी। मुसलमान शरणार्थियों को अपनी सूची में नहीं जोड़ा।

मोदी और शाह की इस छोटी-सी भूल की बड़ी-सी सजा अब देश को भुगतनी पड़ेगी। अब भारत, जो पहले से जनसंख्या-विस्फोट का सामना कर रहा है, दक्षिण एशिया का विराट अनाथालय बन जाएगा। सिर्फ अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश ही नहीं, भारत अब सभी पड़ौसी देशों के शरणार्थियों, घुसपैठियों, दलालों और जासूसों का अड्डा बन जा सकता है।

By वेद प्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

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