मुसलमान को धोखा या मुसलमान से धोखा?

बूढ़ी अम्मा का धरना!-4 : पचहत्तर, अस्सी, पिचासी साल की बूढ़ी मुस्लिम महिलाओं को धरना देते देख ख्याल आया कि सोचो इनका 1947 में बचपन, इनके घर का वक्त किन ख्यालों में गुजरा होगा? मतलब जब हिंदू बनाम मुस्लिम के रिश्तों में नफरत, भारत-पाक के बीच आबादी की आवाजाही, खून खराबा, खौफ, चिंता पीक पर थी तब भी मुसलमान क्यों भारत में रहे? अम्मा के घर में, उनके वालिद ने क्या सोचते हुए दिल्ली का घर नहीं छोड़ा? क्यों नहीं भारत छोड़ा? दो वजह, दो जवाब बनते हैं। या तो गांधी, नेहरू, पटेल से मुसलमानों को भरोसा था कि सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा। मतलब गांधी-नेहरू, हिंदू कांग्रेस के भरोसे, वायदे से मुसलमान भारत में रहे। जबकि मुसलमान के लिए, उनके इस्लाम का अधिकृत नया घर बना था। नई पुण्य-पितृ भूमि बनी थी। अगल-बगल के असंख्य मुसलमानों ने बोरिया-बिस्तर बांध पाकिस्तान को घर बनाया तो वहां से भी हिंदुओं का भारत के अपने नए घर आना हुआ। सो, जो मुसलमान भारत में रहे तो वजह गांधी-नेहरू का, हिंदुओं से इनको भरोसा था कि हम हैं न आपके लिए! दूसरी वजह शायद अम्मा के घर में यह सोच रही होगी कि जन्मभूमि मेरी भारत तो यहीं मरना, यहीं जीना (यह वजह मेरा ख्याल अधिक है क्योंकि तब मौलानाओं का यह तर्क नहीं बनना कि हम वंदे मातरम, मातृभूमि नहीं माना करते)।

इस स्थिति में, इन दो वजहों में फिर सवाल है कि गांधी, नेहरू, कांग्रेस, हिंदुओं ने क्या मुसलमानों के साथ धोखा नहीं किया? हिंदुओं ने उन्हें सुरक्षित, मान-सम्मान के साथ रहने की गारंटी दी लेकिन अब नागरिकता का सवाल, जीवन जीने के निजी मामलों, आस्था, देशभक्ति आदि पर दस तरह के सवाल हो रहे हैं? सोचें कि यूपी के जिस पुलिस अफसर ने कहा कि तब जाओ पाकिस्तान तो बदले में मुसलमान क्यों न पूछे कि तब तुम हिंदुओं ने हमें पहले यहीं रहने को क्यों कहा? गलती तुम्हारे पुरखों की है तो प्रायश्चित करो, भुगतो। हमसे धोखा हुआ है न कि हम धोखा कर रहे हैं!

हां, अनपढ़ बूढी अम्मा हों या पढे-लिखे अंग्रेजीदां नौजवान मुस्लिम (समझना हो तो इंडियन एक्सप्रेस में इरिना अकबर, कबीर खान आदि का लिखा पढ़ें) आज जिस मनोविश्व में हैं उसमें गुस्सा, संघर्ष का भभका है तो यह सवाल भी है कि हम कैसे समस्या? हम कैसे कसूरवार?  हमारे साथ धोखा है, अन्याय है।

यह अर्धसत्य है। गांधी, नेहरू, पटेल, कांग्रेस और भारत के तमाम हिंदू राजनीतिक दलों का मुसलमानों से धोखा इस नाते माना जा सकता है कि सबने मुस्लिम प्रजा को आधुनिक बनाने के लिए वैसी जोर जबरदस्ती नहीं की जैसे हिंदू को हिंदू कोड जैसे सुधारों से आधुनिक बनाया। मुस्लिम प्रजा को भारत राष्ट्र-राज्य की राजनीति में मूर्ख बना कर उनका बतौर वोट बैंक उपयोग हुआ। कांग्रेस, सेकुलरों ने मुसलमानों को अज्ञानी, मूर्ख बनाए रख कर उपयोग किया तो भाजपा, मोदी-शाह पिछले पांच वर्षों से इनमें गुस्सा, इनके प्रति नफरत बनवा कर वोट राजनीति में इनका रिवर्स में उपयोग कर रहे हैं! मुसलमान को पुचकार कर, उनको झुनझुने दे कर, तुष्टीकरण करके उनके वोट लिए जाएं या मुसलमान को विलेन बना कर, उनके खिलाफ लंगूरी करके हिंदुओं के गोलबंद वोट पकाए जाएं, इन दोनों ही स्थितियों के पीछे का सत्य है वोट राजनीति!

हां, न कांग्रेस, सेकुलर राजनीति, लेफ्ट ने मुसलमान का भला किया और न भाजपा, वाजपेयी-मोदी-शाह से मुसलमान का भला है। यहां लेफ्ट या सेकुलर जमात के नंबर एक पैरोकार कम्युनिस्टों को समझा जाए। क्या कम्युनिस्टों ने दशकों पश्चित बंगाल और केरल में राज नहीं किया? और यदि किया है तो वामपंथी सरकारों ने मुसलमान को आधुनिक, वैज्ञानिक सोच वाला बनवाने की शिक्षा-दीक्षा के क्या प्रबंध किए? नहीं। उलटे सर्वाधिक मदरसे या इस्लामी कट्टरपन बंगाल और केरल में ही पसरा हुआ है। क्यों मुस्लिम लीग केरल में मुसलमानों की अधिकृत पार्टी बनी? केरल का यह तथ्य अपने आप में कांग्रेस, कम्युनिस्टों के सेकुलरवाद पर सत्य और मुसलमानों के साथ धोखे, उनके वोट उपयोग की हकीकत बताने वाला हथौड़ा है तो आजाद भारत में सेकुलर उर्फ मुस्लिमपरस्त पार्टियों का मुसलमान से यह धोखा भी प्रमाणित है कि इनके चलते मुसलमान अनपढ़, जाहिल-काहिल रहते हुए वहाबी इस्लाम में परिवर्तित होता गया!

यह आजाद भारत का गंभीर सत्य है। इस बात की हर मुसलमान, हर सत्यवादी पुष्टि करेगा कि बंगाल, केरल और उत्तर प्रदेश में मुस्लिम औरतें एक वक्त उसी पहनावे में रहती थी जैसी हिंदू महिलाएं रहती थीं। यूपी के एक बुजुर्ग पूर्व सांसद राम सिंह ने मुझे कई बार, कई तरीकों से बताया कि वह भी वक्त था जब गांव-देहात में जैसे जाट महिलाओं का पहनावा और व्यवहार (मतलब बिना पर्दे के) होता था वैसा ही घर-खेत-बाजार में मुस्लिम औरतों का था। यह सब बदलना शुरू हुआ सत्तर के दशक से। मदरसों का फैलाव भी तभी से हुआ। पहले पूरे इलाके में एक मस्जिद हुआ करती थी। फिर रेला ऐसा बना कि गांव-गांव और सड़कों के किनारे मस्जिद और मजार बनने लगे।

क्या इस हकीकत को कोई सेकुलर नकार सकता है? तो दोषी कौन? क्या पंडित नेहरू, उनके शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद, हुमायूं कबीर, एमसी छागला, या शास्त्री और इंदिरा गांधी और उनके शिक्षा मंत्री फखरूद्दीन अली अहमद और डॉ. नुरूल हसन क्या दोषी नहीं हैं? समझें इस बात को कि कथित प्रगतिशील, आधुनिक शासन व्यवस्था में हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई की साझा विरासत में ज्ञान-बुद्धि-पढ़ाई का इमरजेंसी से पहले तक का बड़ा वक्त मुस्लिम शिक्षाविदों के पास था। उस वक्त कोई 25 साल पूरे भारत की शिक्षा का दारोमदार मुस्लिम शिक्षा मंत्रियों पर था। ऐसा था तो क्या मुसलमानों के मानसिक विकास, उनकी आधुनिक शिक्षा का जिहाद नहीं चलना था? क्या यह सेकुलरों का धर्म, कर्तव्य नहीं होना चाहिए था? जान लें कि इंदिरा गांधी के वक्त शिक्षा मंत्री प्रो. नुरूल हसन घोर वामपंथी थे और उनके सलाहकारों में प्रो. मुनीस रजा, इम्तियाज खान, इरफान हबीब आदि सत्ता में हर तरह से निर्णायक थे लेकिन इन सबने सेकुलर आइडिया ऑफ इंडिया को हिंदुओं के गले उतारने पर तो जोर जबरदस्ती की, उस माफिक इतिहास, पाठ्य पुस्तकें रचीं लेकिन मुसलमानों के लिए कुरान पढ़ने की मदरसा व्यवस्था कुकरमुत्तों की तरह फैलने दी।

तभी अब इस मोड़ पर, इस बिंदु पर यह सत्य उद्घाटित होता है कि गांधी, पटेल, नेहरू ने धोखा नहीं दिया, बल्कि मौलाना आजाद, हुमायूं कबीर, प्रो नुरूल हसन, शेख अब्दुल्ला, मुफ्ती मोहम्मद याकि मुसलमानों ने हिंदुओं को धोखा दिया जो सब कुछ होते हुए, पूरी आजादी, पूरे मान-सम्मान (शिक्षा-आधुनिकता का दारोमदार मुस्लिम शिक्षा मंत्रियों पर छोड़ने से ले कर अनुच्छेद-370 की कृपा, निजी जीवन में कॉमन सिविल कोड़ को न आने देने आदि) के बावजूद अपने आपको वैसा पढ़ा-लिखा, आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष नहीं बनाया, जैसे मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया में या तुर्की में आधुनिक आबोहवा से मुसलमान बना हुआ है।

सोचें, कौन दोषी है? हिंदू या मुसलमान? नेहरू-गांधी-पटेल या मौलाना आजाद, फखरूद्दीन, प्रो. नुरूल हसन?

सचमुच किसी को धरने पर बैठी बूढ़ी मुस्लिम अम्माओं से पूछना चाहिए कि सन् 1955 से 70 के दशक तक उनके घर में, उनके पहनावे में, घर-अगल-बगल की आबोहवा में क्या था और 1975 के बाद क्या होने लगा? और फर्क आया तो दोषी कौन? कैसे शनै-शनै हॉकी, क्रिकेट के खेल में भारत-पाक का भेद बनने लगा? सोचें 1947 में भारत में रहने का फैसला अपने घर, अपने घरौंदे, घरौंदे की जन्मभूमि से था, जन्मस्थान के प्रति कमिटमेंट था लेकिन बाद में उसकी वंदना, उसके वंदे मातरम् बोलने से भी खुले आम एलर्जी!

वजह पेट्रो डॉलर है, उससे आयात हुआ सऊदी अरब का वहाबी इस्लाम है। उस नाते मैं आजाद भारत के इतिहास में हिंदू-मुस्लिम रिश्तों का टर्निंग प्वाइंट पिछली सदी के सातवें दशक को मानता हूं। सुविधा के लिए निर्णायक घटना 1971 में भारत द्वारा बांग्लादेश बनाए जाने को मानें। उससे पहले तेल की कमाई को सऊदी अरब अपने धर्मादे से भारत के मुसलमानों के बीच पहुंचाने लगा था। मस्जिद, मजार, मदरसों का बनना-खुलना तभी अभूतपूर्व तौर पर बढ़ा। इस्लाम के वहाबी रूप में मुस्लिम जमात का पाजामा ऊंचा होने लगा तो वोट राजनीति में इस्लाम का यह रूप थोकबंद आकार भी पाने लगा। उससे पहले इंदिरा गांधी उस कम्युनिस्ट-वामपंथी घेरे में गिर चुकी थीं, जिसमें प्रो. नुरूल हसन या कुमारमंगलम से लेकर रोमिला थापर, शशिभूषण कहने को आधुनिक और सेकुलर डेमोक्रेसी के झंडाबरदार थे लेकिन इनका पूरा फोकस हिंदुओं का इतिहास भुलाने और मुसलमानों का इतिहास जिंदा रखवाते हुए अपने मीडिया, अपने नैरेटिव में हल्ला बनवाना था कि खतरा हिंदू से है न कि इस्लाम से! वह मुसलमानों में हवा फूंका जाना था।

अचानक अप्रत्याशित घटनाक्रम हुआ और पाकिस्तान की भारत के हाथों हार में बांग्लादेश बना! इससे मुस्लिम के वैश्विक, देशज और पाकिस्तानी मनोविज्ञान में इंदिरा गांधी बतौर ‘दुर्गा’ इमेज लिए हुए बनीं! आजाद भारत में, और हिंदुओं के जाग्रत इतिहास में अखिल भारतीय दिल्ली सल्तनत की पहली विजेता महिला की एक इतिहासजन्य वह उपलब्धि थी तो साथ में ‘दुर्गा’ शब्द जुड़ना वह गहरी हिंदू मार थी, जिसमें जुल्फिकार अली भुट्टो ने घास खा कर एटम बम बनाने का संकल्प लिया तो बाद में जिया उल हक ने भारत के खिलाफ स्थायी छाया युद्ध, आंतक बनवाने में पाकिस्तान को झोंक डाला। उधर बांग्लादेश निर्माण के साथ हमेशा की तरह हिंदू शासक, याकि सरकार और इंदिरा गांधी ने सीमा को खुला छोड़ने की गलती की। नतीजतन मुसलमान थोक में पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल जा पहुंचे। इससे आगे वह कलह हुई, जिसका एक परिणाम आज का सीएए और नागरिकता झमेला है!

मैं भटक गया हूं। मूल बिंदु है कि मुसलमान से, बूढ़ी अम्मा से हम हिंदुओं को धोखा है या अम्मा का, मुसलमानों का हम हिंदुओं से यह धोखा है, जो उन्होंने अपनी आंखों के सामने, अपनी परवरिश में अपनी संतानों को मदरसे, वहाबी इस्लाम, आजादी-आजादी, टुकड़े-टुकड़े नारों की और भटकने दिया?

फैसला अम्मा को करना है, सोचना मुसलमान को ही है। गांधी-पटेल-नेहरू, कांग्रेस ने भरोसा दिया तो अवसर भी दिया मगर अवसर को मुस्लिम लीग में, हुर्रियत कांफ्रेस में, अब्दुल्लाओं-मुफ्तियों, मदरसों में, पर्दे में, हिज्ब में, अशिक्षा में, तीन तलाक, कठमुल्लापन में बदला गया तो दोषी कौन? तभी धोखा क्या हिंदू को मुसलमान से नहीं है? मौलाना आजाद को, प्रो. नुरूल हसन को, जाकिर हुसैन या फखरूद्दीन अली अहमद को नेहरू-इंदिरा ने मुसलमानों के मदरसे खत्म कराने, आधुनिक शिक्षा अनिवार्य बनवाने, उन्हें भी कॉमन सिविल कोड का हिस्सा बनाने से, उन्हें सेकुलर बनाने से रोका नहीं था। बावजूद इन्होंने न सोचा, न पहल की और न काम किया तो क्या यह इनका नेहरू-पटेल, कांग्रेस से याकि हिंदुओं से धोखा नहीं था? इसलिए अम्मा सोचें, इरिना अकबर, कबीर खान सोचें कि मोदी-शाह और संघ-भाजपा का शासन तो सिर्फ साढ़े पांच साल पुराना है, उसके पहले पचास साल आपने अपने आप अपनी जो परवरिश की, अपने को जैसा बनाया (यह दुनिया के संदर्भ में भी बात है) तो उसके लिए जिम्मेवार, दोषी व धोखेबाज कौन?

हिंदू को कोसना, मोदी-शाह को कोसना, भारत राष्ट्र-राज्य के कानून के खिलाफ धरना देना सबमें अपनी जगह तर्क हो सकते हैं लेकिन पहला सत्य तो मुसलमान के अपने घर का, उसके अपने दिमाग का, उसके अपने धर्म का है, जिससे वह फ्रांस में लांछित है तो अमेरिका और चीन में भी! दुनिया के किस गैर-इस्लामी देश में दिमाग को बनाने-बिगाड़ने का शैक्षिक जिम्मा लिए इतने मुस्लिम शिक्षा मंत्री हुए हैं, जितने भारत में हुए हैं और सब हिंदुओं ने बनवाए तो बावजूद इसके नतीजा यदि मदरसा, हिज्ब और नागरिकता की परीक्षा से घबराना है तो भला दोषी कौन? आज भी लिखना लंबा हो गया। क्या करें सोचने का प्रवाह बढ़ता जा रहा है। कल और।

5 thoughts on “मुसलमान को धोखा या मुसलमान से धोखा?

  1. व्यास जी की सूक्ष्म अंतदृष्टि विश्लेषण और ऐतिहासिक तथ्यों का आकलन वास्तव मे सही और सटीक है।तर्की मे कमाल अतातुर्क ने मुसलमानों को आधुनिक बना कठमुल्ले पन ,रूढवादिता से निजात दिलाया। लेकिन भारत मे तो उल्टी गंगा ही बही।यह भी आज समाज की बदहाली के लिए जिम्मेदार है। लेकिन इसका रास्ता समाज को आधुनिक ता अपना कर निकालना होगा, नेता के रूप मे तो निहित स्वार्थी और वोटो के सौदागर बैठे है।

  2. ???ऐतिहासिक तथ्यों की कसौटी पर खरा एक उत्कृष्ट विश्लेषण। सर आपकी लेखनी को सादर नमन।???

  3. मुसलमान याकि कुरान से चिपका हुआ अतार्किक मनुष्य चाहे वह कितनी ही आधुनिक पढ़ाई लिये हुए वो कुरान से इतर सोचना ही नहीं चाहता है चाहे वो ओसामा हो या बगदादी चाहे इस्लाम के झंडाबरदार इनके फ़ॉलोअर्स, जबतक ये कुरान को ही सर्वोपरी मानते रहेंगे इनकी कुंद हुई सोच इन्हें आगे सोचने ही नहीं देती। इतनी छोटी सी बात को हरिशंकर जी व्यास आप इग्नोर कर आप स्वयं तो भटकते ही है और पाठकों को भी आप अपने शब्दजाल में भटकाते रहते हैं।

    कैलाश माहेश्वरी
    भीलवाड़ा

  4. हरीशंकर जी आप कुरान पढ़िये, समझिये और इसे आत्मसात किये लोगों के मर्म को देखिये, समझिये फिर मुस्लिमों के बारे में अपनी लेखनी को गढ़िए। आपका बार बार का जो ये भटकाव है ना लेखनी में, समाप्त हो जायेगा और लेखनी का सहज सरल प्रवाह रहेगा।

    कैलाश माहेश्वरी
    भीलवाड़ा

  5. आपके लेख का जवाब नहीं..मैं आपके हर नए लेख का इंतजार करता हूं

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