असम में फिर उबाल पर

नागरिकता संशोधन बिल के पास होने के बाद ऐसा लगता है कि असम में एक बार फिर छात्रों ने आंदोलन की कमान अपने हाथों में ले ली है। पूर्वोत्तर में लगी इस आग के शीघ्र बुझने के आसार नहीं हैं। साढ़े तीन दशक पहले छह साल लंबे चले असम आंदोलन की कमान भी छात्रों के हाथों में थी। अब फिर नागरिकता कानून में संशोधन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों की कमान भी छात्रों ने ही संभाल रखी है। उधर खासकर त्रिपुरा जैसे राज्यों में महिलाएं भी खुल कर विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा ले रही हैं।

बेहद तनावपूर्ण माहौल के बीच ही गुवाहाटी में 15 से 17 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के बीच होने वाली बैठक रद्द करनी पड़ी। असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल और दूसरे मंत्रियों व बीजेपी के नेताओं के घरों पर होने वाले हमलों से छात्रों की नाराजगी समझी जा सकती है। यूं तो नए कानून का विरोध पूरे देश में हो रहा है, लेकिन पूर्वोत्तर के खासकर असम और त्रिपुरा में इसके खिलाफ जितनी नाराजगी दिख रही है वैसी कहीं और नजर नहीं आती। इन राज्यों में तमाम राजनीतिक रुझान वाले छात्र और सामान्य लोग विधेयक के खिलाफ सड़कों पर हैं।

अस्सी के दशक में पड़ोसी बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर होने वाली घुसपैठ के खिलाफ अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने बड़े पैमाने पर आंदोलन छेड़ा था। छह साल तक चला यह आंदोलन बाद में बंगालियों और असमिया लोगों के बीच सांप्रदायिक हिंसा में बदल गया था। आखिर में केंद्र, राज्य और आसू के बीच हुए तीन-तरफा असम समझौते के बाद यह आंदोलन ठंडा पड़ा। उसके बाद आसू ने असम गण परिषद (अगप) नामक नई पार्टी बनाई और 1985 में हुए विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से जीत कर सरकार बनाई थी।

तब प्रफुल्ल कुमार महंत देश में सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने थे। 1985 के असम समझौते में असमिया अस्मिता और संस्कृति की रक्षा के प्रावधान थे। राज्य में नेशनल रजिस्टर आफ सिटींजस (एनआरसी) को अपडेट करने की कवायद भी असम समझौते का ही हिस्सा थी। मगर नए कानून ने उससे जो कुछ शांत हुआ था, उसे ताक पर रख दिया है। नतीजतन, असम में एक बार फिर जन भावनाओं का उबाल है। हालात पर काबू पाने के लिए सरकार को कई जगहों पर बेमियादी कर्फ्यू लगाना पड़ा। राज्य के दस संवेदनशील जिलों में मोबाइल व इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं। पुलिस फायरिंग करनी पड़ी। अब ये बात नरेंद्र मोदी सरकार को बतानी चाहिए कि इन सबकी जिम्मेदारी किस पर है?

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