नॉर्थ-ईस्ट तो सुलग उठा है - Naya India
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नॉर्थ-ईस्ट तो सुलग उठा है

नागरिकता संशोधन विधेयक- 2019 ने पूर्वोत्तर राज्यों में जन विरोध को हवा दे दी है। असम, त्रिपुरा, मणिपुर, नगालैंड में वैसे बीते कई हफ्तों से इस विधेयक का विरोध जारी था, लेकिन इसके संसद में पेश होते ही चिंगारी सुलग गई। वहां विरोध में उतरे संगठनों के एक बयान कहा गया यह बिल पूर्वोत्तर क्षेत्र की जन-जातियों के सिर पर लटक रही खतरे की तलवार है। विभिन्न राज्यों के अलग-अलग संगठनों के प्रदर्शनों के बीच नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स यूनियन (एनईएसयू) ने 10 दिसंबर को पूर्वोत्तर बंद का आह्वान भी किया, जिसका प्रभाव सभी राज्यों में देखने को मिला। 11 दिसंबर को असम समेत कई राज्यों में हिंसा हुई। पूरे इलाके में सुरक्षा बलों की भारी तैनाती गई है। नागरिकता संशोधन विधेयक-2019 के तहत 31 दिसंबर 2014 या इससे पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए उन हिंदुओं, जैन, ईसाइयों, सिखों, बौद्धों और पारसियों को अवैध शरणार्थी न मानते हुए भारतीय नागरिकता दी जाएगी, जो अपने देश में उत्पीड़न के कारण भारत आए थे। इस विधेयक में इन देशों से भारत में शरण लेने वाले गैर-मुस्लिम समुदाय के लोगों को नागरिकता पाने के लिए 12 वर्ष भारत में रहने की अनिवार्यता को छह साल किया गया है। मगर विधेयक में कहा गया है कि पूर्वोत्तर के जिन राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, सिक्किम और मिजोरम) में ‘इनर लाइन परमिट’ व्यवस्था है, उन्हें इस विधेयक के दायरे से बाहर रखा जाएगा।

इसका अर्थ यह हुआ कि इस विधेयक के लाभार्थी भारतीय नागरिकता पाने के बाद अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, सिक्किम, मिजोरम और छठी अनुसूची के तहत आने वाले क्षेत्रों में नहीं बस सकेंगे। साथ ही वर्तमान भारतीय नागरिकों पर भी यही प्रतिबंध लागू रहेंगे। लोकसभा में यह विधेयक पेश करने के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि मणिपुर और मिजोरम भी अब से इनर लाइन परमिट व्यवस्था के तहत आएंगे, जिसके चलते वहां नागरिकता संशोधन विधेयक लागू नहीं होगा। 2014 और 2019 दोनों लोकसभा चुनाव से पहले जारी घोषणा पत्र में भाजपा ने यह विधेयक लाने का वादा किया था। 2019 की शुरुआत में तत्कालीन एनडीए सरकार ने पूर्वोत्तर राज्यों के भारी विरोध के बीच इसे लोकसभा में पेश किया था, लेकिन राज्यसभा में इसे पेश नहीं किया गया जा सका था, जिसके चलते यह निष्प्रभावी हो गया था। लेकिन पिछले मई में सत्ता में आने के बाद पार्टी अपने हिंदुत्व के एजेंडे पर तेजी से आगे बढ़ी है। नागरिकता बिल उसी का एक हिस्सा है, लेकिन उससे पूर्वोत्तर में एक बड़ा संकट पैदा होता नजर आ रहा है।

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