कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री अदालत की शरण में - Naya India
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कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री अदालत की शरण में

आमतौर पर हमारे देश के वामपंथी दलों व उनके नेताओं को आर्थिक रूप से ईमानदार व पैसे खर्च करने के मामले में कंजूस माना जाता है। जब मैं वामपंथी दल कवर करता था तब वहां प्रेस कांफ्रेंस में मुझे टूटे कपो में चाय व बिस्कुट परोसे जाते थे। ज्यादा कप (मग) या तो टूटे हुए होते अथवा उनके हैंडल टूटे हुए होते। माकपा के जाने माने नेता इंद्रजीत गुप्त जब संयुक्त मोर्चा संघ में गृहमंत्री बने तब भी उन्होंने बंगला लेने की जगह वेस्टर्न कोर्ट में रहना नहीं छोड़ा। वामपंथी दलो के नेता बताते थे कि उन लोगों को अपने खाना पकाने की गैस, टेलीफोन आवंटित करने का कोटा (यह उन दिनों हुआ करता था) से लेकर अपने सरकारी आवास तक पार्टी हाईकमान की इच्छा व आदेश से किसी को देने पड़ते।

एक जाने-माने नेता तो जब मुझे किसी मुद्दे पर बातचीत करने के लिए बुलाते तो चाय आने पर एक प्लास्टिक के जार का ढक्कन खोलकर मेरे आगे रख देते थे। उस जार में बिस्कुट, काजू या कुछ नमकीन रखा होता था। जब मैं एक बार उसमें से कुछ ले लेता तो वे उसका ढक्कन बंद करके थोड़ी दूर पर रख देते थे। इसलिए आमतौर पर वामपंथी दलो के नेताओं व उनकी सरकारों पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगते थे।

मगर जहां एक और दुनिया व देश से उनका लगभग सफाया होने लगा है वहीं केरल की वामपंथी सरकार के मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमेबाजी का सामना कर रहे हैं। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन पर भ्रष्टाचार का मुकदमा चल रहा है जोकि अब सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है।यहा मामला 1996-97 का है तब पिनाराई विजयन तत्कालीन वामपंथी सरकार में बिजली मंत्री हुआ करते थे। उनके कार्यकाल के दौरान केरल स्टेट इलेक्ट्रीसिटी बोर्ड (केएसईबी) ने अपनी तीन ताप बिजली परियोजनाओं का आधुनिकीकरण करने के लिए कनाडा की कंपनी एसएनसी लवलीन के साथ इस संबंध में करार करने का फैसला किया। हालांकि इस बीच राज्य में सत्ता परिवर्तन हो जाने के कारण इस संबंध में करार (एमओयू) पर कांग्रेंस शासन के दौरान दस्तखत किए गए।

इस करार के तहत कनाडा की कंपनी को 239.81 करोड़ की तय राशि के तहत अपने उपकरण व इंजीनियरिंग सेवाएं उपलब्ध करवानी थी ताकि बिजली घरों का नवीनीकरण किया जा सके। करार के तहत यह नवीनीकरण सितंबर 2001 तक पूरा हो जाना चाहिए था। मगर यह फरवरी 2003 में पूरा हुआ। तब तक इसकी कीमत 250.40 करोड़ पहुंच गई थी। इसके अलावा करार की उस शर्त को भी कनाडाई कंपनी ने पूरा नहीं किया जिसके तहत उसे 69.83 करोड़ की राशि तकनीक के हस्तांतरण व भारतीय कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर खर्च करनी थी। इस कंपनी द्वारा दिए गए कुछ उपकरण खराब व कुछ काम में न आने योग्य पाए गए।

इसके जवाब में लवलीन ने 98.30 करोड़ राशि की लागत से मलाबार में कैंसर अस्पताल का निर्माण करने की हामी भरी। कनाडा की कंपनी ने वादा व करार करने के बाद भी फरवरी 2001 तक महज 8.98 करोड़ की राशि ही अस्पताल के लिए उपलब्ध करवाई। इस घटना पर केरल विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ था। उसकी विषय समिति ने पाया कि इस समझौते के कारण सरकार को बहुत मोटा नुकसान हुआ। एक साल बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकार ने इस मामले की सतर्कता जांच करवाने का आदेश जारी किया। मगर इस मामले में कोई भी प्रगति नहीं हुई।

पर 2005 के नियंत्रक व महालेखाकार ने अपनी रिपोर्ट में यह खुलासा किया कि इस करार के कारण राज्य सरकार को 37.5करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। इस खुलासे के बाद सतर्कता विभाग की जांच में तेजी आई व उसने 2006 में अपनी जांच रिपोर्ट अदालत में दाखिल कर दी। उसने अपनी रिपोर्ट में केएसईबी के आठ अधिकारियों को दोषी पाया। तब इस बात पर बहुत हंगामा मचा। यह कहा जाने लगा कि दबाव के चलते जांच में किसी भी नेता को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमान चांडी ने जांच सीबीआई को सौंपे जाने का ऐलान कर दिया मगर मई 2006 में वामपंथी सरकार पुनः सत्ता में आ गई। विजयन उसके राज्य सचिव थे। इस पर किसी ने हाईकोर्ट में इस मामले की जनहित याचिका दायर कर दी जिसमें इस मामले की सीबीआई से जांच करवाए जाने की मांग की गई थी।

तत्कालीन राज्य सरकार ने इस जांच की मांग का विरोध किया। मगर 2007 में अदालत ने मामले की सीबीआई की जांच करवाए जाने के आदेश दे दिए। सीबीआई ने जनवरी 2009 में अपनी रिपोर्ट दाखिल कर दी जिसमें विजयन को दोषी ठहराया गया था जोकि तब तक राज्य सरकार में मंत्री बन चुके थे। सीबीआई ने उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए राज्य सरकार से अनुमति मांगी। जून 2009 में केरल के तत्कालीन राज्यपाल आरएस गवई ने इसकी अनुमति दे दी। वामपंथी दलों के इतिहास में पहली बार किसी पोलिटब्यूरो के सदस्य को भ्रष्टाचार के मामले में सजा दिए जाने का मामला सामने आया था।

सीबीआई की रिपोर्ट में जिन अफसरों के नाम थे उनमें से ज्यादातर या तो रिटायर हो गए थे अथवा मर गए थे। विजयन को भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत दोषी पाया गया था। उन पर धोखाधड़ी करने का आरोप भी लगाया गया। सीबीआई ने पाया कि विजयन ने यह करार करने में जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी व जल्दी दिखाई। मंत्रिमंडल की मंजूरी लिए बिना ही यह करार कर डाला। एसबीआई पर बैंक गारंटी में छूट देने का दबाव डाला व केएसईबी की औपचारिक सहमति के बिना ही यह करार कर डाला।

अब इस मामले से बचने के लिए मुख्यमंत्री सुप्रीम कोर्ट की शरण में गए हैं व इस मामले की सुनवाई 12 अक्टूबर को है। अगर सुप्रीम कोर्ट उनके खिलाफ सीबीआई को अपनी कार्यवाही जारी रखने का फैसला देता है तो संभवतः वामपंथी दलो के इतिहास में किसी मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप का मुकदमा चलाने का यह पहला मामला साबित होगा। हालांकि जब पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों के मुख्यमंत्री की सरकार थी तब भी उनके बेटे को लेकर तरह-तरह की खबरें छपती थी। यह शायद राजनीति की खूबी है कि यह किसी को नहीं छोड़ती है।

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