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संकट में भी हसीन सपने

भारत सरकार छोटे, मझौले और बड़े उद्योगों को क्या प्रोत्साहन पैकेज देगी, इस पर अब तक कयास ही लगाए जा रहे हैं। इस बीच सरकार का हेडलाइन मैनेजमेंट विभाग खूब सक्रिय है। पैकेज के ख्याली पुलाव तो रोज ही मीडिया में परोसे जाते हैं, साथ ही यह भी लोगों को बताया जा रहा है कि मौजूदा संकट असल में भारत के लिए अवसर साबित होगा। चीन से भाग रही कंपनियों को लुभाने के लिए सरकार ने पुख्ता योजना बनाई है। लग्जमबर्ग से बड़ा लैंड बैंक बनाया जा रहा है, श्रम सुधार लागू किए जा रहे हैं और इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जा रहा है। इसका नतीजा यह होगा कि भारत कई क्षेत्रों में मैनुफैक्चरिंग और सेवा निर्माण का हब यानी केंद्र बन जाएगा। यह इसी सिलसिले का हिस्सा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों से अपनी ऑनलाइन मीटिंग में उनसे सहज और सरल विदेशी निवेश-संबंधी रणनीतियां बनाने को कहा। दूसरी ओर केंद्र सरकार की व्यापार को बढ़ावा देने वाली कमेटी अमेरिकी निवेश-संबंधी नीति बनाने में लग गई है।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी उम्मीद जताई है कि कोविड से चीन की घटती विश्वसनीयता के चलते जो अमेरिकी कम्पनियां वहां से पलायन कर रही हैं, उन्हें साझा निवेश के रास्ते भारत लाया जा सकता है। इससे अकेले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में ही 20-25 लाख करोड़ का निवेश हो सकता है। पिछले हफ्ते अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों और अमेरिकी कंपनियों के भारत-प्रतिनिधियों के बीच अमेरिकी चैम्बर ऑफ कामर्स की बैठक में इस पर गहन चर्चा हुई। यहां उन कंपनियों को ख़ास नसीहत दी गई, जिन्होंने चीन से अपना बिजनेस हटाने का मन बना लिया है। लेकिन ऐसी चर्चाएं चीन और अमेरिका के व्यापार-युद्ध के मद्देनजर पिछले साल से ही हो रही है। भारत अमेरिका स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फोरम के मुताबिक लगभग 200 अमेरिकी कंपनियां चीन से बाहर निकलने को इच्छुक हैं। भारत में निवेश उनके लिए एक अच्छा अवसर होगा। मगर इस घटनाक्रम की एक हकीकत यह है कि चीन से निकलने वाली अनेक कंपनियों ने वियतनाम, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, और यहां तक कि इंडोनेशिया तक को चुना है। दूसरी अहम बात यह है कि भारत में कोरोना संकट अभी क्या रूप लेगा, यह साफ नहीं है। भारत के सामाजिक हालात पर भी वैश्विक मीडिया में नकारात्मक चर्चाएं रही हैं। ऐसे अभी जारी तमाम चर्चाएं मुंगेरी लाल के हसीन सपने बन कर ना रह जाएं, इसे सुनिश्चित करने की जरूरत होगी। सरकार का अब तक रिकॉर्ड इस ओर बहुत भरोसा बंधाने वाला नहीं है।

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