आठों पहर पहरे पर रहने वाले अहमद भाई

कोरोना तो बहाना था। अहमद पटेल की जान उस जज़्बाती जज़्बे ने ली है, जिसके चलते उन्होंने अपने दिन-रात राजनीतिक मसलों, घटनाओं और व्यक्तित्वों के मेंढक तोलने में झोंक रखे थे। यह अलग बात है कि अहमद भाई यह काम जितनी सिफ़त, नफ़ासत और सहजता से करते नज़र आते थे उससे लगता था कि वे गोया इसी के लिए बने हैं, मगर उनके जी के भीतर कितने जंजाल उमड़ते-दफ़्न होते रहते थे, यह उन्हें ज़रा नज़दीक से जानने वाले ही जानते हैं। ऐसी घनचक्करी सियासत के कड़ाह में अपने कम-से-कम बीस आख़िरी बरस जिस शख़्स ने गले-गले डूब कर बिताए हों, उसके ज़िस्म के अंग-अंग पत्थर के भी रहे हों तो भी कब तक सलामत रहते? तिस पर निजी ज़िंदगी के अपने कष्ट भी कुछ कम नहीं थे। ऐसे में मो-से दिल-जिगर वाले अहमद भाई वे सप्रयास सहज बने रहने का अनवरत अभ्यास करते लगते थे।

मैं और अहमद भाई एक-दूसरे को 1983 से जानते थे। पहले दूर से, फिर कुछ कम दूर से, फिर थोड़ा नज़दीक से और फिर कुछ और नज़दीक से। उनमें एक ऐसा कन्हैया-तत्व था कि उनके 84 हज़ार हमजोलियों मे से हर-एक को यह आभास होता था कि वे सिर्फ़ उसी के नृत्य-भागीदार हैं। सब को एक-से अंतरंग-भाव से भिगोए रखने का उनमें कुदरती हुनर था। लेकिन सब के दायरे तय थे, सबसे विचारों के आदान-प्रदान की सरहदें तय थीं, सबसे अपने मनोभाव साझा करने की पर्दानशीनी तय थी और सबसे मिलने-जुलने का समय-दरीचा तय था। अहमद भाई ने मिलने के लिए किस को वक़्त के किस झरोखे में बिठाया है, उससे बिला शक़ यह बताया जा सकता था कि कोई भले ही उनसे अपनी कितनी ही नज़दीकी मानता हो, वे किसे कितना अपना समझते हैं।

ख़ासतौर पर पिछले दो दशक में मैं ने अहमद भाई और दिन-रात के आठ प्रहरों से उनके रिश्ते का जम कर एकलव्यी-अध्ययन किया। वे अपने संबंधों-संपर्कों का न तो ख़ुद बखान करते थे और न नाम-टपकाऊ लोगों को पसंद किया करते थे। सत्ता के बरामदे ऐसे लोगों से हमेशा गुलज़ार रहते हैं, जो अपने संपर्कों का सूरमा-भोपालीकरण किए बिना रह ही नहीं सकते। मुझ जैसे कई लोग हैं, जिन्हें रायसीना-पठार पर चार दशक की अपनी भटकन के दौरान यशपाल कपूर, आर. के. धवन, पी. सी. एलेक्जेंडर, धीरेंद्र ब्रह्मचारी, माखनलाल फोतेदार, अरुण नेहरू, कप्तान सतीश शर्मा, विन्सेंट जॉर्ज, भूरेलाल, रंजन भट्टाचार्य, प्रमोद महाजन, चंद्रास्वामी, ब्रजेश मिश्रा, टी, के, ए. नायर और अमर सिंह से ले कर सीधे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, चंद्रशेखर, पी. वी. नरसिंहराव, अटल बिहारी वाजपेयी और पता नहीं किस-किस तक अपनी पहुंच रखने वाले मुखारविंदों से बहते झरने में स्नान करने का आनंद मिला है।

सो, ऐसा ही एक लंबा दौर था कि दिल्ली तो दिल्ली, देश के हर शहर में बहुत-से लोग अहमद भाई यानी ए.पी. से अपनी गलबहियों के किस्से सुनाते हुए इठलाया करते थे। उनके साथ झूला झूलने के दावों का मंचन देख-सुन लेने के बाद अपने एक सवाल के जवाब से मैं ऐसे लोगों के सपनों की झील के पानी की गहराई नाप लिया करता था। सवाल बित्ते भर का होता था कि आप पिछली बार उनसे कब और कितने बजे मिले थे? ज़्यादातर फांकू इसका जवाब इसलिए गोल कर देते थे कि उन्हें लगता था कि कहीं यह मुलाक़ातियों की सूची की पड़ताल करने की स्थिति में तो नहीं है? सो, जवाब मिलता था कि हमारी मुलाक़ात जब भी होती है, असूचीबद्ध रहती है–अनलिस्टेड। नज़दीकियों की गहराई का दिखावा करने का यह चना ज़ोर गरम भी ग़ज़ब है।

अहमद भाई किसे पूर्वाह्न में मिलने बुलाते हैं और किसे मध्याह्न में; किसे अपराह्न में बुलाते हैं और किसे सायंकाल में; किससे प्रदोष-काल में बात करते हैं और किससे निशिथ-काल में; किससे त्रियामा-काल में मिलते हैं और किससे उषा-काल में; इससे आप किसी के भी प्रति उनके विश्वास का रेखा-चित्र गढ़ सकते थे। अहमद भाई आठों पहर काम करते थे और आधी रात के बाद किसी को बुलाते तो यह बहाना सुनने को तैयार नहीं होते थे कि ड्राइवर चला गया है, सुबह आ जाऊंगा। ऐसे में जवाब मिलता था कि मेरा नहीं गया है, आपको लेने आ रहा है। बेचारे बड़े-बड़े मंत्री उनके देर रात बुलावे के टपके के डर से रात के भोजन के पहले का रसरंजन करने में बीस बार सोचते थे।

अहमद भाई तो सूफ़ी थे, सो, उन्हें रसरंजन का महत्व मालूम ही नहीं था। पांच वक़्त के नमाज़ी थे। हर बरस रोज़ा रखते-ही-रखते थे। हज़ भी कर आए थे। मगर कठमुल्लों के उतने ही ख़िलाफ़ थे, जितने हम-आप तमाम व्रत-पूजन करते हुए भी हिंदू-अतिरेक के विरोधी हैं। देवताओं ने तो द्वापर युग के बाद से जन्म लेना बंद ही कर दिया है, इसलिए इस घनघोर कलियुग में, और सो भी सियासत की गलाकाटू मारामारी के मैदानों में, देवता तो आपको खोजे कहां मिलेंगे? मगर इतना मैं ज़रूर कहूंगा कि अहमद भाई जैसे मानवधर्मी व्यक्ति की अलविदाई ने कांग्रेस और सोनिया गांधी को ही विपन्न नहीं किया है, पूरे राजनीतिक संसार में सकारात्मकता, प्रतिबद्धता, निष्ठा, सहजता, भलमनसाहत और संवेदना का एक अपूरणीय शून्य पैदा कर दिया है।

ज़िंदगी बलिष्ठ शरीर से लंबी नहीं होती है। मनुष्य को उसका मनोबल दीर्घजीवी बनाता है। और, मनोबल सहारों से सुदृढ़ होता है। दूर टिमटिमाते दीये की लौ के सहारे पूस की रात बर्फ़ीले पानी में खड़े-खड़े बिताने के क़िस्से यूं ही नहीं बने हैं। पत्रकारिता के शैशव-काल में हम में से कई इसलिए अपना इस्तीफ़ा ज़ेब में रख कर घूमते थे कि हमारे संपादक ऐसे लोग हुआ करते थे, जो क्षोभ और गुस्से में दिया इस्तीफ़ा फाड़ कर उसके टुकड़े हमारे हाथ में पकड़ा दिया करते थे। इस से मुझ जैसे कई पत्रकारों को अपनी क्षमता और पराक्रम से दुगना-चौगुना करने का हौसला मिला। फिर ऐसे संपादकों का दौर आया, जो बुला कर इस्तीफ़ा मांगने लगे। इसने पूरी पत्रकारिता का हौसला पस्त कर उसका चरित्र ही बदल दिया।

अहमद भाई सियासत के संसार का ऐसा ही सहारा थे, जिनसे मिलने वाला हौसला बुनियादी अंकुरों को बचाए रखता है। कांग्रेस के भीतर उबलती-खदकती देगचियों की भाप उनके बैठक-खाने में पहुंच कर शांत हो जाती थी। आपकी जलती मशाल को बुझा कर उसे ज़िंदाबादी-बैनर बना देने की महारत उनमें थी। भले ही उनके ख़ुद के भीतर का लावा उन्हें ख़ुद भी आपके साथ मशाल उठाने की कगार तक पहुंचा रहा हो, मगर अग्निशमन-प्रमुख की अपनी कर्तव्यनिष्ठा के चलते बहुत बार मन मार कर भी वे अपनी भूमिका का निर्वाह करते रहे।

ऐसी कथाओं पर पूरी एक क़िताब लिखी जा सकती है। लेकिन ऐसी क़िताबों से भी होता-जाता क्या है? अभी तीन दिन ही हुए हैं और मैं अहमद भाई के बारे में ऐसे-ऐसे संस्मरण-बहादुरों के आलेख पढ़ने के पाप का भागी बन चुका हूं कि लगता है, ज़मीन फट क्यों नहीं जाती? दूर-दूर तक जिनका कहीं पता नहीं होता, एकाएक वे ऐसा रूप धर कर प्रकट होते हैं कि अच्छे-अच्छे चौकड़ी भूल जाएं। यही हमारे ज़माने का दस्तूर है। इसी उत्क्रांति की डोर पकड़ कर कैसे-कैसों ने अपने सीने पर तरह-तरह के पदक टांग रखे हैं। बहरहाल। आज जब राजनीति की समूची दुनिया और ख़ासकर कांग्रेस पार्टी का अंतःपुर पारस्परिक संवेदनाओं के सबसे भोंथरे दौर से गुज़र रहे हैं, अहमद भाई कुछ बरस और रहते तो बड़ा अच्छा होता! (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares