सावरकर को भारत-रत्न

महाराष्ट्र के चुनावों में भी वही हो रहा है, जो हरियाणा के चुनावों में हो रहा है। वोटरों को पटाने के लिए कांग्रेस, भाजपा और शिवसेना तरह-तरह के रसगुल्ले उछाल रही हैं। यहां उनकी गिनती गिनाना निरर्थक ही होगा। इस घोषणा-पत्रों या संकल्प-पत्रों में जिस मुद्दे पर विवाद छिड़ गया है, वह है, सावरकर को भारत-रत्न दिलवाने का मुद्दा। भाजपा और कांग्रेस में इस मुद्दे पर भिड़ंत हो गई है।

मेरी राय है कि कांग्रेस और भाजपा, दोनों के ही नेता हवा में लट्ठ उछाल रहे हैं। शून्य में विहार कर रहे हैं। उन्हें सावरकर के जीवन और विचारों के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। इस संबंध में मैंने अपने ग्रंथ ‘भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान’ में काफी शोधपूर्ण सामग्री दी है लेकिन मैं यहां सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि सावरकर के लिए भारत-रत्न एक कागज के टुकड़े के अलावा क्या है ?

भारत सरकार का यह सर्वोच्च पुरस्कार ऐसे-ऐसे जीवित और मृत लोगों को दिया जा चुका है, जो त्याग, तपस्या, साहस और पांडित्य के हिसाब से विनायक दामोदर सावरकर के पासंग के बराबर भी नहीं हैं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तो खुद को ही यह पुरस्कार दे दिया था। यह पुरस्कार कौन देता है ? उसकी प्रामाणिकता क्या है ? इस पुरस्कार के मानदंड क्या हैं ? इसके अलावा इस तरह के सरकारी पुरस्कारों को पाने के लिए जो नाक रगड़ाई, तलुवा-चाटन और दलाली करनी पड़ती है, क्या वह कोई स्वाभिमानी आदमी कर सकता है ?

जितने महानुभावों को आज तक ये सरकारी सम्मान या पुरस्कार या उपाधियां मिली हैं, उनमें से कितनों के नाम लोगों को याद हैं ? क्या उन महानुभावों को लोग भूल गए हैं, जिन्हें कोई सरकारी सम्मान नहीं मिला लेकिन जिन्होंने देश के लिए बड़ी-बड़ी कुर्बानियां की हैं ? यह ठीक है कि सावरकर और साबित्रीबाई फुले को भारत-रत्न देने का संकल्प भाजपा को महाराष्ट्र में वोट दिलाने में मदद करेगा।

लेकिन यह संकल्प चुनाव के वक्त ही क्यों किया जा रहा है ? पिछले पांच साल आपने क्या किया ? पुरस्कारों और सम्मानों के मायाजाल में फंसने की बजाय बेहतर तो यह होगा कि सावरकरजी के जो भी विचार आज सुसंगत और उपयोगी हों, उन्हें प्रचारित करने और उन पर अमल करने की कोशिश की जाए।

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