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कांग्रेस का नव चिंतन

राहुल गांधी का यह स्वीकार करना अहम है कि कांग्रेस का जनता का जनता से संवाद टूट गया है। उनकी दूसरी यह बात महत्त्वपूर्ण है कि भाजपा के खिलाफ संघर्ष में अब कोई शॉर्ट कट नहीं है।

कांग्रेस ने उदयपुर में अपने चिंतन शिविर में अपने और देश के वर्तमान यथार्थ को स्वीकार करने का साहस दिखाया- यह कहा जा सकता है। इसके अनुरूप उसने अपनी रणनीति और कार्यनीति को ढालने का फैसला किया है- यह भी वहां स्वीकार किए गए नव संकल्प घोषणा पत्र से स्पष्ट है। असल में क्या होगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन कुछ बातों ने ध्यान खींचा। मसलन, राहुल गांधी का यह स्वीकार करना कि कांग्रेस का जनता का जनता से संवाद और संपर्क टूट गया है। उनकी दूसरी यह बात महत्त्वपूर्ण है कि भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह सत्ता के सभी केंद्रों पर अपनी पकड़ बना ली है, अब उसके खिलाफ संघर्ष में कोई शॉर्ट कट नहीं है। दरअसल, संघर्ष की बात कहना ही अपने-आप में अहम है। इससे बात चुनावी रणनीति और जोड़-तोड़ से आगे जाती है। यह समझ भी सही दिशा में है कि अब कांग्रेस के नेता हों या कार्यकर्ता- सबको जनता के बीच सचमुच जाना होगा- यानी सिर्फ जनता के पास जाने की रस्म-अदायगी से काम नहीं चलेगा।

इसके साथ ही कांग्रेस ने अपने राजनीतिक-आर्थिक- सामाजिक संदेशों का भी नव-आविष्कार करने की कोशिश की है। मसलन, अर्थव्यवस्था के संबंध में उसका फिर से सार्वजनिक क्षेत्र की मुख्य भूमिका पर जोर देना, आर्थिक नीति में रोजगार को केंद्रीय महत्त्व देना, किसानों की स्वामीनाथन फॉर्मूले के मुताबिक न्यूनतम मूल्य की मांग का समर्थन करना, और नए सामाजिक यथार्थ के मुताबिक सामाजिक प्रतिनिधित्व की बात को स्वीकार करना- एक नव चिंतन की तरह है। अगर ये चिंतन सचमुच कांग्रेस नेतृत्व, संगठन और कार्यकर्ताओं के मानस में उतर पाया, तो कहा जा सकता है कि हाल की चुनावी हार से लगे झटके सार्थक हुए हैँ। अगर इस चिंतन से कांग्रेस इस भ्रम से निकल पाई कि वह भारत में शासन की कुदरती पार्टी है और अपने को प्रबंधकीय भूमिका से निकाल कर फिर राजनीतिक संगठन बना पाई, तो उसके पुनरुद्धार की जमीन तैयार हो सकती है। देश को उससे ऐसी समझ और पहल की आशा है, यह एक जग-जाहिर बात है। इसलिए उसके नए संकल्प पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।

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