कांग्रेस को कौन संभालेगा?

बड़ा अजब है अहमद पटेल की मृत्यु के बाद यह सुनना कि अब कांग्रेस का क्या होगा? इससे जहां यह मालूम होता है कि पिछले सौलह सालों से कांग्रेस और सोनिया गांधी एक-दूसरे के पर्याय थे तो दोनों के पर्याय अहमद पटेल थे तो वहीं यह संकट भी जाहिर है कि कांग्रेस में दूसरा कौन है जो सोनिया गांधी और कांग्रेस को वैसे चला सकें जैसे अहमद पटेल ने चलाया था। तभी अहमद पटेल के बाद कांग्रेस में प्रबंधन का खालीपन गंभीर है।

कांग्रेस को संभालने का मतलब है कि अहमद पटेल की जगह पार्टी में अगला वह कौन नेता होगा जो बागी तैंवर दिखा रहे कांग्रेसी नेताओं और सोनिया गांधी व राहुल गांधी में तालमेल बनवा सकें? दोनों तरफ बात कर सबकुछ सामान्य बनवा सकें? पार्टी के नए नेताओं और पुराने बुजुर्ग नेताओं में समान धमक- अधिकार से बात कर नए-पुरानों की केमेस्ट्री बनवाएं रखें? देश के सभी प्रदेश अघ्यक्षों, विधायक दल नेताओं आदि को निजी तौर पर जो जानता-समझता हो और फोन करें तो सामने वाला तुंरत रिस्पोंस दें? पांच महिने बाद बंगाल, तमिलनाड़ु जैसे अंहम राज्यों में विधानसभा चुनाव है तो इन राज्यों में लेफ्ट, ममता से या तमिलनाडु में डीएमके के आला नेताओं से निजी कैमेस्ट्री में एलायंस, चुनावी रणनीति बनवाने का कौन काम करेगा? चुनाव खर्च के लिए अंबानी, अडानी जैसों से चंदे के लिए कौन फोन करेगा?

ऐसे असंख्य काम है जो पार्टी दफ्तर की व्यवस्थाओं से ले कर प्रदेशों में अपने मुख्यमंत्रियों से तालमेल रखने से ले कर विपक्ष के आला नेताओं से संपर्क-संवाद के दायित्व में भारी-भरकम है। या तो ये काम खुद सोनिया गांधी, राहुल, प्रियंका खुद करें लेकिन इनका शरद पवार, ममता बनर्जी, तेजस्वी, हेमंत सोरेन, उद्धव ठाकरे या अमरेंद्र सिंह, अशोक गहलोत से बात-बात पर फोन करना, मुलाकात कर सकना संभव नहीं है। वी जार्ज, कनिष्कसिंह या वेणूगोपाल की वह एथोरिटी नहीं बन सकती जो अहमद पटेल की थी।

उस नाते या तो सोनिया गांधी कांग्रेस कार्यसमिति के किसी बुजुर्ग सदस्य को राजनैतिक सलाहकार बनाए या राहुल गांधी के सुपुर्द सबकुछ छोड़ उन्हे कहें कि जो करना हो करें। हिसाब से यही होना चाहिए। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को जब अंततः पार्टी संभालनी है तो वे अपने महासचिव से काम कराएं या किसी को राजनैतिक सचिव, कोषाध्यक्ष बनाए, उन्ही को सब करने देना चाहिए। अहमद पटेल के साथ सोनिया गांधी की अध्यक्षता का अध्याय या तो समाप्त हो या फिर अंबिका सोनी, दिग्विजयसिंह, अशोक गहलोत जैसे पुराने मगर वफादारों में किसी एक को राजनैतिक सलाहकार या पार्टी अध्यक्ष बना कर राहुल गांधी को क्रमशः पार्टी सुपुर्द करने की सोच बने।

दिक्कत है कि राहुल गांधी जिद्दी है तो अध्यक्ष पद के चुनाव के बावजूद अध्यक्ष बनने को शायद तैयार नहीं हो। उधर गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा ने चिठ्ठी लिख जिस तरह की दबाव राजनीति की है उससे सोनिय-राहुल इस जमात के नेताओं में से किसी को अहमद पटेल जैसी हैसियत में पदासीन करें यह संभव नहीं। तभी सोनिया-राहुल-प्रियंका के लिए नया राजनैतिक सलाहकार बनाना मुश्किल काम है तो परिवार बाहर के किसी और को अध्यक्ष बनाना भी आसान नहीं है। पुराने नेताओं में वफादारी की कसौटी में लेकर दिग्विजयसिंह और कमलनाथ का नाम है जो कांग्रेस को संभाल सकते है तो कोषाध्यक्ष के पद के साथ एआईसीसी दफ्तर को भी। क्या राहुल गांधी के खास वेणूगोपाल की भूमिका अहमद पटेल जैसी नहीं हो सकती? यह तभी संभव है जब राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष बन पार्टी को वैसे ही चलाने लगे जैसे बिहार में तेजस्वी राजद के ब़ॉस बने है। मगर कांग्रेस कार्यसमिति के बुजुर्ग सदस्यों और सोनिया गांधी के संक्रिय रहते हुए कांग्रेस में राजद जैसे कमान ट्रांसफर संभव नहीं है।

इसलिए सभंव है कुछ महिने कांग्रेस में अहमद पटेल की भूमिका का खालीपन रहे। सोनिया गांधी पर दारोमदार है कि वे तमाम तरह की चिंताओं, किंतु-परंतु के बीच राहुल गांधी को सबकुछ संभालने का दो टूक फैसला ले पाती है या नहीं!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares