कांग्रेस का संकट विचार का है

कांग्रेस में जब से संकट का नया दौर शुरू हुआ तब से कोई कह रहा है कि वहां नए टैलेंट की परवाह नहीं है तो कोई कह रहा है कि कांग्रेस में अनुभव की कद्र नहीं है और किसी का कहना है कि पार्टी में नेतृत्व अच्छा नहीं है पर असली बात कोई नहीं कह रहा है कि कांग्रेस में विचार का संकट है। असलियत यह है कि कांग्रेस अपने मूल विचार से भटक गई है और नए विचार गढ़े नहीं हैं, जिसकी वजह से वह अपनी मौजूदा दुर्गति तक पहुंची है।

असल में नेतृत्व कभी भी कांग्रेस पार्टी की समस्या नहीं रही है क्योंकि आजादी के बाद से उसके पास नेहरू-गांधी परिवार का एक चमत्कारिक नेतृत्व रहा है। जिन दूसरी पार्टियों के पास ऐसा वंशानुगत नेतृत्व नहीं था उनके यहां भी नेतृत्व की समस्या नहीं रही। क्या कोई कह सकता है कि भारतीय जनसंघ या भाजपा में कभी नेतृत्व की कमी रही? कभी नहीं रही, इसके बावजूद वह बरसों तक राजनीति में हाशिए पर रही तो उसका कारण यह था कि उस समय की कांग्रेस की विचारधारा के बरक्स जनसंघ और भाजपा के पास कोई ठोस विचार नहीं था। इसी तरह वामपंथी पार्टियों के पास जब तक विचार था, तब तक उनका आधार पूरे भारत में था। नब्बे के दशक तक कम्युनिस्ट पार्टियां भारतीय राजनीति की एक मजबूत धुरी थीं लेकिन मंडल की राजनीति की वजह से जिन जातिवादी पार्टियों का उभार हुआ उनका साथ देकर वामपंथी पार्टियों ने वर्गहीन समाज के अपने मूल विचार को खत्म कर दिया। तभी अच्छा नेतृत्व होते हुए भी पार्टी खत्म होने की कगार पर पहुंच गई। कमोबेश यहीं गलती कांग्रेस ने भी की है, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ रहा है।

आज जो लोग राज्यों के छोटे-छोटे क्षत्रप किस्म के नेताओं की बगावत को कांग्रेस की समस्या मान रहे हैं और इसे नेतृत्व का संकट बता कर कांग्रेस और उससे भी ज्यादा राहुल गांधी को कोस रहे हैं उन्हें कांग्रेस का इतिहास नहीं पता है। कांग्रेस पार्टी का इतिहास टूटने और बिखरने का रहा है। देश की समाजवादी पार्टियों से भी ज्यादा कांग्रेस टूटी है। कांग्रेस में जब भी नेतृत्व परिवर्तन होता है या देश व समाज ऐतिहासिक करवट लेता है तो कांग्रेस टूटती है, लेकिन उससे कांग्रेस की सेहत पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। देश आजाद होने के तुरंत बाद 1948 में कांग्रेस पार्टी टूटी थी, जब जयप्रकाश नारायण सहित कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सारे नेता कांग्रेस से अलग हो गए थे तो क्या वह जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व की कमजोरी थी? इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के तीन साल बाद 1969 में कांग्रेस का सबसे बड़ा विभाजन हुआ। के कामराज ने तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ही पार्टी से निकाल दिया। इंदिरा गांधी एक तरफ और के कामराज, मोरारजी देसाई, एस निजलिंगप्पा, नीलम संजीव रेड्डी, एसके पाटिल जैसे दिग्गज दूसरी तरफ। क्या वह टूट इंदिरा गांधी के कमजोर नेतृत्व की वजह से हुई थी? इंदिरा गांधी के रहते चंद्रशेखर के नेतृत्व में कांग्रेस का एक दूसरा विभाजन भी हुआ था।

राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तब वीपी सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी टूटी। जब पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष बने तो नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, माधव राव सिंधिया, शीला दीक्षित जैसे नेताओं ने पार्टी तोड़ी। फिर सोनिया गांधी अध्यक्ष बनीं तो शरद पवार, ममता बनर्जी, जीके वासन ने अलग होकर पार्टी बनाई। बाद में जगन मोहन रेड्डी भी अलग हुए। सो, जब राहुल गांधी कमान संभाल रहे हैं और कांग्रेस में फिर टूट-फूट हो रही है तो यह न कोई बड़ी बात है और न कोई नई बात है। जो लोग इस बात पर छाती पीट रहे हैं कि सब छोड़ छोड़ कर चले जाएंगे तो कौन बचेगा- अकेले राहुल गांधी, उन्हें कांग्रेस के टूटने, बिखरने और फिर बनने का इतिहास पढ़ना चाहिए।

सो, नेतृत्व कांग्रेस की समस्या नहीं है, उसकी समस्या विचार की है। विचार की समस्या के दो पहलू हैं। पहला तो यह है कि कांग्रेस समय के साथ अपने मूल विचारों को छोड़ती गई है। आजादी के समय जिन मूल्यों पर कांग्रेस की राजनीति आधारित थी वो मूल्य समय के साथ कमजोर होते गए। दूसरा पहलू यह है कि भारतीय जनता पार्टी के नए नेतृत्व यानी नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने जिस विचार को आधार बना कर व्यापक ध्रुवीकरण की राजनीति की उसके बरक्स कांग्रेस तत्काल कोई वैकल्पिक विचार नहीं खोज सकी। वह वैकल्पिक विचार कांग्रेस का अपना बुनियादी विचार भी हो सकता है परंतु अगर ऐसा लग रहा है कि मौजूदा समय के हिसाब से नए वैकल्पिक विचार की जरूरत है तो कांग्रेस उसे भी तलाशने में विफल रही है।

इसका एक कारण यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को हर विचार का प्रतिनिधि बना कर पेश किया हुआ है। वास्तविकता में भले उनका इन विचारों से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं हो पर अपने भाषण में वे जब भी किसी विचार का जिक्र करते हैं तो पूरी प्रतिबद्धता के साथ खुद को उससे जुड़ा हुआ बताते हैं। असलियत में वे एक सशक्त राष्ट्रवादी हिंदुत्व के विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं परंतु साथ ही देशभक्ति, धर्मनिरपेक्षता, सर्वधर्म समभाव, मानवाधिकार, महिला अधिकार, पर्यावरण सुरक्षा, आत्मनिर्भरता, इंडिया फर्स्ट, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भाषा की सुरक्षा, विज्ञान, किसान जैसे तमाम मुद्दों का भी चैंपियन खुद को बताते हैं। कांग्रेस की मुश्किल यह है कि वह लोगों को यह नहीं बता पाती है कि मोदी असल में किस विचार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। जब उसके अपने विचार स्पष्ट नहीं हैं तो वह लोगों को क्या बताए!

असल में पिछले काफी समय से कांग्रेस किसी भी मसले पर अपने विचार स्पष्ट नहीं कर पा रही है। जब से राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर मोदी का उदय हुआ तब से कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के बारे में अपने विचारों का खुल कर इजहार करना बंद कर दिया। ऐसा लग रहा है कि राहुल गांधी खुद को हिंदू दिखाने और साबित करने की जद्दोजहद में ज्यादा लगे हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है, उनकी दादी भी मंदिरों में जाती थीं और रूद्राक्ष पहनती थीं पर अल्पसंख्यकों के बीच भी उनको लेकर पूरा भरोसा था। इसी तरह से आर्थिकी की बात आती है तो कांग्रेस के विचार किसी को पता नहीं हैं। कभी वह एफडीआई का समर्थन करती है तो कभी विरोध करती है। कभी सरकारी कंपनियां खुद बेचती है तो कभी इन्हें बेचे जाने का विरोध करती है। वह कंफ्यूज है कि उसे नेहरू के मॉडल पर चलना है या मनमोहन सिंह ने जो मॉडल दिया है उस पर टिके रहना है। इसी तरह पर्यावरण से लेकर कूटनीति और भाषा से लेकर समाज के हर मुद्दे पर कांग्रेस दुविधा में है। वह एक स्पष्ट विचार नहीं प्रस्तुत कर पा रही है। यहीं उसकी असली समस्या है। इसलिए नेतृत्व जैसा भी है फर्क नहीं पड़ता है, कांग्रेस को विचार पर ध्यान देना चाहिए। वह अगर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के विचार के बरक्स कोई वैकल्पिक विचार प्रस्तुत करती है तभी वह भाजपा के लिए मजबूत चुनौती पेश सकती है।

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