कांग्रेस वालों जनसंघ को याद रखों!

पता नहीं कपिल सिब्बल को जनसंघ नाम याद है या नहीं? पार्टियों के मौजूदा नेताओं-टीवी चैनलों के एंकरों को शायद ही इतिहास ध्यान हो कि 1951 से लेकर 1977 तक भाजपा की पूर्वज जनसंघ पार्टी चुनावों में दो-पांच-बीस-बाईस सीटे जीतती थी। बाद में अटलबिहारी वाजपेयी- लालकृष्ण आडवाणी ने जनसंघ का भाजपा अवतार बनाया तो उसे 1984 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ दो सीटे मिली! जनसंघ से भाजपा तक हिंदू पार्टी के वोट तीन से सात प्रतिशत हुआ करते थे। तब जनसंघ या भाजपा कोई नगरपालिका जीतती, मसलन दिल्ली में महानगर परिषद् जीत लेती तो संघ वाले दीवाली मनाते थे। जाहिर है जनसंघ-भाजपा-आरएसएस ने कोई पैंतालिस साल विपक्ष में धक्के खाएं।

क्यों? इसलिए कि तब भारत का मतदाता कांग्रेस के आईडिया-उसकी विचारधारा में भला बूझता था। वे जनसंघ-भाजपा-आरएसएस की हिंदू चिंता-विचारधारा पर ठप्पा लगाने वाले नहीं थे। पर चुनाव-दर-चुनाव हारने के बावजूद जनसंघ में कभी यह हल्ला नहीं हुआ, मीडिया में यह नैरेटिव नहीं बना कि तीन सीटे मिली है तो श्यामाप्रसाद मुकर्जी निकम्मे है, लीडरशीप का टोटा है, उनसे पार्टी मुक्त पाएं। 1967 में विपक्ष-संविद-गैर कांग्रेसवाद की भारी हवा के बाजवूद जनसंघ को लोकसभा चुनाव में सिर्फ 35  सीटे मिली तो यह हल्ला नहीं हुआ कि दीनदयाल उपाध्याय भले मगर नासमझ- पप्पू है इसलिए पद छोड़े या उसके बाद 1971 के चुनाव में जनसंघ 22 सीटे ही जीत पाई तो हल्ला नहीं हुआ कि अटलबिहारी वाजपेयी फेल है। न तब सर्वशक्तिमान इंदिरा गांधी ने, उनकी सरकार, उनके मीडिया प्रबंधन ने हल्ला बनवाया कि वाजपेयी से जनसंघ डुबेगी। 1984 में आडवाणी की कमान में लोकसभा की दो सीटे आई तब भी भाजपा में किसी ने यह नहीं सोचा कि हार का कारण आडवाणी है।

क्या कपिल सिब्बल, कार्ति चिदंबरम, गुलाम नबी आजाद को यह इतिहास मालूम नहीं है? चुनाव में पार्टी विशेष की हार-जीत के पीछे दस कारण होते है लेकिन निर्णायक कारण मतदाताओं के बीच समय विशेष में बनी राय, मनोभावना होती है जिसका नेता के चेहरे से ज्यादा प्राथमिक रोल होता है। वक्त विशेष में लोगों के दिल-दिमाग में बनी राय से लोकतंत्र में, चुनाव में पार्टियों की जीत-हार होती है। 45 साल तक जनसंघ-आरएसएस की विचारधारा के लोग ग्राहक नहीं थे। हिंदू विचार का दीया टिमटिमाता जलता रहा लेकिन हिंदू मतदाताओं ने गांधी के महात्मा रूप, नेहरू की मनभावक गुलाबी उदार इमेज, आजादी की विरासत और बड़ी-बड़ी बातों की दिवानगी में नेहरू-गांधी की तीन पीढियों को राज भोग कराया। कांग्रेस सत्ता की पर्याय रही। तब भला जनसंघ और भाजपा की दुकान पर हिंदू ग्राहक कहां से जुटते?

मगर भाजपा का दीया हिंदू विचारधारा की लौ था तो 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत संघ की सेना के आक्रमण के साथ जब दुनिया बदलनी शुरू हुई तो इस्लाम का वह वैश्विक संर्घष बना जिसमें कई बलंडर हुए, कई भस्मासुर बने और जुनून, जिहाद का वह जलजला आया जिसने दुनिया में सोच बदली, राजनीति बदली और भारत में भी मुसलमान-इस्लाम पर खदबदाहट बनी। फिर वह घटनाक्रम बना जिसका किसी को पूर्वानुमान नहीं था। नतीजतन भारत में भी हिंदू बनाम मुस्लिम विमर्श शुरू हुआ और कांग्रेस के हिंदू वोट धीरे-धीरे भाजपा की और शिफ्ट होने लगे।

सोचे इस प्रक्रिया में दो सीट वाली भाजपा को कितना वक्त लगा? जवाब है चौदह साल! 1984 में लोकसभा की दो सीट से 1998 में 182 सीटों पर वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो आरएसएस-जनसंघ-भाजपा के पांच दशक के इंतजार के बाद वह था। मतलब 1951 से 1998 के 47 साल की तपस्या, इंतजारी के बाद हिंदू विचार हिंदू मतदाताओं को ग्राहक हुए। इस हकीकत में कांग्रेस की कपिल सिब्बल एंड पार्टी या सेकुलर जमात के बौद्धिकों  की इस बैचेनी का क्या अर्थ है कि कांग्रेस जीत क्यों नहीं रही या राहुल गांधी निकम्मे है!

मूर्खतापूर्ण है यह हल्ला, यह नैरेटिव की कांग्रेस छह सालों से हार रही है तो कांग्रेस खत्म है। सोचे 47 साल भाजपा हारती रही, वह अछूत रही लेकिन तब हल्ला नहीं था कि जनसंघ-भाजपा खत्म है। श्यामाप्रसाद, दीनदयाल, वाजपेयी, आडवाणी निकम्मे है! इन्हे हटाओं पार्टी बचाओं या संघ के खूंटे से मुक्ति दिलाओं तो पार्टी चलेगी। संघ से पार्टी आजाद नहीं हुई तो भाजपा सफल नहीं होगी।

कांग्रेस न खत्म हो सकती है न ऐसा मानना चाहिए और न ऐसा चाहना चाहिए। इसलिए कि देश का जरूरी विकल्प है कांग्रेस। जो कांग्रेस के खत्म होने याकि चुनाव हारने का रोना रो रहे है वे भूल रहे है कि उनके हित में, सबके हित में, देश के हित में है जो कांग्रेस को कभी खत्म हुआ नहीं माने। न ही गांधी-नेहरू परिवार के खूंटे से पिंड छुड़ाने की सोचे। खासकर सेकुलरों, वामपंथियों, गैर-भाजपा राजनीति की पैरोकार क्षेत्रिय पार्टियों को कांग्रेस को खत्म हुआ कतई नहीं बूझना चाहिए। कांग्रेस का होना उस वैकल्पिक विचारधारा का जिंदा रहना है जिससे भारत का भविष्य में बचा रहना संभव हो सकेगा। राहुल गांधी, प्रिंयका का मतलब नहीं है लेकिन परिवार के खूंटे से बंधी कांग्रेस का इसलिए है क्योंकि हिंदू और मुसलमान ने साझा तौर पर इस पार्टी से वह विरासत, वह अनुभव लिया है जिसमें साथ-साथ जीने का एक स्थापित भरोसा इतिहास में दर्ज है। और जो सर्वदेशीय, सर्ववर्ण, सर्व वर्ग, सर्वजन के बतौर मंच देश के हर गांव में ज़ड़ बनाए हुए है।

छह साल, दो आम चुनाव, दस-बीस साल देश की उम्र और राजनीति में मतलब नहीं रखते है। चुनाव हारना यदि पार्टी का मरना है तो उसे फिर पहले से ही मरा समझे। तब भला उस पर क्या विचार करना। जनसंघ का बेचारा दीया चालीस साल टिमटिमाएं चलता रहा तो वह लोकसभा-विधानसभा के असंख्य चुनावों में हारने के बाद मरा हुआ कहां था? उसने इंतजार किया। संघ के नागपुर मुख्यालय में लगन बनी रही कि हमारे भी दिन आएंगे क्योंकि दीये की तेल-बाती में हिंदू की चिंता है और जिस दिन आम हिंदू उस अनुसार दुनिया देखेंगा तो कांग्रेस का वक्त वैसे ही हाशिए में जाएगा जैसे -तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान। भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बाण!

ऐसा आगे नरेंद्र मोदी और भाजपा के साथ भी होगा क्योंकि 138 करोड लोगों के इस देश के यक्ष प्रश्नों में  विकल्प से नए जवाब बनेगें और जान बचेगी।

बहरहाल कांग्रेस और कांग्रेसजनों की तीन पीढियों ने अपनी विचारधारा में देश का राज चलाया। सत्ता भोगी। सत्ता के दसियों युद्ध जीते। अब वक्त बदला है और नरेंद्र मोदी-अमित शाह ने पानीपत की लड़ाई से हिंदुओं को गोलंबद करके सत्ता पाई है तो अभी तो महज छह साल हुए है। इतनी कम अवधि पर ही कांग्रेसी क्यों अपनी पार्टी पर अस्तित्व का संकट माने? क्यों राहुल गांधी और नेतृत्व की कमी बूझे? राजनीति में लड़ना जब विचार, विचारधारा, आईडिया से है तो उसे तुरत-फुरत दुरस्त-बदला नहीं जा सकता। संघ-जनसंघ ने 45 साल मेहनत कर हिंदू के घर-घर संदेश बनवाया तो उन तीरों की धार के अंत परिणामों तक तो इंतजार करें। कांग्रेसी अपने आईडिया ऑफ इंडिया को घर-घर पहुंचवाने में जुटे। अपने कोर मतदाताओं को, मुसलमान-दलित-पढे-लिखों को ही फिलहाल समझाते रहे कि औवेसी से, भीम सेना से सुरक्षा नहीं होनी है बल्कि महात्मा गांधी के हिंदू राग वाली कांग्रेस है मोदीशाही का असली विकल्प!

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