राहुल गांधी क्या संभाल सकेंगे?

यह सवाल बेमतलब है। बिहार के ताजा अनुभव से समझे कि किसने सोचा था कि तेजस्वी यादव, चिराग पासवान, कन्हैया बिहार में नीतिश और सुशील मोदी से ज्यादा भीड़ लिए हुए नेता हो जाएंगे? उद्धव ठाकरे और जगन मोहन अपने बूते मुख्यमंत्री बन जाएंगे? इन उदाहरणों से आगे के चुनावी मुकाबले में कांग्रेस और राहुल गांधी मौजूदा वक्त के बादशाह नरेंद्र मोदी के इसलिए विकल्प अनिवार्यतः है क्योंकि वे वैकल्पिक आईडिया ऑफ इंडिया के प्रतिनिधी है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने नरेंद्र मोदी, भाजपा, संघ राजनीति का विरोध कर-कर अपनी अलग पहचान बना ली है। फिर सबसे बड़ी बात राहुल गांधी की अभी उम्र ही क्या है!

पुराना किस्सा है, कोई चालीस साल पहले मैंने शरद यादव की जुबानी सुना था। 1974 में गैर-कांग्रेवाद की बनती हवा के मोड पर शरद यादव जबलपुर में कांग्रेस के दिग्गज सेठ गोविंददास के खिलाफ जनता उम्मीदवाद बन चुनाव जीत दिल्ली पहुंचे थे। तरूणाई के जोश से भरे शरद यादव ने दिल्ली पहुंच कर नेताओं से मेलमुलाकात की। दिल्ली के डुप्ले रोड की एक सुनसान कोठी में मोरारजी देसाई रहा करते थे। कांग्रेस विभाजन के बाद इंदिरा गांधी के लंबे राज में घोर इंदिरा विरोधी मोरारजी की कोठी  तब सूनी होती थी। शरद यादव मिलने गए, जोश दिखलाते हुए कहां मोरारजी भाई आपको देश का दौरा करना चाहिए। हम नौजवान यह करेंगे, वह करेंगे और बस आप हां कह दें। मोरारजी ने सेठ गोविंददास को हरा कर आए नौजवान शरद यादव को शांति से सुना और बात खत्म हुई तो दो लाईनों में जवाब दिया कि लोगों का अनुभव जब बोलेगा और राजनीति बदलेगी तो जनभावना, राजनीति, सत्ता इस घर खुद आ जाएगी।

हां, मोरारजी गजब थे। उनके निर्विकार, स्थितप्रज्ञ होने के किस्से कई है। मैंने शरद यादव और जनता पार्टी के पुराने नेताओं से कई किस्से सुने है। कांग्रेस और राहुल गांधी के संदर्भ में यह किस्सा इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि मोदीशाही का अनुभव (फिर वह दस साल हो या बीस साल) जनता को अंततः विकल्प के लिए मजबूर करेगा और उस स्थिति में कांग्रेस का खूंटा इसलिए विकल्प होगा क्योंकि मनमोहनसिंह, राजीव गांधी, इंदिरा, गाधी और पंडित नेहरू की सत्ता की ऱेखाएं जनता को यह याद कराए हुए होगी कि तब क्या हुआ था जबकि मोदी के राज का क्या परिणाम है!

कांग्रेस क्योंकि एक परिवार के खूंटे से बंधी है इसलिए वह लोकतांत्रिक कांग्रेस या कांग्रेस के तमाम दूसरे टुकडों की तरह खत्म नहीं होगी। हां, यदि नेहरू-गांधी परिवार के खूंटे को तोड़ कर  कांग्रेस भाग जाए और गुलामनबी कांग्रेस, आनंद शर्मा कांग्रेस या कपिलसिब्बल कांग्रेस या एक्सवाईजेड कांग्रेस हो जाए तो बात अलग है अन्यथा परिवार की कांग्रेस वैचारिक विकल्प के साथ टिकाऊ बनी रहेगी। विचार, विचारधारा, आईडिया के चलते यह मामला वैसे ही है जैसे संघ के खूंटे को तोड़कर भाजपा यदि बलराज मधोक भाजपा या नरेंद्र मोदीभाजपा में परिवर्तित हो तो भाजपा का भविष्य वहीं बनेगा जो शंकरसिंह वाघेला भाजपा का हुआ था। इसलिए मैं मानता हूं कि भारत की राजनीति में संघ का खूंटा और गांधी-नेहरू परिवार का खूंटा देश की हकीकत में देश की जरूरत है।

सो कांग्रेस को संभालने में राहुल गांधी न केवल समर्थ है बल्कि उससे कांग्रेस का भविष्य भी है। पर यदि राहुल गांधी न माने और दिग्विजयसिंह, अशोक गहलोत में किसी को अध्यक्ष बना उन्हे अंतरिम अवधि के लिए सबकुछ संभलवाएं तब? तब वह भी राहुल गांधी का आत्मविश्वास से पार्टी को संभालना होगा!

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