राहुल गांधी कितनी बार लांच होंगे?

किसी भी उत्पाद को एक बार लांच किया जाता है। फिर जरूरत पड़ने पर उसे रिलांच किया जाता है। अगर किसी उत्पाद को दूसरी या तीसरी बार रिलांच करने की जरूरत पड़े तो इसके तीन बहुत स्पष्ट मतलब होते हैं। पहला, उत्पाद में कुछ कमी है। दूसरा, उसकी लांचिंग-रिलांचिंग सही तरीके से और सही समय पर नहीं हो रही है। और तीसरा, उस उत्पाद की मार्केटिंग ठीक से नहीं की जा रही है और उसे असमय मार्केट से विदड्रॉ किया जा रहा है।

राहुल गांधी ऐसे ही राजनीतिक उत्पाद हो गए हैं, जिनको कांग्रेस बार बार रिलांच कर रही है। हालांकि यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि राजनीतिक उत्पाद के तौर पर राहुल गांधी में कोई कमी नहीं है, बल्कि मौजूदा हालात के लिए वे सबसे उपयुक्त नेता हैं। असल में उनकी लांचिंग, मार्केटिंग और मार्केट मंक बनाए रखने के लिए किए जा रहे उपायों में कमी है।

सबसे पहली कमी तो यह रही कि राहुल की लांचिंग बेहद सॉफ्ट तरीके से हुई। वे 2004 में सांसद बने और अभी तक सांसद ही बने हुए हैं। उन्हें न तो तत्काल कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया और न वे केंद्र में मंत्री या प्रधानमंत्री बने। ध्यान रहे राजीव गांधी की सक्रिय राजनीतिक लांचिंग प्रधानमंत्री के रूप में हुई थी। वैसे वे संजय गांधी के निधन से खाली हुई सीट पर सांसद 1981 में ही बन गए थे पर तब वे राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं थे, बल्कि कॉमर्शियल पायलट के तौर पर ही काम कर रहे थे। इसी तरह सोनिया गांधी की सक्रिय राजनीति में एंट्री पार्टी अध्यक्ष के तौर पर हुई थी।

इनके मुकाबले राहुल की सॉफ्ट लांचिंग हुई। जिस तरह से इंदिरा गांधी अपने पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में मंत्री बनी थीं, वैसे राहुल को मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री नहीं बनाया गया। वे अगर 2004 की सरकार में मंत्री बने होते तो 2009 की सरकार के मुखिया बन सकते थे और तब उनके ऊपर राजनीतिक रूप से ‘पप्पू’ होने का जो ठप्पा लगा है वह नहीं लगा होता। सो, पहली गड़बड़ी राहुल गांधी की पहली लांचिंग में हुई थी।

राहुल गांधी को दोबारा लांच किया गया तो वह लांचिंग उपाध्यक्ष के तौर पर हुई। उसकी टाइमिंग भी गलत थी और लांचिंग का तरीका भी। जब राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष के रूप में कमान संभालनी ही थी तो उन्हें 2013 में उपाध्यक्ष बनाने का फैसला बेसिरपैर का था। ध्यान रहे उस समय तक नरेंद्र मोदी गुजरात का चुनाव एक बार फिर जीत चुके थे और यह लगभग तय हो गया था कि भाजपा 2014 का चुनाव उनकी कमान में लड़ेगी। उस समय केंद्र की कांग्रेस सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चल रहा था और पूरा देश आंदोलित था, कांग्रेस दिल्ली के निर्भया कांड में बुरी तरह से घिरी थी ऐसे समय में राहुल की उपाध्यक्ष के रूप में रिलांचिंग का फैसला जिसने भी कराया वह निश्चित रूप से राहुल का शुभचिंतक नहीं था। अगर उस समय भी मनमोहन सिंह को हटा कर राहुल को प्रधानमंत्री बनाया गया होता तो तस्वीर अलग होती।

बहरहाल, राहुल की तीसरी बार लांचिंग अध्यक्ष के रूप में हुई और वह भी 2017 के गुजरात चुनाव के समय। उनके अध्य़क्ष की कमान संभालते ही पहला नतीजा गुजरात में भाजपा की जीत का आया। जाहिर है उस रिलांचिंग की टाइमिंग भी ठीक नहीं थी। इसके बाद राहुल ने 2019 के चुनाव नतीजों के बाद जिस तरह से खुद को विदड्रॉ किया यानी अध्य़क्ष पर छोड़ा वह भी कांग्रेस के लिए बड़ा झटका था। तभी सलमान खुर्शीद का यह कहा बहुत मायने वाला है कि कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसके नेता ने उसे छोड़ दिया।

इस समय अगर राहुल ने अध्यक्ष पद नहीं छोड़ा होता और सख्त फैसले करते। पुराने और अपने हिसाब से कांग्रेस चला रहे नेताओं को हटाते और पूरी तरह से कांग्रेस का कायाकल्प करते तो उनको चीजों को ठीक करने के लिए पांच साल का समय मिलता। पर अब उसकी संभावना खत्म हो गई। अब कांग्रेस ऐसे ही घसीट घसीट कर चलती रहेगी। 2024 के चुनाव से पहले एक बार फिर राहुल को उनकी पार्टी रिलांच करेगी। पर तब उनके पास न तो पार्टी में सब कुछ ठीक करने का समय होगा और न अपनी छवि ठीक करने का मौका होगा। और अगर तब उनकी कमान में पार्टी हारी तो उनके लिए सारे रास्ते बंद हो जाएंगे।

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