कांग्रेस के तर्क तो और बेतुके!

इसमें संदेह नहीं है कि सत्तारूढ़ पार्टी के नेता और यहां तक कि सरकार के मंत्री भी देश में चल रहे विमर्श को बदलने, भटकाने का सोचा समझा प्रयास कर रहे हैं। चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद, कोरोना वायरस के संकट, आर्थिक बदहाली जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए भाजपा के नेता और केंद्र सरकार के मंत्री गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हैं या फालतू की बातों पर बहस करा रहे हैं। जैसे भाजपा के लिए आज सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि राहुल गांधी रक्षा मामलों की संसदीय समिति की बैठकों में नहीं जाते हैं। भाजपा नेताओं ने यह भी खोज निकाला है कि 12 साल पहले कांग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच एक समझौता हुआ था। भाजपा ने इस बात के भी पुरातात्विक साक्ष्य खोज निकाले हैं कि राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से चंदा मिला था। फाउंडेशन को प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष से भी चंदा मिलने के ऐतिहासिक साक्ष्य भाजपा ने खोज निकाले हैं।

अगर ये सारे काम कानूनी रूप से गलत हैं तो सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार के लोगों को मीडिया में यह मुद्दा उठाने की बजाय केंद्रीय एजेंसियों से इनकी जांच करानी चाहिए। पर ऐसा लग रहा है कि सरकार की रूचि किसी किस्म की जांच में नहीं है। वह तात्कालिक ज्वलंत मुद्दों पर चल रहे राष्ट्रीय विमर्श को भटकाना चाहती है। पर इसके जवाब में कांग्रेस की ओर से जो तर्क दिए जा रहे हैं वो और बेतुके हैं, जिनसे अंततः कांग्रेस की अपनी कमजोरी जाहिर हो रही है और भाजपा को इस बहस को आगे चलाए रखने में मदद मिल रही है।

पिछले दिनों मीडिया में एक खबर आई कि राहुल गांधी रक्षा मामलों की स्थायी समिति की लगातार कई बैठकों में नहीं गए। खबर छपने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा सहित सभी नेता राहुल पर टूट पड़े। भाजपा नेता, आईटी सेल और चैनलों के एंकर राहुल से पूछने लगे कि वे रक्षा मामलों की बैठक में नहीं जाते तो देश की सुरक्षा मामलों पर सवाल उठाने का उनको क्या हक है? इसके जवाब में कांग्रेस के मीडिया विभाग ने यह बेतुका तर्क दिया कि क्या राहुल गांधी संसदीय समिति की बैठकों में चले जाते तो चीन भारत की सीमा में नहीं घुसता?

यह बहुत एब्सर्ड लॉजिक है, जो कोई दूसरा मजबूत तर्क नहीं होने पर अक्सर दिया जाता है। जैसे किसी फिल्म की आलोचना पर समीक्षक से कहा जाता है कि वह कोई अच्छी फिल्म बना कर दिखाए या किसी किताब की खराब समीक्षा पर आलोचक से कहा जाता है कि वह कोई अच्छी किताब लिख कर दिखाए! आप इस तरह के तर्क से किसी को आलोचना करने से नहीं रोक सकते हैं। आलोचक, समीक्षक या टीवी एंकर या विरोधी पार्टी के नेता का अपना काम है, आप उसे अपना काम करने से नहीं रोक सकते हैं। आपके पास अपने काम की पुख्ता जस्टिफिकेशन होनी चाहिए। आप अगर सार्वजनिक जीवन में हैं तो जो भी आपने किया उसे करने का पुख्ता आधार आपके पास होना चाहिए।

यह कोई तर्क नहीं हुआ कि राहुल गांधी अगर स्थायी समिति की बैठकों में जाते तो क्या चीन भारत की सीमा में नहीं घुसता! यह एक किस्म का पलायनवादी तर्क है। इसमें यह स्वीकारोक्ति है कि हां, वे संसदीय समितियों की बैठक में नहीं जाते हैं और यह उपेक्षा भाव भी है कि नहीं जाते तो क्या हो गया! इससे राहुल की एक अगंभीर राजनेता की गढ़ी गई छवि को ही अंततः मजबूती मिलेगी। एक सांसद के तौर पर राहुल गांधी अगर किसी संसदीय समिति के सदस्य हैं तो उसकी बैठकों में उनको जाना चाहिए। और अगर वे नहीं गए हैं तो उन्हें उसका कारण बताना चाहिए और हो सके तो माफी मांग कर आगे हर बैठक में शामिल होने का वादा करना चाहिए। बेतुके तर्कों से इसका बचाव नहीं हो सकता है। कांग्रेस को ध्यान रखना चाहिए कि जनता सिर्फ सरकार नहीं चुनती है, वह विपक्ष भी चुनती है और उसने कांग्रेस को विपक्ष के तौर पर चुना है तो उसके नेताओं को अपनी संसदीय जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करना चाहिए।

इसी तरह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने राजीव गांधी फाउंडेशन को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से मिले चंदे पर कहा कि अगर फाउंडेशन 20 लाख रुपए का चंदा लौटा दे तो क्या चीन भारत की सीमा से निकल जाएगा? यह भी बहुत एब्सर्ड लॉजिक है। यह जानते हुई भी कि भाजपा इसका इस्तेमाल ध्यान भटकाने के लिए कर रही है, यह तर्क नहीं दिया जा सकता है। चंदा लौटाने की बात कहने का मतलब यह स्वीकार करना है कि आपने कुछ गलत किया है। अगर किया है तो सीधे शब्दों में आपको अपनी गलती माननी चाहिए। इसे चीन के साथ सीमा विवाद से जोड़ना कतई समझदारी की बात नहीं है।

ध्यान रहे राजीव गांधी फाउंडेशन को सिर्फ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से ही चंदा नहीं मिला है, बल्कि उसे प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष से भी चंदा मिला है। कांग्रेस को और उसके पहले परिवार को इस तरह के चंदे के खेल से बाहर निकलना चाहिए। यह बड़ी बदनामी का सबब बना है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी राजीव गांधी ट्रस्ट को गुरुग्राम में जमीन देने के विवाद में फंसे हैं। सोनिया और राहुल गांधी के ऊपर एक बड़ा मुकदमा एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड के मालिकाने को लेकर चल रहा है, जिस पर सब जमानत लिए हुए हैं। अगर सक्रिय राजनीति में रहना है तो इस किस्म के फाउंडेशन, ट्रस्ट या लिमिटेड कंपनियों से दूर ही रहना चाहिए।

सोनिया गांधी ने राजीव गांधी फाउंडेशन 1991 में राजीव गांधी के निधन के बाद बनाया था। तब उनका कोई इरादा राजनीति में आने का नहीं था। लेकिन जब वे सक्रिय राजनीति में आ गईं तो उन्हें या तो इसे बंद करना चाहिए था या इससे अलग हो जाना चाहिए था। इसके उलट ऐसा लग रहा है कि सक्रिय राजनीति में आने के बाद तरह-तरह से इस फाउंडेशन के लिए चंदा जुटाने का काम किया गया। ऊपर से यह मुद्दा उठ रहा है तो यह बेतुका तर्क दिया जा रहा है कि क्या चंदा नहीं लेते तो चीन भारत में नहीं घुसता क्या! कांग्रेस नेताओं को समझना चाहिए कि ये दोनों अलग अलग मुद्दे हैं। भाजपा इन्हें ध्यान भटकाने के लिए उठा रही है। इसलिए कांग्रेस को चीन की घुसपैठ या कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों पर सरकार को घेरने के लिए अलग तर्क देने चाहिए और राहुल गांधी के स्थायी समिति की बैठक में नहीं जाने या राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए चंदा लेने के मामले में अलग जवाब देना चाहिए। दोनों को आपस में मिला कर कांग्रेस अंततः भाजपा की ही मंशा पूरी कर रही है। इससे न तो कांग्रेस का बचाव हो रहा है और न भाजपा कठघरे में आ रही है उलटे पार्टी के तौर पर कांग्रेस और नेता के तौर पर राहुल गांधी की छवि खराब हो रही है।

One thought on “कांग्रेस के तर्क तो और बेतुके!

  1. नही ये बिल्कुल नस पकड़ना है यहां पर राहुल सही है ।

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