संविधान दिवस पर संविधान की रक्षा!

संविधान दिवस की 70वीं सालगिरह के मौके पर 26 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में सरकार बनाने के मसले पर फैसला सुनाया। संभवतः सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला एक दिन इसी वजह से सुरक्षित रखा ताकि संविधान की रक्षा करने वाले फैसले का ऐलान संविधान दिवस के दिन हो। इस फैसले के बाद जो हुआ वह सचमुच ऐतिहासिक हुआ। पर अब बड़ा सवाल है कि संविधान की रक्षा का दायित्व जिन कंधों पर है वे क्या करेंगे? क्या सिर्फ मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के इस्तीफे से यह मामला खत्म हो गया? संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाले जिन लोगों की देखरेख में यह पूरा घटनाक्रम हुआ क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है?

इस फैसले से पहले तक महाराष्ट्र का समूचा घटनाक्रम कर्नाटक में मई 2018 में हुए घटनाक्रम की मिरर इमेज की तरह दिख रहा था। वहां भी इसी तरह राज्यपाल ने बीएस येदियुरप्पा को सबसे बड़ी पार्टी का नेता होने के नाते मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी और बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय दे दिया था। इसके खिलाफ कांग्रेस और जेडीएस आधी रात को सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे और अदालत ने 24 घंटे में बहुमत साबित करने को कहा। वहां भी सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर की देखरेख में ही बहुमत साबित करने को कहा था।

पर महाराष्ट्र में कुछ ऐसा भी हुआ था, जो इससे पहले देश की राजनीति में कभी नहीं हुआ। भारत की राजनीति में ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी मुख्यमंत्री को इतने गुपचुप तरीके से शपथ दिलाई गई हो। इस शपथ समारोह की सूचना न तो मीडिया को दी गई, न किसी राजनीतिक दल के नेता को बुलाया गया, न न्यायपालिका से किसी को आमंत्रित किया गया और न प्रशासनिक अधिकारी इसमें शामिल हुए। यहां तक कि शपथ किस समय दिलाई गई है, इसे लेकर भी सस्पेंस है। मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री की शपथ सुबह पांच बज कर 47 मिनट से लेकर आठ बजे के बीच किसी समय चोरी-छिपे कराई गई और जिस एकमात्र निजी चैनल को वहां बुलाया गया था उससे कहा गया कि वह आठ बजे के बाद ही वीडियो जारी करे।

सोचें, राज्यपाल ने जिसे इतने चोरी-छिपे तरीके से शपथ दिलाई, उसने इस्तीफा दे दिया तो अब राज्यपाल को क्या करना चाहिए? क्या राज्यपाल भी इस्तीफा देकर एक मिसाल कायम करेंगे या कम से कम सार्वजनिक रूप से स्वीकार करेंगे कि उनसे गलती हुई? देवेंद्र फड़नवीस को शपथ दिलाने से पहले बतौर राज्यपाल यह उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी थी कि वे फड़नवीस और अजित पवार की ओर से दी गई चिट्ठियों की पड़ताल कराएं। पर उन्होंने अपनी संवैधानिक मर्यादा और दायित्व का पालन करने की बजाय कठपुतली के तौर पर काम किया। जिस राज्यपाल ने विधानसभा में दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी पार्टी को दावा करने के लिए महज 24 घंटे का समय दिया उसी ने भाजपा की सरकार बनवा कर उसे बहुमत साबित करने के लिए दो हफ्ते का समय दे दिया। तभी मंगलवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बहुमत साबित करने की बजाय फड़नवीस ने जब इस्तीफा दिया तो वह राज्यपाल पद की गरिमा के धूल धूसरित होने का क्षण था।

पिछले तीन-चार दशक में यह पहला मौका है, जब राष्ट्रपति की भूमिका भी सवालों के घेरे में आई है। भले महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन हटाने के लिए किया गया फैसला कानूनी रूप से सही हो पर जिस तरीके से उसे अंजाम दिया गया वह देश के सर्वोच्च पद की गरिमा के अनुकूल नहीं था। राष्ट्रपति बहुत सहज तरीके से बिना किसी की भावनाओं या अहंकार को आहत किए यह पूछ सकते थे आखिर ऐसी क्या आफत आ रही थी, जो आधी रात को राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन हटाने की सिफारिश की? किस वजह से पहले सुबह राष्ट्रपति के पास केंद्र सरकार की अनुशंसा आई? क्या केंद्रीय कैबिनेट ने इतनी सुबह इस प्रस्ताव को मंजूरी दी है? उन्हें यह भी जानने का अधिकार था कि महाराष्ट्र में जो कुछ हो रहा था वह संविधान सम्मत और राजनीतिक नैतिकता के पैमाने पर उपयुक्त है या नहीं? अफसोस की बात है कि उन्होंने कोई सवाल नहीं पूछा।

देश के संवैधानिक पदों पर बैठे जिन लोगों के ऊपर राजनीतिक मर्यादा की रक्षा की जिम्मेदारी थी, वे अपने काम में विफल रहे। देश के प्रधानमंत्री भी इसमें शामिल हैं। महाराष्ट्र में उन्हें अपनी पार्टी की सरकार बनानी थी तो यह काम वे शनिवार को दिन में भी कर सकते थे। जो काम शुक्रवार की रात को अंधियारे में किए गए वे सारे काम दिन के उजाले में भी हो सकते थे। तभी मुख्यमंत्री का इस्तीफा प्रधानमंत्री के लिए बेहद शर्मिंदगी का सबब है। असल में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से फड़नवीस का इस्तीफा इतना भर नहीं है कि उनके पास बहुमत नहीं था और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इससे रात के अंधियारे में हुए कई कामों की हकीकत उजागर हुई है। राज्यपाल, केंद्रीय मंत्रिमंडल, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कार्यालय चारों शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं की साख पर सवाल उठा है। शनिवार की सुबह से मंगलवार की शाम तक जो हुआ उसने इन चारों शीर्ष पदों पर एक स्थायी, बदनुमा दाग भी लगा दिया है।

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