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अमेरिका का आत्म-संघर्ष

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अमेरिका अपने नस्लभेदी इतिहास पर परदा डाले या अपने छात्रों को पढ़ कर उसे समझने दे, ये विवाद वहां गहरा गया है। अब क्रिटिकल रेस थ्योरी वहां टकराव का बड़ा मुद्दा बन गई है। इस सिद्धांत के तहत अकादमिक दायरे में नस्लवाद के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है।

history of racism : इतिहास की खामियों को समझा और याद किया जाए, या उस पर परदा डालने की कोशिश की जाए, ऐसे आत्म-संघर्षों से हर समाज को गुजरना पड़ता है। हैरतअंगेज यह है कि अमेरिका जैसे परिपक्व लोकतंत्र समझे जाने वाले समाज में ऐसे अंतर्विरोध अब खड़े हो गए हैं। अगर समझने की कोशिश की जाए, तो इसकी एक वजह 2008 में ब्लैक नेता बराक ओबामा का राष्ट्रपति बनना रही। उससे श्वेत समुदाय में जवाबी गोलबंदी हुई।

वो बात आगे बढ़ती चली गई, जिसका खूब फायदा डॉनल्ड ट्रंप ने उठाया। उन्होंने अमेरिकी समाज में ऐसा ध्रुवीकरण किया कि पुराने बहुत से जख्म खुरच कर फिर से अमेरिका को पीड़ा पहुंचाने लगे हैँ। जाहिर है, उनमें सबसे बड़ा दर्द नस्लभेद का है। अमेरिका अपने नस्लभेदी इतिहास पर परदा डाले या अपने छात्रों को पढ़ कर उसे समझने दे, ये विवाद वहां गहरा गया है।

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अब क्रिटिकल रेस थ्योरी वहां टकराव का बड़ा मुद्दा बन गई है। इस सिद्धांत के तहत अकादमिक दायरे में नस्लवाद के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। इसके तहत नस्लवाद के कारण संस्थागत अन्याय का इतिहास पढ़ाया जाता है। कंजरवेटिव खेमों के मुताबिक ये विषय समाज को बांटने का काम कर रहा है। तो अब तक रिपब्लिकन पार्टी के शासन वाले नौ राज्य इसे कोर्स से हटाने का कानून बना चुके हैँ। एरिजोना राज्य में बीते हफ्ते इस सिद्धांत को विश्वविद्यालयों में पढ़ाने पर रोक लगा दी गई। उसके बाद से ये मामला भड़क उठा है।

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आलोचकों का कहना है कि ऐसे फैसलों का असर यह हो सकता है कि टेक्स्ट बुक तैयार करने वाली समितियां ऐसे हर विषय को पाठ्यक्रम में शामिल करने से बचने लगें, जो राज्य सरकारों को पसंद नहीं है। यानी न सिर्फ नस्लवाद, बल्कि लिंग भेद और दूसरे सामाजिक विभेदों को ना पढ़ाने की प्रवृत्ति आगे बढ़ सकती है। ये शिकायत पहले से रही है कि अमेरिका में पहले से ही ऐसी बहुत सी बातें नहीं पढ़ाई जातीं, जिन्हें छात्रों को जानना चाहिए। history of racism

2020 में अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि अमेरिका के अलग-अलग राज्यों में एक ही विषय को अलग-अलग नाम और संदर्भों के साथ पढ़ाया जाता है। कारण संबंधित राज्य का राजनीतिक रूझान है। लेकिन ये स्वस्थ स्थिति नहीं है। अगर अमेरिका जल्द ही अपने इस आत्म-संघर्ष से नहीं उबरा, तो ज्ञान के केंद्र के रूप में उसकी बनी-बनाई छवि प्रभावित हो सकती है।

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