जब दिल्ली में यह हाल तो देश में क्या…

कोरोना ने मुझे अंर्तमनसे झिंझोड़ डाला है। बहुत सोचने को बाध्य कर दिया है। इस दौरान मुझे ऐसा कुछ देखने को मिला है जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। जब मैंने इस महामारी के बारे में चैनलो को ध्यान से देखना शुरू किया था तब भारत में इस रोग से ठीक होने वालो का प्रतिशत 22 फीसदी था। उसके बाद सरकार द्वारा इस पर प्रभावी तरीके से नियंत्रण किए जाने थे व वे किए जाने लगे। इससे संक्रमित लोगों की संख्या देश में दो लाख से ज्यादा हो गई लेकिन बताया जाने लगा कि इसके ठीक होने वालो की दर 50 फीसदी पहुंचने लगी।

मतलब यह बात मेरी समझ में आज तक नहीं आई कि जितनी ज्यादा संख्या में लोग संक्रमित हो रहे है, उतनी ही ज्यादा संख्या में ठीक भी हो रहे थे। अंतः मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि राजनीति तो आंकड़ो का खेल है। मेरी ऐसी ही राय शेयर बाजार के बारे में है। कुछ साल पहले जैसे कि एक उद्योगपति का इंटरव्यू देखा था जिसमें उसने कहा कि मैं आज तक शेयर बाजार को समझ नहीं पाया। मेरे टायरो की बिक्री घट रही है। उत्पादन कट हो गया है मगर मेरी कंपनी का शेयर ऊपर चला जा रहा है।

मेरा मानना है कि अदालत गवाहियो व साक्ष्य पर व आंकड़ो पर चलती है। सबसे बड़े सरकारी वकील तक यह अदालत में कह रहे हैं कि हमने सबको राहत पहुंचा दी है। सवाल उठाने वाले वकील, पत्रकार बताए कि उन्होंने लोगों को राहत देने के लिए क्या किया है? इक्का-दुक्का मामलों में राहत नहीं मिली होगी मगर उन्हें मान्य नहीं माना जा सकता है। हमारे देश में हर क्षेत्र में यही होता है। कुछ समय पहले एक परिचित ने एक कोरोना मरीज को दाखिला न देकर अस्पताल से वापस कर देने कe मैसेज मेरे पास भेजा था व तमाम कोशिशों के बाद ही अस्पताल में भरती करवाने में मदद मिली। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को मुख्य रूप से यह बात कहते देखा गया है कि हमारे पास अस्पतालों में बैड की कमी नहीं है। मगर किसी को बिस्तर न होने के कारण वापस लौटने की बात कहीं जाए तो इस नंबर पर फोन करिए। वैसे हर व्यक्ति को भरती किए जाने की जरूरत नहीं है।

जिस देश में रेलवे की पूछताछ से जाने तक के फोन सामान्य हालात में उठाए नहीं जाते हो वहां कोरोना काल में प्रवासी मजदूरो के लिए चलाई गई विशेष गाडि़यां कहीं से कहीं पहुंच जाती हो वहां क्या हो रहा होगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। मगर राजनीतिक दलो में मानों होड़ मची हुई है। इसकी एक खास वजह यह है कि राजनीतिक दलो को इनकी चिंता नहीं होती है क्योंकि वोटर के रूप में प्रवासी मजदूरो की अहम भूमिका नहीं होती है। कारण यह है कि अधिकतर मजदूर जहां के वोटर होते हैं वहां मतदान के समय नहीं पहुंच पाते हैं व जिस परदेस में काम करते हैं वहां उनके नाम अमूमन मतदाता सूची में नहीं होते हैं।

वैसे भी प्रवासी मजदूरो का कार्यस्थल वाले इलाके से कोई स्थानीय संपर्क नहीं होता है। और न ही इनका होने दिया जाता है। पिछले लोकसभा चुनाव में देश का अब तक का सर्वाधिक वोटिंग 67 फीसदी रहा। इसका सीधा मतलब यह है कि देश के 33 फीसदी मतदाताओं ने तब भी वोट नहीं डाला था या डाल नहीं सकें। इनमें से कुछ उच्चवर्गीय हो सकते हैं व कुछ यायावर जमाते भी हो सकती है। लेकिन बड़ी तादाद उन प्रवासी मजदूरों की भी हो सकती हैं जो कार्यस्थल से हजारो किलोमीटर दूर सिर्फ एक दिन की छुट्टी लेकर व किराया खर्च करके सिर्फ वोट डालने नहीं आ सकते थे।

भला हो उन चैनलो का जो सरकार की पोल खोल रहे हैं। राजधानी दिल्ली जहां आप व भाजपा सरकारें बड़े-बड़े दावे कर रही थी वहां कोरोना से पीडि़त एक परिवार को दिखाया गया। जिसमें राजधानी के दो जाने-माने अस्पताल ने उनको भरती नहीं किया व उसकी मौत हो गई। अभी भी उसके परिवार में पांच लोग कोरोना से पीडि़त हैं। जब एक चैनल पर इस संबंध में हुई चर्चा को देखा तो उस पर भी आप पार्टी के प्रतिनिधि झूठे दावे करते दिखाई दे रहे थे व कह रहे थे कि हमने दोनों अस्पतालो के खिलाफ कार्रवाई की है। हमारे देश में कार्रवाई के नाम पर क्या होता है, सब इसको जानते हैं। जब देश की राजधानी में यह हालात है तो बाकी देश में क्या हो रहा होगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

जब मैं बाबा खड़क सिंह मार्ग पर रहता था तो वहां के सरकारी मकान काफी खराब थे। एक बार तेज आंधी आने के कारण मेरे घर की एक खिड़की उड़ गई। अगले दिन जब मैं उस मामले की रिपोर्ट करवाने तत्कालीन चीफ इंजीनियर श्री खटीक के पास गया तो उसने पूरी बात सुनकर मुझसे पूछा कि आप पत्रकार है मगर क्या आपने सिविल इंजीनियरिंग भी है। जो आप कह रहे हैं कि खिड़की बहुत घटिया व कमजोर थी। आपको गैर तकनीकी टिप्पणी करना शोभा नहीं देता है। मत भूलिए कि खिड़की पसंद कर उसे लगवाने का ठेका देने के लिए सरकार ने जो समिति बनाई थी उसमें सीपीडब्ल्यूडी के आला सिविल इंजीनियर थे। उन्होंने अपनी कसौटी पर खिड़की के मानको की जांच कर उसकी सप्लाई करने का ठेका दिया था। अतः आप जैसा गैर तकनीकी आदमी उसे कमजोर कैसे करार दे सकता है। मैं समझ गया कि उनके मन में क्या चल रहा था और मैंने उनसे इतना ही कहा कि वह सब छोडिए व नई खिड़की लगवा दीजिए।

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