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इनसानी नजरिए की कमी

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सरकारें अगर मानवीय नजरिया रखतीं, तो आखिर कोरोना पीड़ितों की मदद के लिए न्यायपालिका को क्यों देखल देना पड़ता। बहरहाल, गौरतलब यह है कि कोविड-19 से मौतों के मामले में मुआवजा देने में देरी पर अब सुप्रीम कोर्ट को सख्त नाराजगी जतानी पड़ी है। corona compensation human perspective

भारत में ये नया ट्रेंड है कि देश की सर्वोच्च अदालत के फैसलों का पालन करने में भी टाल-मटोल की जाती है। ऐसे तो कई मामले हैं, लेकिन ताजा मामले ने इसलिए ध्यान खींचा क्योंकि इसका संबंध मानवीयता से भी है। दरअसल, इस बात को तो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना ही नहीं चाहिए था। सरकारें अगर मानवीय नजरिया रखतीं, तो आखिर कोरोना पीड़ितों की मदद के लिए न्यायपालिका को क्यों देखल देना पड़ता। बहरहाल, गौरतलब यह है कि कोविड-19 से मौतों के मामले में मुआवजा देने में देरी पर अब सुप्रीम कोर्ट को सख्त नाराजगी जतानी पड़ी है। कोर्ट ने कहा कि तकनीकी आधार पर कोई राज्य सरकार मुआवजे से इनकार नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा है कि जो बच्चे अनाथ हुए हैं, उनके लिए आवेदन करना कठिन है। ऐसे में राज्यों को अनाथ हुए बच्चों तक पहुंचकर मदद देनी चाहिए। कोर्ट ने साफ कहा कि मुआवजे के आवेदनों को सरकार तकनीकी कारणों से रद्द नहीं कर सकती है। बीते हफ्ते सुनवाई के दौरान कोर्ट ने हर राज्य की तरफ से पेश रिकॉर्ड की जांच की।

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बेंच ने आदेश दिया कि राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण ऐसे परिवारों की तलाश करे, जिन्होंने महामारी के दौरान अपने परिजनों को खो दिया, ताकि उन्हें मुआवजा मिल सके। साथ ही कोर्ट ने सवाल किया कि जितनी मौतें हुईं है, उससे कम आवेदन क्यों आए हैं। कोर्ट का सवाल था कि क्यों जनता को मुआवजे की योजना के बारे में जानकारी नहीं है। साथ ही बेंच ने पूछा क्या लोग ऑनलाइन आवेदन फॉर्म नहीं भर पा रहे हैं? वैसे तो ये सवाल राज्यों से पूछे गए हैँ। लेकिन जवाब का अंदाजा लगभग उन तमाम लोगों को होगा, जिनकी सूरत-ए-हाल पर नजर रही है। जाहिर है, अगर सरकारें मुस्तैद होतीं और मानवीय नजरिए से चलतीं, तो ये सवाल क्यों उठते? लेकिन जब कोशिश कम से कम मुआवजा देने की हो, तो तमाम तरह की खामियों की गुंजाइश बनी रहने दी जाती है। जाहिर है, कोविड-19 से हुई मौतों पर मुआवजे के दावों से जुड़े जो आंकड़े कोर्ट को दिए गए हैं, उनसे कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। मसलन, कई राज्यों की सरकारों ने कोरोना से मौत की संख्या से अधिक मुआवजे के लिए पेश किए गए दावे की संख्या बताई है। लेकिन क्या ऐसे दावों की पुष्टि कोई ऐसी चुनौती है कि तमाम दावों को लटका दिया जाए?

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