सूरज चांद तो है पर नेहरू कहां?

मेरा मानना है कि हमारे वरिष्ठों व बुजुर्गो का अनुभव बहुत काम का होता है। एक बार फिर इसका अहसास हुआ। जब 30 साल पहले दिल्ली आकर दिल्ली प्रेस में नौकरी की तो हमारे संपादक परेश नाथ अक्सर मुझे अपने केबिन में बुलाकर कुछ-न-कुछ सिखाते थे। एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि लेख लिखते समय यह याद रखना की लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है व उनकी कुछ जानने की इच्छा बहुत तीव्र होती है। जैसे कि अगर तुम त्रिचुरापल्ली से जुड़ी कोई बात लिख रहे हो तो यह जरूर बताना कि त्रिचुरापल्ली (Trichupalli) किस राज्य में स्थित है। उसकी क्या विशेषता है।

मैंने हमेशा अपने लेखों में इसका ध्यान रखा। आज पत्नी ने पूछा कि हमारे जीवन में 27 मई का क्या महत्व है तो सोच में पड़ गया। वे पारिवारिक सोशल मीडिया से जुड़ी है। इस पर किसी सदस्य ने यह जानना चाहा था कि हमारे जीवन में 27 मई का क्या महत्व है। मैंने अपने दिमाग पर काफी जोर दिया बस इतना याद आया कि मेरे दिवंगत पिता का गर्मी में एक्सीडेंट हुआ था। मगर पत्नी का कहना था कि यह जानकारी गलत है। परिवर के सदस्य मेरी पत्नी ने व बड़े भाई ने इसका जवाब देते हुए लिखा था कि उस दिन हमारे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ था।

जब उनके निधन की खबर कानपुर में ही रहने वाली हमारी कमला बुआ तक पहुंची तो उन्होंने लंबी सांस भरते हुए कहा था अब देश का क्या होगा। संयोग से मैं भी उस समय पास मौजूद था व यह कहने के बाद वे बेहाश हो गई थी। मेरा मानना है कि हमारी बुआजी स्वयंभू कांग्रेसी थी जो तब एक तरह का फैशन माना जाता था। मुझे खुद इस बात का आश्चर्य हुआ कि कल किसी भी अखबार या चैनल पर उन्हें याद नहीं किया गया था। आमतौर पर नेहरू गांधी परिवार के किसी व्यक्ति का जन्मदिन या पुण्यतिथि होने पर कांग्रेस पार्टी उनकी याद में अखबारों में विज्ञापन जारी करती आई थी। किसी भी चैनल तक ने उन्हें याद नहीं किया।

अहम बात तो यह रही चीन के साथ बढ़ते टकराव का जिक्र करने वाली खबरें दिखाने के साथ ही 1962 के भारत-चीन युद्ध के लिए दिवंगत नेहरू को नहीं कोसा। यह देखकर मुझे लगने लगा कि जब हम किसी को हमेशा याद रखने की बात करते हैं तो वह गलत होता है। मुझे याद आया कि इस संबंध में सबसे पहले एक जोरदार नारा 1980 में संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु होने के बाद लगा था। तब कांग्रेसी यह नारा लगाते हुए बुक्का फाड़ रहे थे कि जब तक सूरज चांद रहेगा, संजय तेरा नाम रहेगा।

फिर यहीं नारा इंदिरा गांधी व राजीव गांधी के निधन पर लगाया गया था। मगर अब लगता है कि सब लोग पंडित नेहरू को भूल गए हैं। कोई उन्हें याद नहीं कर रहा है। मेरे एक पत्रकार मित्र ने नेहरूजी के प्रशंसक व जाने माने डाक्टर हरीश भल्ला द्वारा भेजी हुई खबर मुझे भेजी जिसमें लिखा था कि दिल्ली के सीताराम बाजार की हक्सर हवेली नेहरू के लिए खास अहमियत रखती थी। 8 फरवरी 1916 को वे पूरी बारात लेकर कमला नेहरू से शादी करने आए थे। कमला नेहरू 13 साल की थी व नेहरूजी तब विदेश में पढ़ रहे थे।

कमला नेहरू राजपति व जवाहर कौल की पुत्री थी। उनके दो भाई चांद बहादुर व वनस्पति विज्ञानी कैलाश नाथ व बहन स्वरूप काटजू थी। कमला नेहरू घर पर ही पंडितो व मौलवी से पढ़ती थी। वे अंग्रेजी नहीं जानती थी। नेहरूजी ने कमला नेहरू के 17 साल  होने तक इंतजार किया व फिर 500 लोगों की बारात लेकर एक विशेष ट्रेन से इलाहाबाद से दिल्ली शादी करने आए थे। उनके साथ उनके दो छोटे भतीजे ब्रज कुमार नेहरू व आनंद कुमार भी थे व उनकी बारात अजमेरी गेट से शुरू हुई।

यह भी क्या गजब का संयोग है कि आज सीताराम हवेली को नेहरू की ससुराल के कारण नहीं बल्कि शादियों में अच्छा खाना पकाने वाले हलवाईयों की वजह से जाना जाता है। अब समझ आता हैकि क्यों गांधी-नेहरू परिवार तमाम पुलो, हवाई अड्डों व सरकारी योजनाओं के नाम अपने लोगों के नाम पर रख रहा था। उन्हें पहले ही यह अंदेशा था कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो एक दिन देश उन्हें भुला देगा।

लगता है कोरोना के कारण कांग्रेस के नेताओं ने डर के चलते उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए उनकी समाधि शांतिवन तक पर फूल चढ़ाने के लिए जाना उचित नहीं समझा। तभी लगता है कि आप किसी की याद में भले डाक टिकट से लेकर सिक्का तक जारी करवा ले। लोग समय के साथ उन्हें भूल जाते हैं। शायद किसी ने सही ही कहा है कि आखिर नाम में क्या रखा है। हम बचपन में सुनते थे कि नेहरूजी के कपड़े विदेश से ड्राईक्लीन होकर आते थे व एक विदेशी कंपनी उनके द्वारा दी जाने वाली सिगरेट के टोटे पर जेएलएन छापती थी। मगर हालात इतने बदले कि उनके अपने व परिवार वालों ने ही उन्हें याद करना छोड़ दिया। सूरज चांद तो है मगर नेहरू कहां हैं।

4 thoughts on “सूरज चांद तो है पर नेहरू कहां?

  1. यह देश का और विशेषकर कांग्रेसका दुर्भाग्य ही है की वह नेहरू जी के पुण्यतिथि के अवसर पर नेहरू जी के समाधि पर जाना भूल गए इस देश के विकास में और आजादी की लड़ाई में जितना योगदान नेहरू जी व उनके परिवार का था शायद ही किसी व्यक्ति या उसके परिवार का रहा है ठीक है आज विरोध पक्ष बीजेपी की सरकारें हैं आप उनकी प्रशंसा मत करें लेकिन कम से कम उनकी निंदा या अपशब्दों से ना नवाजे
    कांग्रेस पार्टी अपने पूर्वजों मोतीलाल नेहरू ,सुभाष चंद्र बोस, लोकमान्य तिलक ,बाल कृष्ण गोखले ,जवाहरलाल नेहरु ,सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी ,राजीव गांधी तक की उपलब्धियो को भूल गई उसके दुर्दिन मे आने का एक बडा कारण यह भी है

    1. Bahut hi dukhad toh hai ki humare desh k voh pehle pradhanmantri the lekin …. sach ko aaj bhi andhon ke kandho par hath rakhkar chalna padh rha hai …. galti kisi ki nahi hai magar …. itihaas agar sach sach bataya gaya hota toh aaj ke iss yug main shyad andhbhakt kam hote ….. main swargiya jawaharlal nehru k liye kuch upshabdon ka pryog na karte hue bas yahi guzarish karunga ….. ki pehle itihaas ko jakar ache se padhe …. jo galtiyon uss samay k kuch satta mohiyo ne satta ki laalach main ki thi … sesh aaj bhi unhi galtiyon ko bhugat raha hai ….

  2. BJP cannot be blamed for not remembering Pt. Nehru, they don’t want to. Even I don’t to. I am ashamed at our education system, established by दरबारी संस्कृति, of Nehru, Gandhi era. Where we were fed lies about our freedom movement, rise of congress and post independence developments in nation.
    I fail to understand, how only congress workers were respected as patriots or freedom fighters. Sobha Singh gets a huge land in Lutyens and Bhagat Singh’s mother dies an unknown death.
    Where a prime minister awards himself bharat ratna.

  3. समय कक नमस्कार है।सत्ता के लोभ, मोह मेजो प्रारम्भ में लक्ष्य रखते हैस भटक जाते है।उनके भले और बुरे दोनों ही कार्य भूल दिए जाते है।

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