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झूठे आंकड़ों से बढ़ेगा संकट

केंद्र और कई राज्यों की सरकारें समझ रही हैं कि वे बहुत होशियारी कर रही हैं, जो कोरोना संक्रमण और संक्रमण से होने वाली मौतों के आंकड़े कम दिखा रही हैं। अपनी इस होशियारी से सरकारें देश के करोड़ों नागरिकों का जीवन संकट में डाल रही हैं। वे आंकड़ों की बाजीगरी से संकट को कम होता दिखा रही हैं पर असल में ऐसा नहीं है। असल में सरकारें संकट बढ़ा रही हैं। वे लोगों में मन में झूठा भरोसा पैदा कर रही हैं कि कोरोना वायरस की दूसरी लहर खत्म हो रही है या कम हो रही है। पिछले साल के अंत में जो गलती की गई थी वही गलती फिर से दोहराई जा रही है। हजारों की संख्या में हो रही मौतों को छिपाया जा रहा है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। टेस्ट कम करके संक्रमितों की संख्या कम बताई जा रही है और इससे भी संक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। हर दिन कोरोना की कम होती संख्या बता कर लोगों को धोखा दिया जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि देश में संक्रमण की दर अब भी 21 फीसदी है, जो महामारी के बेकाबू होने का पुख्ता सबूत है।

हैरानी की बात है कि सरकारों की आंकड़ों की यह बाजीगरी स्वास्थ्य विशेषज्ञों की नाक के नीचे हो रही है और वे इसे रोकने और हकीकत बताने की बजाय इसका हिस्सा बन रहे हैं। कई ऐसे राज्य, जिनके यहां संक्रमण की दर 20 फीसदी है वे भी दावा कर रहे हैं कि दूसरी लहर का पीक आ गया या आने वाला है। देश के 26 राज्यों में कोरोना वायरस की संक्रमण की दर 15 फीसदी से ऊपर है और इन राज्यों में भी कहा जा रहा है कि कोरोना का पीक आ गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से तय मानकों के मुताबिक अगर संक्रमण की दर पांच फीसदी से ऊपर है तो इसका मतलब है कि हालात बेकाबू हैं। लेकिन यहां आधा दर्जन राज्यों में संक्रमण की दर 30 फीसदी है और पूरे देश में टेस्ट कराने वाले पांच में से एक व्यक्ति संक्रमित मिल रहा है और कहा जा रहा है कि स्थिति काबू में है या पीक आ गया!

भारत में सरकारी पार्टी का समर्थन करने वाला हर जानकार या नेता यह कहता मिलेगा कि अमेरिका में इतने लोग मर गए और इतने लोग संक्रमित हो गए, लेकिन उसको यह हकीकत नहीं पता है कि अमेरिका ने कभी भी अपने यहां संक्रमण की दर 15 फीसदी से ऊपर नहीं जाने दी। तुलना करने से पहले आंकड़ों के बारे में जानकारी जरूर लेनी चाहिए। अमेरिका की आबादी 33 करोड़ है और उसने कोरोना के 43 करोड़ टेस्ट किए हैं। इसके उलट भारत की आबादी 140 करोड़ है और कुल टेस्ट 30 करोड़ हुए हैं और इसी पर दावा है कि हमने कोरोना को रोक दिया!

असल में भारत में सरकारें सिर्फ झूठे या अधूरे आंकड़ों के आधार पर कोरोना से लड़ने और जीतने का दावा कर रही हैं। असलियत कुछ और है। जब तक असलियत को स्वीकार नहीं किया जाएगा तब तक कोरोना को निर्णायक रूप से नहीं हराया जा सकता है। असलियत यह है कि भारत के गावों में कोरोना भयंकर तरीके से फैला है। जितने टेस्ट हो रहे हैं उतने के आधार पर ही यह आंकड़ा है कि देश के पांच सौ से ज्यादा जिलों में संक्रमण की दर 15 से 20 फीसदी है। गांवों में स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं है। लोग खांसी-बुखार-जुकाम से ग्रसित हो रहे हैं लेकिन टेस्ट की सुविधा नहीं होने से छोटी-मोटी दवाओं से इलाज कर रहे हैं। इनमें से काफी लोग समय पर इलाज नहीं मिलने से मर रहे हैं। गंगा में बह रही लाशें ऐसे ही लोगों की हैं, जो इलाज के अभाव में मरे हैं या परिजनों के पास उनका अंतिम संस्कार करने का साधन उपलब्ध नहीं है।

केंद्र से लेकर देश के अनेक राज्यों में हिंदू हृदय सम्राटों की सरकार है लेकिन उनके यहां हिंदू की यह दुर्दशा है कि अंतिम संस्कार के सनातन रीति-रिवाज बदले जा रहे हैं। खबर है कि उत्तर  प्रदेश में कानपुर, उन्नाव जैसे अनेक जगहों पर सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों लोगों ने अपने परिजनों की चिता सजा कर उनका अंतिम संस्कार करने की बजाय गंगा के किनारे दफन कर दिया। बताया जा रहा है कि तीन-तीन फीट की गहराई में सैकड़ों लाशें दफन की गई हैं और अगर अगले दो महीने में बारिश के बीच गंगा का जलस्तर बढ़ता है तो सड़े-गले शव नदी में बहते दिखाई देंगे। सरकारों को समझना चाहिए कि इस तरह से मौत के आंकड़े छिपाना किसी समस्या का समाधान नहीं है। संक्रमितों की संख्या कम बताने और संक्रमण से हो रही मौतों की संख्या छिपाने से अंततः कोरोना और ज्यादा फैलेगा, कम नहीं होगा। जहां मरने वालों के अंतिम संस्कार में कोविड प्रोटोकॉल का पालन नहीं हो रहा है वहां वायरस के तेजी से फैलने की आशंका है या जहां लोग शवों को नदी में प्रवाहित कर रहे हैं वहां भी वायरस का संक्रमण बहुत तेजी से फैलेगा।

आंकड़ों में बाजीगरी का खेल सिर्फ उत्तर प्रदेश या बिहार में नहीं हो रहा है। गुजरात से लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक और कर्नाटक से लेकर आंध्र प्रदेश तक लगभग हर राज्य में आंकड़े छिपाए जा रहे हैं। पिछले दिनों गुजरात के एक अखबार ने बताया कि राज्य के सिर्फ सात शहरों- अहमदाबाद, गांधीनगर, सूरत, बड़ौदा, जामनगर, राजकोट और भावनगर में एक महीने में 17,822 शवों का अंतिम कोरोना प्रोटोकॉल से हुआ है, जबकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन सात शहरों में एक महीने में कुल 1,745 लोगों की मौत हुई। यह आंकड़ा 10 के अनुपात में एक का है यानी 10 मौतें हो रही हैं तो एक मौत की गिनती हो रही है। अलग अलग मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में वास्तविक और सरकारी आंकड़े का अनुपात सात और एक है, कर्नाटक में चार और एक का और मध्य प्रदेश में तीन और एक का है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी वास्तविक मौतों के मुकाबले बहुत कम संख्या बताई जा रही है।

मौतों की संख्या छिपाने का यह खेल ऐसा नहीं है कि छिपा हुआ है। मुख्यधारा की मीडिया में सब कुछ बताया जा रहा है लेकिन नीतियां तो सरकारी आंकड़ों के आधार पर बनती हैं, जिनमें केसेज और मौतें सब कम दिखाई जा रही हैं। यहां तक कि अमेरिका के नामी डॉक्टर और लोक स्वास्थ्य सेवा से जुड़े आशीष झा ने भी भारत में हो रही मौतों को कई गुना ज्यादा बताया है। उन्होंने सहज गणित लगा कर बताया है कि सामान्य स्थितियों में भारत में 27 हजार लोग हर दिन मरते हैं। ऐसे में अगर चार हजार अतिरिक्त मौतें होने लगीं तो उससे समूचा सिस्टम ढह नहीं जाएगा। उनके हिसाब से जहां 27 हजार अंतिम संस्कार हर दिन हो रहे हैं वहां चार हजार और अंतिम संस्कार बहुत आसानी से हो जाएंगे। इसलिए सरकार का चार हजार का आंकड़ा गलत है। इससे कम के कम सात से दस गुना ज्यादा मौतें हो रही हैं इसलिए अंतिम संस्कार का पूरा ढांचा ढह गया है। श्मशान और कब्रिस्तान कम पड़ गए हैं, लोगों को सड़कों पर अंतिम संस्कार करना पड़ रहा है या हिंदुओं को शव दफन करने पड़ रहे हैं या उन्हें गंगा में प्रवाहित करना पड़ रहा है। सो, अगर संक्रमण और मौतों की सचाई सरकारों ने नहीं स्वीकार की तो तय मानें कि न कोरोना का संकट खत्म होगा  और न लोगों की दुश्वारियां खत्म होंगी।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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