सचमुच जैसा भारत में हुआ वैसा कहीं नहीं हुआ!
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सचमुच जैसा भारत में हुआ वैसा कहीं नहीं हुआ!

corona crisis in india

हां, सचमुच जैसा भारत में हुआ वैसा कहीं नहीं हुआ! दुनिया के किसी भी देश में ऐसा पलायन नहीं हुआ और किसी देश ने इतने बेसहारा लोगों को सड़कों पर मरने के लिए नहीं छोड़ा। दुनिया के किसी भी देश में यह भी नहीं हुआ कि अस्पतालों में ऑक्सीजन खत्म हो गई और लोग ऑक्सीजन की नली मुंह-नाक में लगाए रहे और मर गए। ….सोचें, कोरोना महामारी में जान गंवाने वालों के परिजनों को 50-50 हजार रुपए की अनुग्रह राशि देने का फैसला उनके आंसू पोंछने वाला है या उनके जख्मों पर नमक छिड़कने वाला है? यह राहत है या एक क्रूर मजाक है? corona crisis in india

पहली बार जब यह खबर नजरों के सामने आई कि कोरोना वायरस के प्रबंधन के लिए माननीय सर्वोच्च अदालत ने भारत सरकार की तारीफ की है और कहा है कि भारत ने जैसा काम किया वैसा दुनिया के दूसरे देश नहीं कर पाए तो लगा कि यह सत्तारूढ़ पार्टी के आईटी सेल की प्रायोजित खबर है या किसी न्यायमूर्ति ने मजाक में यह बात कही है। लेकिन खबर पढ़ कर पता चला कि माननीय अदालत ने गंभीरता से यह बात कही है। पिछले हफ्ते गुरुवार यानी 23 सितंबर को माननीय न्यायमूर्ति एमआर शाह ने कहा ‘महामारी के प्रबंधन को लेकर भारत ने जो किया वह दूसरे देश नहीं कर पाए’। केंद्र सरकार ने जब अदालत को बताया कि वह कोरोना से मरने वालों के परिजनों को 50-50 हजार रुपए का मुआवजा देगी तब अदालत ने खुशी जताते हुए कहा- आज हम काफी ज्यादा खुश हैं। हम इसलिए खुश हैं क्योंकि जिन लोगों ने महामारी की पीड़ा झेली, यह फैसला उनके आंसुओं को पोंछने वाला है।

Corona Outbreak in Kerala

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सोचें, कोरोना महामारी में जान गंवाने वालों के परिजनों को 50-50 हजार रुपए की अनुग्रह राशि देने का फैसला उनके आंसू पोंछने वाला है या उनके जख्मों पर नमक छिड़कने वाला है? यह राहत है या एक क्रूर मजाक है? कोरोना वायरस से संक्रमित होकर मरने वालों की जान की कीमत छोड़ दें, वह तो कोई सरकार नहीं चुका सकती है लेकिन अगर बीमारी के दौरान इलाज पर खर्च हुए पैसे का हिसाब लगाया जाए तो वह औसत खर्च भी 50 हजार रुपए से ज्यादा बैठेगा। क्या माननीय अदालत को यह पता नहीं है कि कोरोना वायरस की महामारी की दोनों लहरों के बीच लोगों ने कैसी कैसी मुसीबतें झेलीं? लोगों को कोरोना का टेस्ट कराने के लिए अनाप-शनाप रकम खर्च करनी पड़ी? महामारी के शुरुआती दिनों में एक टेस्ट की दर 24 सौ रुपए थी। इलाज के लिए अस्पतालों ने लाखों लाख रुपए वसूले! ऑक्सीजन सिलिंडर की कालाबाजारी हुई और लोगों ने अपनी सारी जमा पूंजी गवां कर अपनों का इलाज कराया! उस समय लोगों को आभास हुआ कि सरकार नाम की कोई चीज नहीं है।

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उस समय देश की अदालतों ने आगे कर लोगों को भरोसा दिलाया था। देश की अदालतों ने केंद्र सरकार से लेकर राज्यों तक की सरकारों को कठघरे में खड़ा किया था और उनके कामकाज को लेकर बेहद तीखी टिप्पणियां की थीं। अदालतों की पहल से लोगों को थोड़ी बहुत मदद हासिल हो पाई और सरकारों से ज्यादा आम लोगों ने संकट के समय एक-दूसरे का हाथ थामा और अपनी सामर्थ्य भर मदद की। सरकार ने तो पीएम-केयर्स फंड बनाया, जिसमें आम लोगों ने हजारों करोड़ रुपए की रकम दान की और सरकार कह रही है कि यह सरकारी फंड नहीं है, इसलिए कोई इसका हिसाब नहीं ले सकता है, क्या दुनिया में कहीं ऐसा हुआ? क्या इससे बड़ा कोई मजाक हो सकता है कि देश में मास्क नहीं पहनने पर सरकार दो हजार रुपए का जुर्माना वसूल रही है और आदमी के मर जाने पर 50 हजार रुपए का मुआवजा देगी?

दुनिया के पिछड़े और अति पिछड़े देशों को छोड़ दें तो कोरोना वायरस की महामारी के दौरान लगभग हर सभ्य और लोकतांत्रिक देश ने अपने नागरिकों की मदद की। अमेरिका से लेकर जापान और ब्रिटेन से लेकर यूरोपीय संघ के तमाम देशों ने अपने नागरिकों के हाथ में नकद पैसे पहुंचाए ताकि वे अपनी जरूरतें पूरी कर सकें। कोरोना के दौरान लगाए गए लॉकडाउन की वजह से लोगों की नौकरियां गई थीं, कामकाज ठप्प हुए थे और रोजगार पूरी तरह से बंद हो गए थे। इसकी भरपाई के लिए दुनिया के सभ्य देशों ने अपने नागरिकों की आर्थिक मदद की। भारत में सरकार ने आर्थिक मदद करने की बजाय लोगों को कर्ज लेकर काम चलाने का पैकेज घोषित किया। समूचे कोरोना काल में कोरोना राहत पैकेज के तहत किसी नागरिक को आर्थिक मदद नहीं की गई। उलटे सरकार ने कोरोना की आपदा को अवसर बना कर लोगों पर बड़ा आर्थिक बोझ डाला। कोरोना की अवधि में केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क में कई गुना बढ़ोतरी की, जिससे पेट्रोल, डीजल के दाम आसमान पर पहुंच गए। इससे खाने-पीने की चीजों से लेकर हर जरूरी चीज की महंगाई बढ़ी। केंद्र सरकार ने आपदा को अवसर बना कर कृषि और श्रम सुधार किए और किसानों-मजदूरों के हितों को बड़ा नुकसान पहुंचाया। दुनिया के किसी भी देश ने ऐसा नहीं किया।

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सचमुच भारत में कोरोना का जैसा प्रबंधन हुआ वैसा दुनिया के किसी देश में नहीं हुआ! किसी देश में ऐसा नहीं हुआ कि सरकार अचानक एक दिन चार घंटे की नोटिस पर पूरा देश बंद कर दे और ऐलान कर दे कि 21 दिन में कोरोना के खिलाफ जंग जीत ली जाएगी! यह भारत में ही हुआ। यह भारत में ही हुआ कि जब सारी दुनिया कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रही थी तो भारत सरकार ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बुला कर ‘नमस्ते ट्रंप’ का आयोजन किया, जिसमें लाखों लोग जुटे। अहमदाबाद से लेकर आगरा और दिल्ली तक इस कार्यक्रम का विस्तार था। उसके बाद अचानक सरकार की नींद खुली तो पूरा देश बंद कर दिया। पूरे देश में एक साथ बिना किसी तैयारी के लॉकडाउन होने से घबराए महानगरों के लाखों प्रवासी जब सड़कों पर निकल गए और अप्रैल-मई की तपती धूप में अपने छोटे-छोटे बच्चों, महिलाओं और बूढ़े मां-बाप को लेकर पैदल अपने घरों की ओर चलने लगे तो सरकार ने क्या किया? देश के बंटवारे के बाद यह सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी थी। लाखों लोगों के सड़कों पर पैदल चलने का वह भयावह मंजर हिंदुस्तान के माथे पर वह कलंक है, जो कभी नहीं धुलेगा। अदालत की यह टिप्पणी उस कलंक को नहीं धो पाएगी कि कोरोना का प्रबंधन जैसा भारत ने किया वैसा किसी ने नहीं किया। माफ कीजिएगा, उसमें विधायिका, कार्यपालिका और देश की मीडिया के साथ साथ देश की अदालतें भी भागीदार हैं, जिन्होंने अपने बेसहारा नागरिकों को सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया।

हां, सचमुच जैसा भारत में हुआ वैसा कहीं नहीं हुआ! दुनिया के किसी भी देश में ऐसा पलायन नहीं हुआ और किसी देश ने इतने बेसहारा लोगों को सड़कों पर मरने के लिए नहीं छोड़ा। दुनिया के किसी भी देश में यह भी नहीं हुआ कि अस्पतालों में ऑक्सीजन खत्म हो गई और लोग ऑक्सीजन की नली मुंह-नाक में लगाए रहे और मर गए। अस्पताल में बेड नहीं मिलने से लोग सड़कों पर तड़प-तड़प कर मरे, ऐसा भी दुनिया में कहीं नहीं हुआ। टेस्ट कराने से लेकर अस्पताल में जगह हासिल करने और दवा खरीदने तक के लिए लोगों को अनाप-शनाप पैसे चुकाने पड़े। मरीज के परिजन को हर जगह कालाबाजारी का शिकार होना पड़ा। ऐसा भी दुनिया के किसी देश में नहीं हुआ कि जिस दवा से इलाज होने का कोई प्रमाण नहीं है वह दवा दस-बीस गुना ज्यादा कीमत पर बिकी। दुनिया के लगभग हर देश ने अपने नागरिकों को मुफ्त वैक्सीन लगवानी शुरू की। भारत एकमात्र देश रहा, जहां लोगों से कहा गया कि वे अपने पैसे से वैक्सीन लगवाएं। बाद में जरूर सरकार ने इस नीति में सुधार किया लेकिन अब भी निजी अस्पतालों को वैक्सीन खरीदने और बेहद ऊंची कीमत पर उसकी डोज लगाने की इजाजत है। यह सब ऐसे काम हैं, जो दुनिया में कहीं नहीं हुए। कोरोना प्रबंधन की बजाय अगर यह कहा जाए कि कोरोना वायरस का जैसा कुप्रबंधन भारत में हुआ वैसा दुनिया में कहीं नहीं हुआ तो वह ज्यादा सटीक होगा।

 

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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