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उफ! वायरस में कुंभ

कोरोना की भयावह महामारी के बीच कुंभ मेले का आयोजन कौन सी समझदारी कही जा सकती है? शुरू में इतनी समझदारी दिखाई गई कि कुंभ मेले की अवधि घटा दी गई। लेकिन एक महीने में ही इस बात का ख्याल नहीं रखा गया कि लाखों की संख्या में लोग अगर कुंभ मेले में आते हैं या गंगा में डुबकी लगाने पहुंचते हैं तो कैसे कोरोना प्रोटोकॉल का पालन होगा, सोशल डिस्टेसिंग का पालन कैसे होगा या सबकी टेस्टिंग कैसे होगी? उलटे राज्य के मुख्यमंत्री ने लाखों की संख्या में लोगों के मेले में हिस्सा लेने की अपील की। यहां तक कहा कि गंगा में डुबकी लगाने से कोरोना खत्म हो जाएगा।

देश के लगभग सभी नेता न कम या ज्यादा मात्रा में लापरवाही दिखाई, गैर जिम्मेदारी का परिचय दिया, जिसका नतीजा है कि भारत आज ऐसी बदहाल और दयनीय स्थिति में खड़ा है। चुनाव प्रचार या कुंभ मेले के आयोजन की लापरवाहियों के अलावा केंद्र और राज्यों की सरकारों ने कोरोना वायरस की महामारी के पूरे एक साल में जिस गैर जिम्मेदारी का परिचय दिया वह भी देश की बदहाली का एक कारण है। पूरे साल में कहीं भी स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास के लिए कुछ नहीं किया गया।

वायरस की इमरजेंसी को देखते हुए नए अस्पताल बनाए जाने चाहिए थे, मौजूदा अस्पतालों में बेड्स, आईसीयू बेड्स, वेंटिलेटर आदि की सुविधा बढ़ाई जानी चाहिए थी, दवा और वैक्सीन के रिसर्च पर खर्च बढ़ाया जाना चाहिए था और मुहिम चला कर स्वास्थ्यकर्मियों की बहाली करनी चाहिए थी। लेकिन इनमें से कोई भी काम देश में नहीं हुआ।

तभी देश आज फिर उसी स्थिति में है, जिस स्थिति में एक साल पहले था। एक साल पहले भी ऐसी ही घबराहट थी, ऐसे ही लोग जानवरों की तरह इधर-उधर भाग रहे थे, ऐसे ही अस्पतालों के बाहर लोगों की भीड़ लगी थी, दवा और वैक्सीन की कालाबाजारी हो रही थी, श्मशानों में अंतिम संस्कार के लिए जगह कम पड़ रही थी और चारों तरफ भय, असहायता का भाव था। सोचें, एक साल की कीमती समय सरकारों के पास था। वे इस समय में कितना कुछ कर सकते थे। लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया। सिर्फ झूठ और झूठ का प्रचार होता रहा। लफ्फाजी होती रही। लोगों को बेवकूफ बनाने के तरह तरह के जतन किए जाते रहे। जिसको कोरोना बजट कहा गया उसमें भी कोरोना से लड़ने के लिए कितने पैसे का प्रावधान है और उसका क्या हो रहा है, यह किसी को पता नहीं है। 21 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज का फायदा किसको मिला, यह भी कोई नहीं जानता है। पीएम-केयर्स फंड में हजारों करोड़ रुपए जमा हुए वह कहां खर्च हो रहा है या राज्यों को कोरोना से निपटने के लिए कितना पैसा भेजा गया, यह भी किसी को पता नहीं है। लेकिन दावे ऐसे हैं, जैसे दुनिया में किसी ने किसी ने नहीं किए होंगे।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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