मोदी के खुद मोर्चा संभालने की मजबूरी

देश की सत्ता और भाजपा की कमान संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने सबसे पहला काम पॉपुलर परसेप्शन यानी लोकप्रिय धारणा को नियंत्रित करने की मशीनरी तैयार करने का किया। उस समय लगता था कि भारत जैसे देश में इतना बड़ा आईटी सेल बनाने या हजारों की संख्या में साइबर सोल्जर तैयार करने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि भारत में राजनीति जमीन पर और जमीनी मुद्दों पर होती है। परंतु इस मामले में मोदी और शाह की दूरदर्शिता को मानना पड़ेगा।

दोनों ने इस बात को तभी समझा था कि अगली लड़ाई साइबर स्पेस में होगी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लड़ी जाएगी और जिसके पास उस लड़ाई के साधन होंगे वहीं जीतेगा। उन्हें यह भी पता था कि जो धारणा की लड़ाई जीतेगा, वहीं चुनाव जीतेगा। पता नहीं मोदी और शाह ने 1947 में एडवर्ड एल बार्नेस की लिखी किताब ‘द इंजीनियरिंग ऑफ कन्सेंट’ या 1988 में लिखी एडवर्ड एस हरमन और नोम चोमस्की की किताब ‘मैन्यूफैक्चरिंग कन्सेंट’ पढ़ी है या नहीं पर मास मीडिया को, आम लोगों के मानस को, उनकी सोच को और उनकी कल्पना को कैसे प्रभावित किया जाता है, कैसे नियंत्रित किया जाता है, यह बात वे दोनों जानते हैं। कन्सेंट मैन्यूफैक्चरिंग के लिए या उसे इंजीनियर करने के लिए उन्होंने सारे उपकरण जुटाए हुए हैं। अपने मनमाफिक धारणा बनवाने के लिए वैकल्पिक सत्य प्रस्तुत करने में भी उन्हें हिचक नहीं होती है। अपनी श्रेष्ठता और विपक्ष के ‘पप्पू’ होने का नैरेटिव इसी तरह बनाया गया है।

इसके बावजूद पिछले कुछ समय से प्रधानमंत्री, केंद्र सरकार व भारतीय जनता पार्टी धारणा की लड़ाई में पिछड़ रहे हैं। कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने के लिए बिना सोचे-समझे लागू किए गए लॉकडाउन के समय से धारणा बदलनी शुरू हुई। उसके बाद प्रवासी मजदूरों के पलायन से पैदा हुए ऐतिहासिक संकट ने सब कुछ मुमकिन कर देने वाले नेता के तौर पर मोदी की छवि को प्रभावित किया। यह धारणा बनी कि भारत न तो कोरोना वायरस से प्रभावी तरीके से लड़ पा रहा है, न अपने मजदूरों व कामगारों की हिफाजत कर पा रहा है, न अर्थव्यवस्था संभल रही है और न सीमा पर चीन की आक्रामकता को रोकने में सफलता मिल पा रही है।

ये कुल चार मामले हुए- कोरोना वायरस, आर्थिक संकट, मजदूरों का पलायन व उनकी समस्या और सीमा पर चीन के साथ चल रहा तनाव। इन चार मुद्दों पर धारणा बदली तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मजबूरी हो गई कि वे खुद आगे आएं और धारणा की लड़ाई खुद लड़ें। अब तक यह काम उन्होंने भाजपा की आईटी सेल और अमित शाह के ऊपर छोड़ा था। मोदी ने पार्टी के कामकाज से तो लगभग पूरी तरह से अपने को अलग कर लिया था और सरकार में भी वे आर्थिक व वैश्विक मुद्दों पर ही ध्यान देते थे। घरेलू राजनीति और सरकार के रोजमर्रा के कामकाज में उनकी दिलचस्पी बहुत कम हो गई थी। पर अचानक मोदी ने सब कुछ खुद संभाला है। वे आगे बढ़ कर हर उस चीज को फिक्स कर रहे हैं, जिससे उनकी छवि प्रभावित हो रही थी और उनके प्रति लोगों की धारणा बदलनी शुरू हुई थी। काफी समय के बाद ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री ने संघ के तीन-चार बड़े पदाधिकारियों के साथ बैठक की और सरकार व संगठन के बारे में विचार-विमर्श किया।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की बजाय खुद प्रधानमंत्री लद्दाख की सीमा पर गए। हालांकि लद्दाख में जिस तरह की तैयारी हुई थी उससे जाहिर हो गया कि प्रधानमंत्री मोदी को ही वहां जाना था और उसकी तैयारी पहले से हो रही थी। लेकिन मैसेज यह दिया गया कि उनका कार्यक्रम अचानक बना ताकि यह न लगे कि वे चीन की आक्रामकता पर आम जनता की धारणा को प्रभावित करने के लिए तैयारी करके अग्रिम मोर्चे का दौरा करने गए हैं। वहां से उन्होंने सिर्फ सेना को संबोधित नहीं किया या चीन को मैसेज नहीं दिया, बल्कि अपनी कांस्टीट्यूएंसी यानी बहुसंख्यक हिंदू आबादी को भी संबोधित किया। इतने भर से चीन को ठोक देने का मैसेज भाजपा की आईटी सेल ने बनवा दिया।

प्रधानमंत्री बनने के बाद बिल्कुल शुरुआती दिनों में राजधानी दिल्ली में एक भाषण के दौरान प्रधानमंत्री ने खुद को ‘नसीब वाला’ बताया था। उन्होंने कहा था कि उनके नसीब से कच्चे तेल के दाम कम हो रहे हैं और इसका लाभ लोगों को मिल रहा है। पिछले कुछ समय से उनके ‘नसीब वाला’ होने की धारणा भी प्रभावित हो रही थी। देश में एक के बाद एक संकट आ रहे थे। पहले कोरोना का संकट आया, फिर मजदूरों का पलायन हुआ, लॉकडाउन की वजह से करोड़ों लोगों की नौकरियां और रोजगार गए, चीन ने घुसपैठ की और हिंसक झड़प में सेना के 20 जवान शहीद हुए, पिछले तीन महीने में एक दर्जन से ज्यादा भूकंप आए और टिड्डियों के हमले से लाखों किसानों की फसल बरबाद हुई। तभी उनके नसीब वाले भाषण का सोशल मीडिया में मजाक बनने लगा। सो, प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने पिछले संबोधन में इसका जवाब दिया। उन्होंने कोरोना, चीन, भूकंप, टिड्डी सबका जिक्र करते हुए कहा कि भारत इन सारे संकटों से पार पा लेगा। उन्होंने संकटों और मुश्किलों का मुकाबला करने की भारत की ‘अद्भुत क्षमता’ का जिक्र किया और इसे प्राचीन भारत के साथ जोड़ते हुए परोक्ष रूप से मुस्लिम आक्रांताओं व ब्रिटिश शासन का हवाला देकर कहा कि भारत इन सारे संकटों से निकल कर, निखर कर आया है और आगे भी निकलेगा।

एक पार्टी के तौर पर भाजपा के चुनाव लड़ने वाली मशीनरी में बदल जाने की धारणा पर भी मोदी ने जवाब दिया। सेवा ही संगठन है नाम से एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री ने कहा कि भाजपा सिर्फ चुनाव जीतने वाली मशीनरी नहीं है, बल्कि भाजपा के लिए सेवा ही संगठन है। जबकि हकीकत यह है कि पिछले छह साल में मोदी और शाह ने भाजपा को चुनाव लड़ने वाली मशीनरी में तब्दील कर दिया है। कोरोना संकट के बीच भी पार्टी का संगठन अपने नेताओं की वर्चुअल रैलियां आयोजित करने में लगा रहा। इससे यह धारणा बनी और इसका प्रचार भी हुआ कि भाजपा कोरोना के संकट के बीच भी चुनावी राजनीति में बिजी है। तभी प्रधानमंत्री ने सेवा ही संगठन कार्यक्रम में यह बताया कि भाजपा की प्रदेश इकाइयों ने कोरोना से प्रभावितों की मदद के लिए कितना काम किया।

जबकि हकीकत यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा कोरोना और मजदूरों के संकट के समय में नदारद रही। बाद में सक्रिय भी हुई तो वर्चुअल रैलियां कराने और सरकारों में तोड़-फोड़ के लिए। ध्यान रहे मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिराने और गुजरात में कांग्रेस विधायकों की तोड़-फोड़ से भी भाजपा के बारे में यह धारणा बनी थी कि वह हर संकट के समय सिर्फ राजनीति करती है। जाहिर है प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम मीडिया और सोशल मीडिया में बनने वाले हर नैरेटिव पर नजर रखती है। तभी रियल टाइम में उनको पता चलता है कि लोगों में क्या धारणा बन रही है और कैसे उसका जवाब दिया जा सकता है। पिछले कुछ समय से धारणा इतनी तेजी से बदलने लगी थी कि मजबूरी में मोदी को खुद आगे आना पड़ा और हर मुद्दे पर खुद जवाब देना पड़ा।

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