रोजगार के भ्रामक आंकड़े

सेंटर फॉर मोनिटरिंग ऑफ इंडियन इकॉनोमी ने कुछ रोज पहले अपनी रिपोर्ट में ये कहा कि लॉकडाउन हटने के बाद देश में बेरोजगारी तेजी से घटी है। इसको लेकर एक भ्रम पैदा हुआ। सीएमआईई के निष्कर्ष पर कई सवाल खड़े किए गए। तो उसके बाद इस संस्था ने स्पष्टीकरण दिया कि ये सामान्य गतिविधियां हैं, जो अब शुरू हो गई हैं। जहां तक सैलरी जॉब का सवाल है, उसकी स्थिति बदतर बनी हुई है। सीएमआईई के डेटा काफी विश्वसनीय माना जाता है रहा। फिर भी ज्यादातर जानकार मनरेगा और मौसमी कृषि गतिविधि के दम पर दर्ज की गई रोजगार में इस वृद्धि को असली वृद्धि नहीं मानते हैं। उनके मताबिक जो व्यक्ति शहर में किसी नियमित रोजगार या स्वरोजगार में था और वो सब बंद हो जाने से उसने गांव जा कर मनरेगा के तहत कुछ काम किया तो इसे रोजगार के आंकड़ों में नहीं जोड़ना चाहिए। वह व्यक्ति जिस तरह का काम कर रहा था और उस से उसकी जिस तरह की आय हो रही थी, उसे ना तो वैसा काम मिला और ना वैसी आय। इस वजह से यह संकेत देना कि अर्थव्यवस्था महामारी से पहले के स्तर की तरफ लौट रही है, भ्रामक है। यह सच्चाई इस से दूर है।

विशेषज्ञों के मुताबिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था की का हाल बहुत बुरा है, क्योंकि कृषि उत्पादों के दाम पहले से भी बहुत ही नीचे स्तर पर हैं। फिर यह गौरतलब है कि शहरों से तो अभी भी गांवों की तरफ पलायन ही चल रहा है, जो कि शहरों में नौकरियां ना होने का सबूत है। जहां तक गांवों की बात है तो वहां से कहीं लोगों के अभी तक मनरेगा के जॉब-कार्ड ही नहीं बनने और जहां बने हैं उनमें से बहुत सी जगहों से 5-7 दिनों में एक दिन काम मिलने की खबरें आई हैं। बहरहाल, सरकारी आंकड़ों के अभाव में सीएमआईई के आंकड़ों को पूरी तरह से मान लेना या नकार देना मुश्किल है। असलियत क्या है यह जानने के लिए कुछ और अध्ययनों का इंतजार करना पड़ेगा। फिलहाल यह स्मरणीय है कि सीएमआईई ने तालाबंदी के दौरान 27 प्रतिशत बेरोजगारी के आंकड़े दिए थे। तब कई दूसरी संस्थाओं के आंकड़े 50 से 60 प्रतिशत बेरोजगारी दिखा रहे थे। असल मुद्दा यह है कि भारत सरकार ने अपने आंकड़ों पर परदा डाल दिया है। नतीजा है कि आज असली सूरत जानने के लिए हमें गैर-सरकारी आंकड़ों का मुंह ताकना पड़ता है।

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