सुई की नोक बराबर काम नहीं - Naya India
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सुई की नोक बराबर काम नहीं

दुर्भाग्य की बात है जो भारत में कोरोना वायरस की आपदा को अवसर बनाया गया और फिर आपदा के बीच उत्सव मनाया गया। जिससे जहां भी संभव हुआ उसने वहां कोरोना और दूसरी बीमारी के मरीजों को लूटना शुरू कर दिया। कोरोना की टेस्टिंग से लेकर अस्पतालों में इलाज तक हर जगह अभूतपूर्व लूट मची। वह लूट अभी तक जारी है। इसके बाद प्रधानमंत्री ने आपदा में उत्सव का ऐलान किया। उन्होंने पहले ताली-थाली बजवाई थी और बाद में दीये जलवाए थे। इस बार उत्सव में उन्होंने टीका उत्सव मनवाया है। लेकिन हकीकत यह है कि चार दिन के टीका उत्सव के दौरान कई राज्यों में टीकाकरण की रफ्तार कम हो गई क्योंकि वैक्सीन की डोज उपलब्ध नहीं थी। सोचें, देश में कोरोना वायरस का संक्रमण रोकने वाले टीके ज्यादा से ज्यादा संख्या में बनें इसके लिए पूरे साल सरकार ने कुछ नहीं किया। दो निजी कंपनियों ने जैसे तैसे और बिना सरकारी मदद के अपने यहां टीका बनवाया तो प्रधानमंत्री ने जाकर उनकी लैब का ऐसा मुआयना किया, जैसे खुद अपनी देख-रेख में वैक्सीन बनवा रहे हों। उसके बाद केंद्र सरकार ने वैक्सीनेशन की पूरी प्रक्रिया को केंद्रीकृत किए रखा, जिसकी वजह से कई तरह की समस्याएं हुई हैं।

सरकार ने आपदा से कोई सबक नहीं लिया और पूरे एक साल में स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुई की नोक के बराबर सुधार नहीं किया। इसकी मिसाल यह है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लेकर एनसीआर के मिलेनियम सिटी गुरुग्राम तक और मुंबई से लेकर लखनऊ और पटना तक लोग कोरोना की टेस्टिंग के लिए या खून की जांच कराने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। कई राज्यों में तो कलेक्टर के ऑफिस से पर्ची जारी हो रही है और इस पर्ची के जरिए तीन दिन के इंतजार के बाद आरटी-पीसीआर टेस्ट हो पा रहा है। याद करें प्रधानमंत्री ने कोरोना से लड़ने का पहला मंत्र क्या दिया था? उन्होंने ‘थ्री टी’ यानी टेस्टिंग, ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट का मंत्र दिया था। कोई पूछे कि इस मंत्र को लागू करने के लिए पूरे एक साल में क्या किया गया?

क्या कहीं टेस्टिंग लैब्स बढ़ाए गए हैं? क्या सरकार ने निजी क्षेत्र को लैब बनाने के लिए अनुदान या सस्ते कर्ज या किसी किस्म की सब्सिडी का ऐलान किया?  क्या सरकारी लैब्स में टेक्नीशियन की भर्ती हुई? क्या टेस्ट के लिए नए किट्स बनाने का कोई नया करार हुआ? जब न कोई नया लैब बना, न नए टेक्नीशियन नियुक्त हुए, न नए किट्स आए तो कहां से जांच होगी? कोरोना की दूसरी लहर की सबसे बड़ी परिघटना यह है कि इस बार लोग लक्षण दिखने के बाद कई कई दिन तक टेस्ट नहीं करा पा रहे हैं और इस दौरान वायरस उनके फेफड़ों को छलनी कर दे रहा है। जब तक बीमारी की गंभीरता का पता चलता है, तब तक नुकसान हो गया होता है। उसके बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि गंभीर मरीज को अस्पताल में जगह मिल जाएगी, उसके मुंह पर ऑक्सीजन का मास्क लग जाएगा या उसे वेंटिलेटर मिल जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि कहीं भी अस्पतालों में आईसीयू बेड्स या वेंटिलेटर वाले बेड्स नहीं बढ़ाए गए हैं। नए अस्पताल नहीं बने हैं और न अस्पतालों में बेड्स बढ़ाए गए हैं। दुनिया के अनेक सभ्य देशों ने अभियान चला कर स्वास्थ्यकर्मियों और वालंटियर्स की भरती की, जो आपात स्थिति में काम आए। लेकिन भारत में कहीं भी बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मी और वालंटियर भरती करने की सूचना नहीं है।

अगर प्रधानमंत्री ने अपने ‘थ्री टी’ मंत्र का पालन किया होता तो स्वास्थ्यकर्मी और वालंटियर भर्ती कराए गए होते और फिर ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट में दिक्कत नहीं आती। आज हकीकत यह है कि हर जगह कांटेक्ट ट्रेसिंग बंद है। किसी भी तरीके से यह पता नहीं लगाया जा रहा है कि अगर कोई संक्रमित हुआ है तो कैसे हुआ है, उसका स्रोत क्या है और उस स्रोत से और कितने लोग संक्रमित हुए हो सकते हैं। कांटेक्ट ट्रेसिंग नहीं हो रही है इसलिए वायरस इतनी तेजी से फैल रहा है। स्वास्थ्यकर्मी और वालंटियर्स बहाल हुए होते तो अस्पतालों में कम से कम मरीजों का ख्याल रखने वाला तो कोई होता! लेकिन ऐसा नहीं किया गया इसलिए मरीज अस्पतालों में पहुंचने के बाद इधर-उधर पड़े रहते हैं और कोई देखने वाला नहीं है। दूसरी लहर की महामारी के बावजूद अब भी ऐसा नहीं लग रहा है कि कोई सबक लिया गया है क्योंकि अब भी कहीं अस्पताल, मेडिकल कॉलेज या नर्सिंग कॉलेज खोलने के बारे में नहीं सोचा जा रहा है। अब भी तात्कालिक उपाय या जुगाड़ से किसी तरह काम चला लेने का इंतजाम किया जा रहा है। उसके बाद फिर सब कुछ अपने पुराने ढर्रे पर चलने लगेगा। जिस तरह से महामारी के एक साल के समय को बेकार गंवा दिया गया वैसे ही आगे भी कुछ नहीं सोचा जाना है।

महामारी की पहली लहर से भारत को बड़ा सबक लेना चाहिए था। बाकी सारी चीजों पर से फोकस हटा कर सरकार को सारे संसाधन स्वास्थ्य क्षेत्र में लगाने चाहिए थे। भारत में फार्मा उद्योग बहुत मजबूत है और वैक्सीन उत्पादन का तो सबसे बड़ा सेंटर है। इस स्थिति का फायदा उठाते हुए जरूरी दवाओं का उत्पादन बढ़ाने पर जोर देना चाहिए थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि रेमडेसिविर और फैबिफ्लू जैसी दवाओं का कालाबाजारी हो रही है या भाजपा के नेता पार्टी कार्यालय में बैठ कर बांट रहे हैं। बुखार और जुकाम की मामूली दवाएं बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। स्टीमर और नेबुलाइजर के लिए लोगों को भटकना पड़ रहा है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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