हरिशंकर व्यास कॉलम | अपन तो कहेंगे | बेबाक विचार| नया इंडिया| Corona crisis Rich Poor अमीर ‘नॉर्मल’ और गरीब ‘रामभरोसे’

अमीर ‘नॉर्मल’ और गरीब ‘रामभरोसे’!

Corona crisis Rich Poor

वक्त था जब डोनाल्ड ट्रंप, बाइडेन, बोरिस जॉनसन से लेकर नरेंद्र मोदी सभी नेता जनता से वादा करते थे कि हम कोरोना वायरस को हरा कर, उसे खत्म करके दम लेंगे। मतलब महामारी खत्म होगी तभी सामान्य हालात बनेंगे। दुनिया ‘नॉर्मल’ होगी। अब? वायरस को मिटाने का इरादा छोड़ सब ‘नॉर्मल’ हो रहे हैं। सो, क्या गजब बात है जो महामारी खत्म नहीं हुई लेकिन अमीर देशों में कोरोना वायरस बैकग्राउंड में जा रहा है। ये देश इस आत्मविश्वास में हैं कि महामारी की हकीकत के बावजूद भविष्य में जिंदगी नहीं ठहरेगी। वैक्सीन और उसके बूस्टर डोज बनने व लगने से लोग ज्यादा नहीं मरेंगे। Corona crisis Rich Poor

जाहिर है अमीर देश इस सोच से ‘नॉर्मल’ हैं कि वायरस का प्रबंधन बतौर बीमारी हो और अस्पतालों का प्रबंध पुख्ता रहे तो सब ठीक। इसका अर्थ यह नहीं कि महामारी का खौफ, चुनौती का मामला खत्म है। उसके आगे हर अमीर सरकार समानांतर कार्रवाई करते हुए है। विकसित देशों का यह रवैया और आत्मविश्वास पूरी दुनिया में यह मूड बनवा रहा है कि महामारी से कब तक डरे रहेंगे। तभी वैक्सीनेशन के अलावा जलवायु संकट, बेरोजगारी, सप्लाई चेन दुरूस्त कराने, आर्थिकी दौड़ाने की चिंता हावी हो गई है। वैश्विक मीडिया भी ग्लोबल नॉर्मलसी इंडेक्स की कसौटियों में बताने लगा है कि यातायात और यात्रा, मनोरंजन और मौजमस्ती, खुदरा व्यापार व कामकाज में लोगों की गतिविधियां सामान्य होती हुई हैं।

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ग्लोबल नॉर्मलसी इंडेक्स के अनुसार कोरोना वायरस आने के बाद उसके खौफ और लॉकडाउन से अप्रैल 2020 में भीड़ याकि नॉर्मलसी यदि 33 प्रतिशत रह गई थी तो वह अब 66 प्रतिशत और उससे ज्यादा है। महानगरों में ट्रैफिक जाम होने लगा है। विदेश यात्राएं शुरू हो गई हैं। सिनेमा हॉल, स्टेडियम में भीड़ दिखती है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में नेताओं की भीड़ है तो विश्व राजनीति के दांवपेंच भी अब परस्पर मेल-मुलाकात से तय हो रहे हैं।

क्या यह सब अमीर देशों की अमीरी से नहीं है? 70-80 प्रतिशत आबादी के वैक्सीनेशन, आगे बूस्टर के रोडमैप और चिकित्सा व्यवस्था को चाक-चौबंद बना लेने के बाद ब्रिटेन यदि जेब, जैब (टीका, टीका) की जगह जॉब, जॉब की प्राथमिकता में नॉर्मल हो रहा है और अमेरिका व यूरोपीय देश के नागरिक महामारी के दौरान मिली लाखों रुपए की राहत को सैर-सपाटे में खर्च कर रहे हैं तो कुल मिला कर यह सब वैसा ही है जैसे भारत के अमीर लोगों, नियमित-स्थायी तनख्वाह पाने वाले सरकारी कर्मचारियों या पेशेवरों के लिए वक्त का ‘नॉर्मल’ होना है।

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उस नाते कोरोना वायरस की महामारी अमीर बनाम गरीब का नया फर्क, नया व्यवहार बना रही है। जिन्होंने दो टीके लगा लिए हैं, जिनकी समय रहते अगले बूस्टर टीके लगाने, मेडिकल सुविधाओं का भरोसा है उनका जीवन सामान्य दिनों की तरह लौटता हुआ है पर जो गरीब है जहां बीस-तीस प्रतिशत आबादी को भी टीका नहीं लगा है और आगे का पता नहीं है वह आबादी या तो अज्ञानता में जोखिम के साथ नॉर्मल होती हुई है या चिंता और बेचैनी में महज वक्त काटते हुए है।

अजब-गजब बात है जो फरवरी 2020 में वायरस की खबर के बाद लोगों का जो अलग-अलग व्यवहार बना था वह आज भी जस का तस है। मतलब कुछ देशों और आबादियों ने महामारी का वैज्ञानिकता से सामना किया तो कुछ ने झूठ, अंधविश्वास और अज्ञानता से तो तीसरी श्रेणी में वे लोग, वे देश हैं जो पहले दिन से रामभरोसे हैं।

सवाल है बीस महीने बाद सितंबर 2021 में दुनिया जस की तस क्या तीन हिस्सों में नहीं बंटी हुई है? अमीर देशों में सबसे ज्यादा खौफ, सबसे ज्यादा मौतें हुईं तो सबसे पहले वे महामारी के बीच में ‘नॉर्मल’ होते हुए, आगे बढ़ रहे हैं। फिर विकासशील-उभरती आर्थिकी वाले देश याकि ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत, मेक्सिको जैसे देश हैं, जिन्होंने झूठ-प्रपंच-अवैज्ञानिकता के साथ महामारी को हैंडल किया, मौतें हुईं और असंख्य लोग-परिवार भयावह अनुभव व त्रासदियों से गुजरे और बीस महीने बाद भी अनिश्चितताओं में जी रहे हैं। तीसरी श्रेणी में अफगानिस्तान, पाकिस्तान से लेकर अफ्रीकी-लातीनी अमेरिका और एशिया के ऐसे असंख्य देश हैं, जो महामारी का या तो गुमनामी से सामना करते हुए थे या इस असहायता के साथ कि करें तो क्या करें! हां, संयुक्त राष्ट्र के 195 देशों में से आला पचास देशों को छोड़ें तो कम से कम सवा सौ देश ऐसे हैं, जो अपनी सीमाओं के टापू में ठहरे और सन्नाटे का जीवन जीते रहे हैं। फिर भले वह सेशेल्स हो या मोजांबिक, जिम्बाब्वे या पेरू या किर्गिस्तान व मंगोलिया! अपनी राय में इन छोटे देशों का महामारी का वक्त वैसा ही रहस्यमयी है, जैसे भारत में मुझे बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश पर यह सोचते हुए समझ आता है कि ऐसा कैसे कि विकसित प्रदेश केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु महामारी से जूझते हुए थे या हैं जबकि उत्तर भारत के राज्यों का वक्त ऐसे गुजरा मानो वायरस इन राज्यों को बाईपास कर पूर्वोत्तर गया हो।

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बहरहाल, मूल मुद्दे पर लौटा जाए कि पूरी दुनिया महामारी के खौफ से बाहर निकल नॉर्मल होती हुई है या नॉर्मलसी सिर्फ अमीर देशों में? यों भीड़ के चलते भारत में सामान्य हालात बनते, भारत ‘नॉर्मल’ होता समझ आएगा लेकिन क्या सचमुच? वह अमेरिका, ब्रिटेन की तरह नॉर्मल है या कोई फर्क है। फर्क है तो वह कितना गहरा है और कितना लंबा चलेगा? जवाब में दलील यहीं बनेगी कि बतौर राष्ट्र-राज्य भारत में महामारी कब क्या रूप ले, इसका अनुमान नहीं लगा सकते है जबकि अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप या चीन जैसे देश महामारी को रूटिन अंदाज में हैंडल करने के संसाधन, अनुभव, तैयारियां और वह आत्मविश्वास लिए हुए हैं, जिनसे सरकार की प्राथमिकता बदली है। राष्ट्रपति बाइडेन, प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन याकि अमीर देश विकास, महंगाई और सप्लाई चेन, शिपिंग दिक्कतों (व्यापार, कच्चे माल-सामान की आवाजाही में उछाल से कंटेनर की भारी कमी जैसी समस्याओं से अमीर देश बुरी तरह परेशान है) में फंसे हैं। वहां उत्पादन कम है और मांग ज्यादा तभी अमेरिका में महंगाई तेजी से बढ़ती हुई है। ठीक विपरित भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में मांग का टोटा है और आर्थिकी लगभग रूकी हुई है और लोग वेट एंड वॉच के मोड में हैं तो जाहिर है भीड़ और ट्रैफिक की हलचल सतही है। यों अमेरिका और यूरोपीय देशों में जैसे सितंबर को टर्निंग प्वाइंट माना जा रहा है वैसे भारत के मामले में अक्टूबर-दिसंबर के तीन महीने भीड़, खरीद, मांग, उत्पादन में दिशासूचक होंगे। यदि इस दौरान महामारी की लहर नहीं आई तो गति बनेगी अन्यथा 2022 में ही समझ आएगा कि रामभरोसे के वक्त से हम बाहर निकल पाते भी हैं या नहीं?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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