न्यू इंडिया में अंधेरे वाली सुबह!

मानो सब कुछ खाक! सुनीता को बूझ नहीं रहा कि वह कहां है, चारों ओर क्या है!उसे तो बस बिहार लौटना है अपने दिवंगत हो चुके पति के पास। उसकी सूनी-घूमती आंखों से सिर्फ और सिर्फ घर लौटने की चीख निकल रही थी। मास्क मुंह पर लटका हुआ था और सिर पर टिका सामान से भरा बैग। उसके चारों ओर लोगों का आना-जाना था तो एक दूसरे पर चिल्लाने की आवाजें भी। भीड़ और उसका हर चेहरा दुख, बेबसी और पीड़ा में बोलता, चिल्लाता  हुआ।

सुनीता दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर खड़ी है,गाजीपुर मंडी से कुछ किलोमीटर आगे। चौतरफा लोगों की भीड़ में वह गुमशुदा अकेली सी। बात पिछले शुक्रवार की है और मैं भीड़ के बीच उस एपिसेंटर को हल्ले-गुल्ले में समझना चाह रही हूं, जो24 मार्च से दिल्ली से निकले लाखों पैदल यात्रियों का गवाह रहा है। जिस पर हर दिन दिल्ली की सीमा पर प्रवासी लोग अपने गांवों की दिशा मेंनजरें उठाए बतौर भीड़ जमा हो सड़क पर पैदल चल पड़े हैं। लेकिन आज लॉकडाउन के वक्त में अपना बेरहम चेहरा दिखला कर सरकार द्वाराबॉर्डर को सील करना सबको हैरान कर गया है। पुलिस की तैनाती बढ़ी हुई तो अवरोधकों की दीवार ऐसी सख्त, ऊंची कि लोगों कापार होना, उन पर चढ़ पाना मुश्किल।

लेकिन जाने का जब फैसला हैतोउम्मीद छोड़ी नहीं जा सकती,उसे कोई रोक नहीं पाता। रोज हजारों लोगों की भीड़ जमा होती है, उनमें वे भी लोग हैं, जिन्होंने लॉकडाउन में ढील का इंतजार, कई दिन इंतजार किया, सोचा सरकार समझेगी, उनकी आगे आकर मदद करेगी मगरकोई आया नहीं। अब थके, हताश और सब तरफ से खारिज औरव्यवस्था से डरे हुए ये लोग जैसे भी हो पैदल निकल जाना चाहते हैं। समझ नहीं पा रहे हैं किकैसे अवरोधों से पार हुआ जाए!

“ये पुलिस हमको आगे जाने नहीं दे रही, जबकि हमारे पास पास हैं”। हमारे पास कैमराव गले में लटका पास देख कर मनोज ने चिल्ला कर कहा। फिर करीब आ कर उसने बताया कि उस जैसे बीस और नौजवान एक विशेष ट्रेन से जम्मू से दिल्ली पहुंचे। इन सबके पास ट्रेन के टिकट की मूल प्रति थी, जो इन्हें मेरठ और बुलंदशहर तक इनके घर तक जाने के लिए अनुमति पत्र का भी काम करती थी। लेकिन आगे की ट्रेन के लंबे इंतजार के बाद इन लोगों ने पैदल ही गांव निकलने का फैसला किया और अब अपने घर से सौ किलोमीटर पहले ही दिल्ली बॉर्डर पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने इन्हें रोका हुआ है। ये दो महीने से अपने घर पहुंचने के इंतजार व जुगाड़ करते हुए यहां तक पहुंचे औरअब फंसे पड़े हैं।

जब देश में राज्यों के बीच कारों और ट्रकों की मुक्त आवाजाही शुरू है तब भी प्रवासियों की दशा जस की तस है। सरकार की बहुप्रचारित ‘विशेष श्रमिक ट्रेनों’ और बसों तक, दिहाड़ी पर जीने वाले गरीबों को पहुंचना इसलिए नसीब में नहीं है क्योंकि बसों और ट्रेनों में बुकिंग ऑनलाइन और मोबाइल ऐप के जरिए हैं। यदि कोई बुकिंग कराने में कामयाब हुआ भी तो उसके सामने अगली समस्या आती है कि स्टेशन कैसे पहुंचे।

गृह मंत्रालय ने आदेश दिया है कि कोई भी प्रवासी सड़क पर जाता हुआ नजर नहीं आए। ऐसे में पुलिस की सख्ती ने बसों और ट्रेनों तक पहुंचने के मामले में इन प्रवासियों की यात्रा को और मुश्किल बना दिया है। लेकिन ये लोग भी ज्यादा गुस्से और जुनूनमें घरों को लौटने की ठाने हुए हैं।  सर्वेश को पंजाब के नाथपुरा से हरियाणा के कोंडली बॉर्डर तक पहुंचने में दो रातें लगीं। लेकिन वहां से पुलिस ने उसे लौटा दिया। सर्वेश का उत्साह टूटा लेकिन हिम्मत नहीं हारी। वह इधर-उधर से चल पड़ा इस उम्मीद में कि भीतर ही भीतर गांवों के रास्ते होता हुआ अपने जिले हरदोई पहुंच जाएगा। सर्वेश अकेला नहीं है। उसकी पत्नी और नौ महीने की बच्ची भी साथ हैं। बच्ची को कंधे पर लिए वह बढ़ता जा रहा है और उसके पीछे पत्नी, जो सामान भी लिए हुए है।

मैं जब इन लोगों से मिली तो ये लोग तकरीबन पांच सौ किलोमीटर का पैदल सफर कर चुके थे। थोड़ी सी यात्रा एक ट्रक से की थी। इनके पास खाने-पीने का सामान खत्म हो चुका था। मैंने इन लोगों को खाने का कुछ सामान और जूस के कुछ पैकेट दिए। उसने बेटी को कंधे से उतारा और जूस पिलाया। सर्वेश ने बताया कि नाथपुरा में वह किराए का कमरा लेकर रहता था। लॉकडाउन में जैसे-तैसे तो दो महीने निकाल लिए। लेकिन फिर पैसे खत्म हो चुके थे। खाने के लिए, किराया देने के लिए भी पैसा नहीं बचा था। काम भी नहीं था दो महीने से। इसलिए पैदल ही घर लौटने का फैसला लिया। पैरों में प्लास्टिक की चप्पलों के साथ मन में संकल्प था जैसे भी हो घर लौटना है। मैंने उससे पूछा कि क्या इन दिनों सरकार की तरफ से उसे या उसकी पत्नी को कोई पैसा मिला, तो उसका जवाब था- सरकार ने कुछ नहीं दिया। मेरा तो खाता नहीं है, लेकिन मेरी पत्नी का है। उसके खाते में जितने पैसे थे उससे दो महीने गुजार लिए, अब पैसे खत्म हैं।

सिर्फ सुनीता, सर्वेश या मनोज के चेहरे की कहानी नहीं है। न ही आठ साल की जीशा और उसके परिवार की जो बिहार पहुंचने के लिए पैदल चलता जा रहा है। बारह साल का विकास अपने बूढ़े पिता और परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ गया जिले में अपने गांव के लिए चला है। दो साल का बाबू और नंदिनी भी अपने माता-पिता के साथ मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में अपने गांव के लिए पैदल निकले हैं। लाखों-करोड़ों ऐसे लोग हैं, जिन्हें कोरोना से निपटने के लिए किए गए लॉकडाउन के वक्त में ऐसे भुला दिया गया मानो वे जीव नहीं हैं। उनकी सुध चौथे चरण के लॉकडाउन में भी वह नहीं है, जैसे किसी भी नागरिक की हर व्यवस्था को लेनी चाहिए। रह रह कर सवाल उठता है कि इस देश की चेतना, संवेदना है कहां? वह कैसे ऐसे गायब है?

प्रवासी मजदूरों का दुख-दर्द और पीड़ा देखने-समझने के लिए मैंने पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश और हरियाणा में पांच सौ किलोमीटर की यात्रा की। जो हालात हैं, मजदूरों का जो दुख-दर्द है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। मैंने अपने मास्क, जूतों, कपड़ों, बालों को न जाने कितनी बार धोया और सेनिटाइज किया होगा, लेकिन इस दौरान प्रवासियों की जो पीड़ा देखी, वह शायद ही कभी धुल पाएगी। लोगों की थकी आंखें, झुके कंधे, पैरों में छाले, फटे कपड़ों से चेहरे को ढके हुए लोग पीड़ा-तकलीफ सब छुपाए चले जा रहे हैं, चलते ही जा रहे हैं। वे किसी अनजान से भी खाने की चीजें ले लेना चाहते हैं और बिना हाथ धोए खा लेंगे। वे मास्क इसलिए लगा रहे हैं क्योंकि सरकार का नियम ऐसा करने के लिए कह रहा है। गर्मी, धूप या बारिश की परवाह किए बिना इन लोगों को बस किसी भी तरह अपने घर पहुंचना है। घर पहुंचने के लिए ये जान देने को तैयार हैं। ये घर पर मरने के लिए तैयार हैं।

और हमारी सरकार और उसका तंत्र? वह कैसा है, क्या करता है, यह आज सभी के समाने है। सरकार केवल श्रमिक ट्रेनों की बढ़ती गिनती के प्रचार की चिंता में है? उससे मान ले रही है कि इतना कर देने भर से लोग घरों को पहुंच गए!

जब मैंने सर्वेश, सुनीता और उन सभी लोगों जिनसे मैं मिली, के फोटो पोस्ट किए तो जबरदस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली। मेरा ट्विटर हैंडल गालियों से भर गया था

किसी ने लिखा- वे ट्रेन में क्यों नहीं जा रहे हैं। वापस लौटने के बजाय उन्हें करीबी रेलवे स्टेशन पर जाना चाहिए और ट्रेन पकड़नी चाहिए,,,।

“ये अपना एजेंडा चला रहे हैं”,

“आप अपनी गाड़ी में बस स्टैंड तक छोड़ आतीं।”,

“ज्ञान कैसे पालेंगे ये”

“क्या आप उन्हें नजदीकी स्टेशन तक नहीं पहुंचा सकतीं? कहां हैं ट्रेनें या शिविर?”

इसमें एक पोस्ट यह भी आई, जिसमें किसी ने सांकेतिक रूप में केविन कार्टर की एक गिद्ध की तस्वीर के साथ एक सूडानी बच्ची की तस्वीर के साथ कुछ लिखा भी। जो लिखा वह था-  “जिस पत्रकार ने यह तस्वीर ली है, वह भी ठीक आप ही की तरह मानसिकता वाला था, लेकिन उसने कुछ महीने बाद ही शर्मिंदगी और पछतावे की वजह से खुदकुशी कर ली थी।” (वाट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर यह पोस्ट जंगल में आग की तरह फैली थी, और इसे आगे भेजने वालों में कुछ ताकतवर लोग भी थे, इनमें से कुछ को मैं जानती हूं जो इस देश में काफी महत्त्वपूर्ण हैं)

यहीं वह न्यू इंडिया है, जिसमें हम जीवन जी रहे हैं। एक ऐसा देश, जिसमें कई पोस्ट और खबरों के बाद सुनीता को मदद मिली (उसे एक विपक्षी दल ने घर भिजवाया)। हालांकि संभवतः सर्वेश अभी रास्ते में ही होगा, और जीशा भी। नंदिनी और बाबू हो सकता है किसी पेड़ की छाया में सुस्ता रहे हों। यह वह न्यू इंडिया है, जो कोरोना महामारी से नहीं, बल्कि घर पहुंचने के लिए गिद्ध रूपी सरकारी तंत्र से लड़ रहा है। यह वह न्यू इंडिया है, जिसमें कोरोना महामारी से लड़ने के लिए काम करने वालों को पीटा जाता है तो ऐसी तस्वीरे शेयर, वायरल कर लॉकडाउन में मजे से घरों में खाते-पीते लोग चिल्लाते हैं कि हम विश्वगुरू हैं। यह ऐसा न्यू इंडिया है, जिसमें लोग सुबह जागते हैं और चलते हैं मौत और अंधेरे की नई सुबह के लिए। ऐसा न्यू इंडिया जो बहुत कम, कम ही वक्त जिंदा रह सकेगा।

सुबह छह बजे हैं। बाकी देश नई सुबह में जागा है, लेकिन प्रवासी मजदूरों के लिए तो नई सुबह आनी है। वह तो फिर अभी अंतहीन यात्रा के लिए चप्पलें तलाश रहा होगा। उसे फिर घर के लिए चल पड़ना है।

2 thoughts on “न्यू इंडिया में अंधेरे वाली सुबह!

  1. मैडम, आप मानवता के साथ खड़ी हैं, यही बहुत बड़ी बात है, आप लोगों की आलोचना से घबराएं नहीं।
    आपने सही कहा है कि संपन्न वर्ग अपने कमरे से ही भारत का गलत आंकलन कर रहा है।

    जिनके घर और पेट सामानों से भरे हुए हैं, वो किसी दूसरे की चिंता क्यों करेंगे?

  2. श्रुति जी आप एक योग्य पिता की यथायोग्य पुत्री है आप पत्रकारिता के उँचे आदर्शो और मानदंडों को अपना रही है ,जिसका परिपालन आज के दौर नामुमकिन नहीं तो कठिन है। आज मै कबीर और नानक को ध्यान करते सोच रहा था कि उस दौर मे जब पापाचार ,पाँखड अंधविश्वास ,कर्मकांड की पराकाष्ठा थी, लोग शिक्षित भी नहीं थे इन लोगों ने कैसे इसके खिलाफ अलख जगाई। यह कितने कामयाब हुऐ एक अलग प्रश्न है। लेकिन इनकी यादें अमिट है।
    धैर्य रखे भावी इतिहास का यह अंधायुग भी समाप्त होगा।

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