ट्रंप की नीम हकीमी ने चलवा दी एचसीक्यू

मुझे याद है कि जब मैं छोटा था तब हमारा देश व समाज चिकित्सा के क्षेत्र में बहुत पिछड़ा हुआ था। तब बीमार को देखने के लिए डाक्टर घर आते व गर्म पानी में अपने इंजेक्शन उबलवा कर उसे रोगी को लगाते। ज्यादातर डाक्टर अपनी गोलियो को पीस कर उनका पाउडर बनाकर देते जिनके बेहद कड़वा होने के कारण उन्हें दूध के साथ खाना पड़ता था। तब टायफाइड बहुत बड़ी बीमारी होती थी व रोगी को कई दिनों तक बीमार रहने के बाद सिर्फ दाल का पानी व खट्टे आटे की रोटी का ऊपरी टुकड़ा खाने को दिया जाता था।

उन दिनो नवलजीन नामक दवा बहुत चर्चित थी। आज जब कोरोना काल में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीइन के बारे में पढ़ता हूं तो मुझे यह सब याद हो आता है। यह दवा इन दिनों बहुत चर्चित हो रही है। इसकी एक वजह यह भी है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से इसे मंगाने के लिए हमें अनुरोध व धमकी दोनों ही भेजी थी। उन्होंने यह तक कह दिया कि वे खुद इस दवा का इस्तेमाल कर रहे हैं।

हालांकि मेरा मानना है कि ट्रंप को दवाओं के बारे मे उतनी ही जानकारी है जितनी की बाबा रामदेव को जीडीपी व अर्थव्यवस्था के बारे में हैं। वे रामदेव व नरेंद्र मोदी का मिला-जुला रूप है। जो इंसान यह जतला रहा है कि उन्हें अपने देश में बड़ी संख्या में लोगों के कोरोना से मारे जाने की जगह आर्थिकी को ले कर चिंता है। उसके बारे में और क्या कहा जा सकता है। यह दवा वास्तव में कोरोना से लड़ने में मदद करती है या नहीं इस पर अनुसंधान चल ही रहा था कि भारत में भी इसकी इतनी ज्यादा मांग बढ़ गई कि मैंने खुद आज इलाके की दवाई की दुकानों के बाहर यह लिखा देखा कि यह दवा उपलब्ध नहीं है।

अब अचानक विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस दवा के उपयोग को लेकर किए जा रहे परीक्षणों पर रोक लगा दी है। वह यह देखना चाहता है कि क्या सचमुच इसके उपयोग से लाभ होता है या नहीं। कुछ विशेषज्ञों का दावा है कि इससे कोई लाभ नहीं होता है बल्कि अक्सर इसके इस्तेमाल से नुकसान ही होता है।

यह तक देखने को मिला है कि इस दवा के उपयोग से कोविड के मरीज को दिल संबंधी रोग पैदा हुए और उनके मरने की संख्या बढ़ी। इस दवा का इस्तेमाल मलेरिया सरीखे रोगों के लिए होता आया है। इसे बोलचाल की भाषा में एचसीक्यू कहते हैं। अब तक माना जाता था कि बीमारी हो जाने के बाद यह काफी प्रभावी रहती थी। डोनाल्ड ट्रंप के यह कहने के बाद कि वे खुद उस दवा का इस्तेमाल कर रहे हैं। दुनिया में इसकी मांगी इतनी ज्यादा बढ़ गई कि आज भारत 55 देशों में यह दवा निर्यात कर रहा है।

यह मलेरिया विरोधी व क्लोरीक्विन के परिवार की ही मानी जाती है। अभी तक अमेरिका की यूएस सेंटर्स फार डिसीज कंट्रोल का मानना यह है कि यह दवा न ही प्रभाव दिखाती है जहां कि क्लोरोक्वीन काम कर रही हो। अब दुनिया के ऐसे स्थान बहुत कम बचे हैं। माना जाता है कि दक्षिणी अमेरिका व कैरेबियन के देशों में क्लोरोक्वीन प्रभावकारी है। अमेरिका में कोविड-19 के रोगी को केवल आपात स्थिति में ही एचएसक्यू के इस्तेमाल की अनुमति दी गई हैं। हालांकि कुछ विशेष हालात में इसे फ्रांस, ब्राजील व रूस व दक्षिणी कोरिया में भी इस्तेमाल किया जा रहा है।

ट्रंप ने इसकी अहमियत भारत से इसका निर्यात न करने पर देख लेने की धमकी देकर बढ़ा दी थी। हालांकि खुद अमेरिकी सरकार के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन का मानना है कि यह दवा सुरक्षित नहीं मानी जा सकती है। इसका इस्तेमाल हम तभी करते हैं जबकि आपात स्थिति में रोगी की जांच पड़ताल न हो पा रही हो। इसके इस्तेमाल करने वाले रोगियो को दिल की गति बढ़ने के साथ-साथ सिर दर्द,  मन घबराने व उलटी होने के मामलो में तेजी आने के प्रभाव भी देखे गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पहले यह कहा था कि हर देश में यह दवा लाइसेंस के तहत ही तैयार की जा रही है। वह हर देश को अपने अनुसार इसका उपयोग या उस पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।

हमारे देश में कोविड मरीजो की देखभाल वाले कुछ  डाक्टर व पैरा मैडिकल स्टाफ यह दवा ले रहा था। हालांकि इसे गर्भवती महिलाओं व दूध पिलाने वाली महिलाओं को नहीं दी जा रही है। छोटे बच्चो को भी यह दवा दिए जाने पर हमारे देश ने प्रतिबंध लगा रखा है। हमारे डाक्टरो का मानना है कि इस दवा को पूरी तरह से सुरक्षित नहीं माना जा सकता है। हमारे देश से कोरोना वायरस के सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र में इसे एक रक्षात्मक दवा के रूप में मरीजो व उनकी देखभाल से जुड़े स्टाफ को दिया जाता रहा है।

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) में महामारी व छुआछूत की बीमारियो के निदेशक डा आर गंगाखेड़कर के मुताबिक हम लोग अभी भी इसके दुष्प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं। हालांकि दवा कोविड मामलो की देखभाल करने वाले डाक्टर व मेडिकल स्टाफ ले रहे है। जहां ज्यादा खतरा है वहां इस दवा को लिया जा रहा है। ये कहते है कि हम दिल के रोगियो को इसे देने के पहले उसका ईसीजी कर लेते हैं।

समस्या यह है कि अभी इसके प्रभावो या दुष्प्रभावो के आंकड़े पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं है ताकि किसी निष्कर्ष तक पहुंचा जा सके। एक निजी अस्पताल के डाक्टर का कहना था कि कोविड मरीजो की देखभाल करने वाले स्टाफ को हम यह दवा देते जरूर है मगर अगर उसका कोई दुष्प्रभाव जैसे कानों का बजना आदि दिखाई पड़ता है तो हम उसे तुरंत बंद कर देते हैं। हमारे देश में अभी भी इसके प्रभाव पर परीक्षण चल रहे हैं। अतः बेहतर यही होगा कि फिलहाल इस दवा का उपयोग एकदम बंद कर दिया जाए।

यह सब देखकर मुझे बचपन की एक घटना की याद आ जाती है। तब शरीर में चोट लगने पर बीड़ी के खाली पैकेट को फाड़कर लगा दिया जाता था। संभवतः वह तंबाकू पैक किए जाने के कारण एंटीबायोटिक का काम करता होगा व खून बहना भी बंद हो जाता होगा। तब भी किसी को बुखार होता था तो वह दौड़कर पंसारी की दुकान पर जाता व वहां से सफेद रंग की सिवालोज की गोली ले आता था। पेट दर्द से लेकर सिरदर्द में इस गोली का इस्तेमाल किया जाता था। बाद में पता चला कि यह कंपनी सीबा गायगी नामक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी द्वारा ली गई थी व इसका नाम संभवत सीबाजैल था। जोकि बोलचाल रूप में सीवाजोल बन गया। मुझे लगता है कि कहीं एचसीक्यू भी सीवाजोल न साबित हो।  जो हो हमारे समाज में कैंसर की दवा ढूंढ़ निकालने का दावा करने वाले बाबा रामदेव से लेकर खुद एचसीक्यू दवा लेने वाले ट्रंप तक आज मौजूद हैं।

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