मुश्किल बस उतनी ही नहीं

तालाबंदी लागू होने के बाद हजारों मजदूरों का रेला सड़कों पर उतरा, तो दुनिया ने उसे देखा। भारत में उसको लेकर अभी चर्चा शुरू हुई थी कि तबलीगी जमात के मरकज का मामला उठ गया- या कहा जाए कि उछाल दिया गया। तब से कोरोना संकट का सांप्रदायिक विमर्श छाया हुआ है। कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार ने आधिकारिक रूप से कोरोना के लिए मरकज को जिम्मेदार नहीं ठहराया है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पार्टी नेताओं को इस महामारी का सांप्रदायीकरण ना करने की सलाह दी है। मगर यह भी सच है कि जिस ताकत के साथ मीडिया और सोशल के जरिए बनाए गए माहौल का मुकाबला किया जाना चाहिए था, वह भी नहीं किया गया है। बहरहाल, इसका एक नतीजा यह जरूर रहा कि मजूदरों की मुश्किलों से देश का ध्यान हट गया। मुमकिन है कि सत्ताधारी जमात ने इससे राहत महसूस की हो। मगर इससे वो समस्या खत्म नहीं हो गई है। मसला सिर्फ यह नहीं था कि मजदूर घरों की तरफ चल पड़े थे। असली समस्या उनकी रोजी-रोटी और उनके सामने मौजूद भुखमरी की समस्या का है। अभी हालत यह है कि बड़ी संख्या में मजदूर- जिनमें दिहाड़ी मजदूर भी शामिल हैं- ट्रेनों के रुकने की वजह से फंसे हुए हैं।

मसलन, मुंबई के भिवंडी में हथकरघा कपड़ा उद्योग के श्रमिक इसी तरह से फंस हुए हैं। कई प्रवासी मजदूर मुफ्त भोजन के सहारे किसी तरह से गुजारा कर रहे हैं। कंपनियों, मिल मालिकों या स्थानीय प्रशासन की तरफ से प्रवासी मजदूरों को दिन में दो बार भोजन दिए जा रहे हैं। मगर यह समस्या का समाधान नहीं है। ऐसी खबरें आई हैं कि जहां भोजन बंटता है वहां दर्जनों मजदूर इकट्ठा होकर दोपहर के भोजन के लिए आपस में धक्का-मुक्की करते हैं। सवाल है कि उनके लिए सोशल डिस्टेंसिंग का क्या अर्थ रह जाता है। अक्सर अपनी प्यास बुझाने के लिए अस्वच्छ पानी को पी रहे हैं। कुछ मजदूरों का हाल यह कि उन्होंने कई दिनों से स्नान तक नहीं किया है, क्योंकि उन्हें पानी उपलब्ध नहीं है या फिर उनके पास साबुन खरीदने तक के पैसे नहीं है। कुछ मजदूर शौच भी खुले में कर रहे हैं, क्योंकि शौचालय के इस्तेमाल के लिए पैसे देने पड़ते हैं। क्या यह हाल रहा तो लॉकडाउन का मकसद परास्त नहीं हो जाएगा?

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