मजदूरों से हमदर्दी क्यों नहीं? - Naya India
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मजदूरों से हमदर्दी क्यों नहीं?

केंद्र सरकार ने जब प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुंचाने की इजाजत दी और लंबे समय तक भ्रम के बाद आखिरकार ट्रेन से उन्हें ले जाने का एलान किया, तो लाखों लोगों ने राहत की सांस ली। लेकिन तब मजदूरों को यह मालूम नहीं था कि उनसे रेलवे किराया वसूलेगी। और ये किराया भी आम किराए से ज्यादा होगा। जो मजदूर लगभग डेढ़ महीने से बिना कामकाज के बैठे हैं, उनसे पूरे परिवार का स्लीपर क्लास का किराया चुकाने की बात सोचना भी आज के वक्त में दुस्साहस जैसा लगता है। इसलिए इसमें कोई हैरत नहीं कि जगह-जगह से मजदूरों के रेलवे स्टेशनों से मयूस लौटने की खबरों से समाचार माध्यम भरे पड़े हैं। केंद्र ने इसे राज्यों की जिम्मेदारी मान कर अपना पल्ला झाड़ लिया। जबकि रेलवे उसके तहत है और उसके लिए इस लागत को उठा लेना आसान था। अगर रेलवे की माली हालत पतली है, तो प्रधानमंत्री यह दिखा सकते थे कि वो सचमुच सबसे गरीब लोगों की चिंता करते हैं। ऐसा करने के लिए उनके पास पीएम केयर्स फंड है, जिसमें योगदान लगातार बढ़ता गया है। इस मौके पर ये सवाल वाजिब है कि आखिर ये फंड किसलिए और किस दिन के लिए है? मगर यह सब ना करके केंद्र ने यही दिखाया है कि जब गरीबों की बात आती है तो उसकी हमदर्दी चूकने लगती है।

गौरतलब है कि गृह मंत्रालय ने विभिन्न राज्यों में फंसे लोगों को विशेष ट्रेनों से यात्रा करने की इजाजत देने के बाद रेल मंत्रालय ने इस संबंध में गाइडलाइन जारी की है। इसके मुताबिक ‘श्रमिक ट्रेनों’ से यात्रा करने वाले लोगों से किराया वसूला जाएगा। फंसे छात्रों और तीर्थयात्रियों आदि से भी ट्रेन का किराया वसूलने की भी बात कही गई है। श्रमिक ट्रेन चलाने के एलान के बाद रेलवे ने बीते शुक्रवार को कहा था कि इन ट्रेनों के यात्रियों से स्लीपर क्लास का किराया और अतिरिक्त 50 रुपये लिए जाएंगे। उसने ये भी कहा कि राज्य अगर चाहें तो वे यात्रियों की जगह पर खुद किराए का भुगतान कर सकते हैं। प्रश्न है कि राज्य ऐसा कर सकते हैं तो केंद्र क्यों नहीं? ये बोझ राज्यों पर क्यों, जो कोरोना महामारी से लड़ाई में अग्रिम मोर्चे पर हैं और जिनके पास संसाधनों की लगातार कमी हो रही है? क्या केंद्र इन सवालों के जवाब देगा?

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