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Wednesday, May 12, 2021
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कोरोना और कुंभ-स्नान

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वेद प्रताप वैदिकhttp://www.nayaindia.com
हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

यह प्रसन्नता की बात है कि हरिद्वार में चल रहे कुंभ-मेले को स्थगित किया जा रहा है। यहाँ पहले शाही स्नान पर 35 लाख लोग जुटे थे। 27 अप्रैल तक चलने वाले इस कुंभ में अभी लाखों लोग और भी जुटते याने हजारों-लाखों लोग कोरोना के नए मरीज बनते। यदि यह कुंभ चलता रहता तो कोरोना भारत के गांव-गांव में फैल जाता। गरीब लोगों का मरण हो जाता।

दिल्ली, मुंबई, इंदौर और पुणें जैसे शहरों में रोगियों को पलंग, दवाइयाँ और ऑक्सीजन के बंबे नहीं मिल पा रहे हैं तो इन करोड़ों गंगाप्रेमी ग्रामीणों का हाल क्या होता ? भारत भयंकर संकट में फंस जाता। इस नाजुक मौके पर इन अखाड़ों के मुखियाओं ने बहुत साहस दिखाया है। वे पाखंड में नहीं फंसे। कई मूर्ख नेता यह कहते हुए भी पाए गए कि कोरोना हो या कोरोना का बाप हो, गंगा मैया में डुबकी लगाओ कि वह भाग खड़ा होगा।इन अंधविश्वासियों से कोई पूछे कि गंगा में डुबकी लगाने से यदि रोग भागते हों या मोक्ष मिलता हो तो उसमें दिन-रात विहार करनेवाले सारे मगरमच्छ भी क्यों नहीं निर्वाण को प्राप्त होंगे ? गंगाजल यदि मरते हुए आदमी को दिया जाए तो उसे स्वर्ग मिलेगा, ऐसा अंधविश्वास ही हरिद्वार में लाखों लोगों को इकट्ठा कर देता है। कोरोना ने इस अंधविश्वास को ध्वस्त कर दिया है।

सैकड़ों साधु-संत कोरोनाग्रस्त हो गए हैं। लाखों गंगाभक्तों की जांच में राज्य-सरकारों को जुटना पड़ गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि कुंभ-जैसे मेले निरर्थक हैं। उनका होना काफी अच्छा और लाभदायक है। वे मानव की पर्यटनवृति, वन-विहार और राष्ट्रीय एकात्म को सबल बनाते हैं। हमारे साधु-संतों ने इस मेले के शेष स्नानों को मोटे तौर पर स्थगित करके सभी धर्मावलंबियों को यह संदेश दे दिया है कि हर धर्म, हर अनुष्ठान और हर कर्मकांड देश और काल की उपेक्षा नहीं कर सकता।

यदि गंगा-स्नान स्थगित हो सकता है तो मस्जिदों में नमाज़ के लिए और गिरजाघरों में प्रार्थना के लिए भीड़ लगाने की भी कोई जरुरत नहीं है। रमजान के इन दिनों में इफ्तार की पार्टियां बिल्कुल भी जरुरी नहीं हैं। मुसलमान अपना ईद का त्यौहार भी घरों में ही मनाएं तो बेहतर होगा।खुदा को आप यदि सर्वव्यापक मानते हैं तो वह आपके घर में भी उतना ही होगा, जितना मस्जिद में होगा। संकट की इस घड़ी में जनता को सरकार से आगे निकलकर दिखाना चाहिए। सरकार तो कोरोना की लड़ाई में जो कुछ कर सकती है, कर ही रही है लेकिन जब तक जनता सरकार से भी ज्यादा जागरुकता नहीं दिखाएगी, इस पर विजय पाना मुश्किल है।

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