भारत अब कहां, क्या?

लॉकडाउन के साठ दिन-1: भय, भूख और आईसीयू! ये तीन शब्द मई 2020 में भारत के पर्याय हैं। और आने वाले कई महीनों व शायद 2021, 2022, 2023, में भी यहीं भारत के पर्याय शब्द रहेंगे। उस नाते साठ दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वह काम किया है, जिसकी आजाद भारत के इतिहास में कभी कल्पना नहीं हुई। उन्होंने घर-घर, हर दिल में भय बैठा दिया। ऐसा कि भूखा रहना मंजूर लेकिन मरेंगे अपने घर में। नतीजतन भारत की सरकारें भूखीहुई, कंगली हैं तो विश्व बैंक सहित कई एजेंसियों, जानकारों ने भविष्यवाणी की है कि भूखमरी संभव है। तीसरा शब्द आईसीयू है जो आर्थिकी के लिए है। यों आईसीयू में हमारा, हमारी आर्थिकी का भर्ती होना नोटबंदी के बाद का लगातार अनुभव है। लेकिन पिछले साठ दिनों में आर्थिकी आईसीयू में भी वेंटिलेशन की उस क्रिटिकल अवस्था में पहुंची हुई है, जिसमें पता नहीं उसके फेफड़े कितने महीने, कितने साल तड़पें। सोचा ही नहीं जा सकता कि आर्थिकी नॉर्मल भी हो सकेगी।

सो, साठ दिनों का लब्बोलुआब भारत का ‘नॉर्मल’ नहीं होना है। अब सोचा जाए इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, तमाम मुख्यमंत्री, तमाम सरकारों की मौजूदा मनोदशा पर। भारत जब ‘नॉर्मल’ था, देश में सिर्फ पांच सौ कोरोना मरीज थे तब प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे भारत को ‘कर्फ्यू’ में जकड़ा जबकि अब संक्रमितों की संख्या लाख के पार है लेकिन नरेंद्र मोदी और सरकारें सब ‘नॉर्मल’ बनाने के लिए जनता को समझा रहे हैं कि वायरस के साथ जीना सीखो। कैसे एकदम उलटा ऐसे सोचना? एक ही वजह है और वह है साठ दिनों में भारत का दिवालिया, भारत की सरकारों का भूखा होना है! प्रधानमंत्री मोदी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और तमाम मंत्री देश से कह रहे हैं कि वे उद्योगों, कारोबारियों, मजदूरों को पैकेज व पैसा दे रहे हैं लेकिन क्या दुनिया ने, देश के लोगों ने यह नहीं सोचा होगा कि जो सरकार शराब बेच कर, पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़ा कर पैसा ऐंठ रही है और यहीं नहीं अपनी रोटी-चटनी के लिए बेबस मजूदरों का भी रेल भाड़ा छोड़ने को तैयार नहीं है ऐसीकंगली सरकार दूसरों को क्या पैसा बांटेगी!

तभी इस हकीकत को गांठ बांध लें कि साठ दिन के लॉकडाउन ने सबसे ज्यादा भूखा, कंगला, दिवालिया सरकारों को बनाया है। गरीब, मजदूर से ज्यादा सरकारें भूखी हैं। सोचें, यदि तीन हजार करोड़ रुपए की जगह दिल्ली सरकार को तीन सौ करोड़ रुपए महीना रेवेन्यू में मिले तो उसका ज्यादा दिवाला निकला, वह ज्यादा भूखी या दिहाड़ी का मजदूर ज्यादा भूखा? मजदूर तो भूखा रहने का आदी रहा है लेकिन बतौर मुख्यमंत्री केजरीवाल उनकी सरकार भूखी, नंगी हो गई और मोदी सरकार भी उस जैसी भूखी-नंगी बनी है तो ये सरकारें वायरस से लड़ेंगी या अपनी भूख के लिए जनता को वायरस के कड़ाव में उबलने को झोंकेंगी?

इसलिए साठ दिन में प्रगट सत्य है कि भारत राष्ट्र-राज्य और उसकी सरकारों की आर्थिक सेहत कितनी खोखली थी। वह पहले से ही आईसीयू में थी तभी भारत सरकार को वैश्विक महामारी से लड़ाई छोड़ कर आर्थिकी को ऑक्सीजन दिलाने के लिए जनता को वायरस के साथ जीने के लिए कहना पड़ रहा है। भारत की व्यवस्था के पास महामारी से लड़ने का न तो इम्यून सिस्टम है और न मेडिकल सिस्टम। तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस से लड़ाई भगवान के भरोसे छोड़ दी है। उन्होंने लॉकडाउन 4.0 में चतुराई से प्रदेश सरकारों पर जिम्मेदारी शिफ्ट कर दी है। अरविंद केजरीवाल या तमाम मुख्यमंत्री मुगालते में हैं कि केंद्र सरकार के साथ, मोदी के सुर में सुर मिलाते हुए वायरस के साथ जीवन जीने का फार्मूला जनता में हिट होगा और उनकी वाह-वाह बनेगी लेकिन कुछ महीनों बाद जब हर राज्य लाखों-लाख संक्रमित मरीज लिए हुए होगा तो उसका ठीकरा इन्हीं प्रदेश सरकारों पर जनता द्वारा फूटना है। तब मोदी सरकार कन्नी काटे दूर खड़ी मिलेगी।

लॉकडाउन 4.0 भारत की सौ जूते, सौ प्याज खाने वाली कोरोना लड़ाई का वह टर्निंग प्वाइंट है, जिसमें वायरस से लड़ने का काम भूखे-नंगे, साधनविहीन राज्यों की ओर शिफ्ट हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरा फोकस वेंटिलेटर पर लेटी आर्थिकी की चिंता में मौत नहीं मौका, आत्मनिर्भर-स्वदेशी, विदेशी निवेश की जुमलेबाजी से ऑक्सीजन पंप करने पर बनाया है। यह स्वाभाविक है। 24 मार्च को नरेंद्र मोदी ने लॉकडाउन के अपने इलहाम में यह कल्पना नहीं की थी कि महीने भर में उनकी आर्थिकी वेंटिलेटर पर पहुंच जाएगी। दुनिया की रेटिंग एजेंसियां घंटियां बजाने लगेंगी कि हम भारत को दुनिया का दिवालिया देश घोषित करने वाले हैं। सो, लॉकडाउन से आर्थिकी की पोल खुली है। दुनिया ने उसे बरबाद, खत्म हुआ जान लिया है। और यह नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मुकेश अंबानी, गौतम अदानी आदि उन तमाम गुजरातियों की जान को सुखा देने वाली बात है, जो शेयर बाजार में सट्टे के उतार-चढ़ाव, फीलगुड हेडलाइन और मौत में भी धंधे के अवसर में आर्थिकी को तौलते हैं।

याद करें साठ दिन की हेडलाइंस पर। भारत की रीति-नीति, नियंताओं की सोच और कोविड-19 वायरस से लड़ाई में घटनाओं का, हालातों का भला साठ दिनों में क्या मेडिकल बुलेटिन हुआ? सर्वप्रथम पैनिक था। घर की लक्ष्मण रेखा में बंद हो कर घर के बाहर दिवाल पर यह लिखना-लिखवाना कि मौत इधर नहीं आना। मतलब महामारी, मौत व कर्फ्यू का खौफ। वायरस पर विजय पा कर विश्वविजयी बनने का संकल्प। उस संकल्प को ध्वस्त किया भय की सुनामी ने। वायरस से मौत (जिसे लक्ष्मण रेखा, कर्फ्यू जैसी जुमलेबाजी से हवा मिली) की चिंता में लाखों-करोड़ों दिलों में भय ऐसा बना कि गरीब, दिहाड़ी मजदूर, कामगार, नौकरीपेशा छोटे-छोटे परिवारों ने दिमाग में बात बैठा ली कि घर जा कर रहना है। अपने घर में रह कर महामारी से लड़ेंगे न कि परायी, बेगानी जगह। नतीजतन दिल्ली सल्तनत के बादशाह, वजीर, कारिंदों से लेकर प्रदेशों के सूबेदार सभी के तोते यह सोचते हुए उड़ गए कि तब काम कौन करेगा? फैक्टरियां कैसे चलेंगी? मांग कैसे बनेगी, सप्लाई कैसे होगी, हमारी कमाई का क्या होगा, हमारा खर्चा कहां से आएगा?

उस नाते भारत दुनिया का अकेला देश है, जहां साठ दिन के लॉकडाउन का मेडिकल बुलेटिन दरअसल मेडिकल बुलेटिन नहीं था। उसमें टेस्टिंग-ट्रेसिंग-रिस्पोंस और इलाज का ब्योरा कम था और उसकी जगह नेता के भाषण, लोगों के रेले, पैदल यात्रियों के सैलाब, कभी जूते खाने, कभी प्याज खाने, कभी धर्मादा और कभी लाठीचार्ज, दुर्घटना, हादसों की त्रासदी अधिक थी। फिलहाल बुलेटिन में हर दिन फर्जी खबरों से हवा बनाने की कोशिश है कि बुरा वक्त गुजर गया, सबकुछ ‘नॉर्मल’!देखो ट्रैफिक, देखो खुली दुकानें! ताकि वेंटिलेटर पर जिंदा आर्थिकी को ऑक्सीजन का जुगाड़ हो। ऐसा कुछ हो, जिससे आर्थिकी में खून बनना शुरू हो, आर्थिकी को होश आना शुरू हो। यह नहीं हुआ तो वैश्विक रेटिंग एजेंसियां भारत को कहीं कबाड़, जंक,, बरबाद न करार दें। तभी प्रधानमंत्री मोदी मन ही मन पछता रहे होंगे कि उन्होंने लॉकडाउन से पहले वह सब क्यों नहीं सोचा, जो साठ दिनों में भारत की रियलिटी से प्रकट हुआ है?

और अपना मानना है कि जैसे साठ दिन पहले बिना आगा-पीछा सोचे धुल में लॉकडाउन का लठ्ठ चला वैसे ही आर्थिकी को ‘नार्मल’ दिखलाने के लिए बिना आगा-पीछा सोचे धूल में नया लठ्ठ है। इससे भारत की आर्थिकी और दिवालियां, मंहगी व बरबाद होगी। मान ले दिल्ली में रिक्शावाले रिक्शा चलाएं, कारोबारी फैक्ट्री शुरू करें या हवाई यात्रा शुरू हो तो पहली बात फुल केपेसिटी या कि क्षमता के अनुसार कोई उत्पादन व सेवा शुरू नही होगी? वायरस क्योंकि जिंदा है तो पहली बात रिक्शावाला एक ही यात्री बैठा सकता है, बस-हवाई जहाज तीस-पचास प्रतिशत ही पैसेंजर बैठा सकेगें तब न तो एयरलाइंस को धंधा पोसाना है और न यात्री सुरक्षित भाव सस्ती यात्रा कर सकता है। रिक्शा वाला, बस-एयरलाइंस वाला हो या कपड़ा बनाने वाली फैक्ट्री का मालिक या कनाट प्लैस, चांदनी चौक का दुकानदार, सभी ग्राहक के लिए तरसेगे और महिने, दो-महिने लाइट-किराये-कर्मचारी-मजदूर का खर्चा वहन करके अपनी जमा पूंजी को और बरबाद करेंगे। क्षमता का जाया होना, अनुत्पादकता बढेगी। एयरलाइंस कंपनी भले महंगा पेट्रोल खरीद करके सरकार को कमाईकरा दे लेकिन खुद और कंगली होगी। यात्रा महंगी होगी, कंपनी का आपरेशन महंगा होगा। मतलब मांग-सप्लाई की पूरी चैन ज्यादा लागत, मंहगाई व बरबादी लिए हुए होगी! फिर इस सबके साथ सबकी जान चौबीसों घंटे दांव पर लगी रहेगी, क्योंकि वायरस काबू में नहीं है। उलटे वह रिक्शा, बस, हवाई जहाज से और तेज रफ्तार ज्यादा फैलेगा? मतलब ‘नार्मल’ दिखलाने की कोशिश से आर्थिकी वेंटिलेटर पर और फडफडाएगी। (जारी)

5 thoughts on “भारत अब कहां, क्या?

  1. अगर सरकार की इनकम दूनी भी हो जाए तो भी सरकारें इसी तरह भूखी नंगी रहेंगी. सारा पैसा लोक लीभावन कामो मे बर्बाद जो होता है.

  2. भारत में सरकारों का कोई जवाबदेही नहीं है भारत में संसद प्रधानमंत्री की कटपुतली हैं भारत में पूरी तरह अमेरिका की तरह पूंजीवाद नहीं है वहां की पूंजीवाद सरकार बेरोजगारी भत्ता देती हैं । इन मजदूरों के अकाउंट में सीधे पैसे दे देते तो ये पलायन नहीं होता ।इसका खर्चा भारत के जीडीपी से 10 % कम ही आता ।

  3. Kon desh ya uske nagrik chahata hai ki hamesha rog grast ya bimar phate hal rahe or karj lekar ghee piye bina dimag,samjh bhujh bala or hinn bhavana se grasit vyakti hi kar sakta hai vyapak paripekchh mai soche.Har desh aapne sidhdhhanto or vasulo se jana or pahchana jata hai.Bharat ki kamjori yahi hai,naitik mulyo ko bachane ki jarurat hai .

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