फौरी राहत के बावजूद

केंद्रीय माध्यमिक परीक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई ने दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं को अब ना कराने का फैसला किया है। दसवीं की परीक्षा पूरी तरह रद्द कर दी गई है। बारहवीं की परीक्षा कोरोना महामारी की हालत सुधरने के बाद कराई जाएगी। मगर सीबीएसई ने ये फैसला तब लिया, जब मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। बच्चों के अभिभावक वहां इस मसले को ले गए। वरना, अगर सीबीएसई की चलती, तो बच्चों की सेहत का रिस्क उठाते हुए भी वह एक से 15 जुलाई के बीच इम्तहान कराती। इसके पहले कई राज्यों के परीक्षा बोर्ड इम्तहान ना कराने और छात्रों को प्रोमोट कर देने का फैसला ले चुके हैं। बेहतर होता कि सीबीएसई उनसे ही सीख ले लेती। उसके एक गलत फैसले के कारण लाखों छात्र लंबे समय तक ऊहापोह में रहे। बेशक, ये बड़ी मुसीबत की घड़ी है। छात्रों की पढ़ाई-लिखाई और उनके भविष्य पर अंदेशे मंडरा रहे हैं। इसके बावजूद जैसाकि कहा जाता है जान है तो जहान है। यानी छात्रों की सेहत को खतरे में डालकर पढ़ाई-लिखाई या इम्तहान के बारे में सोचना बेहद असंवेदनशील होगा। इस बीच ये खबर आई है कि आईआईटी-मुंबई ने कोविड-19 महामारी के कारण एक साल के लिए सभी फेस-टू-फेस लेक्चर रद्द कर दिए हैं। वहां अगले सिमेस्टर की पूरी पढ़ाई ऑनलाइन मोड में होगी।

आईआईटी- मुंबई ने कहा है कि छात्रों की सेहत से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इस संस्थान ने ये अहम बात कही है कि कोरोना महामारी ने उसे इस पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया इस हाल में छात्रों को शिक्षा कैसे दी जाए, ताकि अगला एकेडेमिक ईयर भी सही समय पर- बिना किसी देर के- शुरू हो सके। इसके लिए अब ऑनलाइन क्लासों की योजना विस्तार से बनाई जा रही है। यह एक महत्त्वपूर्ण पहल है। इसका अनुकरण अब हायर एजुकेशन के बहुत-से संस्थान कर सकते हैं। बहुत से स्कूलों में तो ऑनलाइन पढ़ाई पहले से चल रही है। मगर खास स्कूली शिक्षा के मामले में अपने देश में एक बड़ी समस्या है- ये है डिजिटल डिवाइड। अपने देश में तेज रफ्तार इंटरनेट, स्मार्ट फोन और लैपटॉप की उपलब्धता पूरी आबादी की तुलना में बहुत कम है। इसलिए ये बड़ा सवाल है कि इस सुविधा से वंचित बच्चों का क्या होगा? सरकार और समाज दोनों को इस बात की चिंता करनी चाहिए। वरना, पहले से ही घोर गैर-बराबरी में जी रहे इस देश में ये समस्या और गंभीर हो जाएगी, जिसके आर्थिक और सामाजिक नतीजे बहुत खराब हो सकते हैं।

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