बचपन था बहुत छोटा!

सिर्फ दस-बारह साल का। छप्पन में जन्म, 62 में पिता के चुनाव लड़ने और भारत-पाकिस्तान की लड़ाई की छोटी-क्षणिक याद के बाद बचपन अपना खत्म! अचानक विपदा आ पड़ी। दूदूवाला कंपनी के सेठ हरिराम नाथानी की कंपनी को न जाने क्या हुआ, कैसे दिवालिया हुई कि पिता को आघात और वे मानसिक संतुलन खो बैठे और बीमार! मानों पहाड़ टूट पड़ा। सबकुछ जिया (मां) और मामाओं पर निर्भर हुआ। पिता को जयपुर अस्पताल में भर्ती कराया गया। वे ठीक हो कर लौटे तब तक घर का इतना कुछ छिन्न-भिन्न हो चुका था कि न पिता फिर नॉर्मल रहे और न बचपन-परिवार में पहली जैसी निश्चितता, स्थिरता लौटी। गनीमत थी, जो पिताजी ने इलाज से लौट कर सुभाषनगर का प्लॉट बेच घर में कमरे बनवाए। नतीजतन जिया को किरायेदारों का सहारा मिला और घर तंगी के साथ चलने लगा और मेरा बचपन आठवीं-नौवीं में ही दुनियादारी समझने लगा।

बचपन में यदि उतार-चढ़ाव आता है तो उसका गहरा असर होता है। पिता बीमार हुए नहीं और मेरे पांव की चकरीघूमने लगी। अकेले इधर-उधर जाने लगा। नाते-रिश्तेदारों को बदलते देखा, मौके का फायदा उठाते देखा। अहसान जताते देखा। मां को रोते देखा, छीजते देखा और पिता को भटकते व बार-बार बीमार होते देखा। पिता ने अपने ही हाथों सबकुछ खत्म किया, कागज फाड़ फेंके, चीजें दे दीं या बेच डाली। मेरी बाबाओं, धर्मगुरूओं से एलर्जी की एक वजह बचपन के एक दाता महाराज और उनके चेलों से बूझा अनुभव है। पता नहीं कैसे पिताजी दाता महाराज के अनुयायी हुए। इस जमात के कई चेहरों का घर आना जाना था। इनके लिए मैंने पिता को बहुत कुछ करते देखा। उससे जमात में उनका रूतबा था लेकिन जब वे बीमार हुए, विपदा आई तो कोई मदद के लिए नहीं आया। उलटे मां से यह जानने को मिला कि उनके फलां अपने घर में रखी शेर की खाल उठा ले गए। लौटाई नहीं तो कोई फलां सामान ले गया।

पिता के मानसिक संतुलन गंवा बैठने के बाद कुछ महीने यह स्थिति भी थी कि मां के साथ तीनों भाई-बहन बीगोद में मुरलीधरजी के घर रहे। मेरा स्कूली दाखिला ननिहाल में बड़ीसादड़ी की स्कूल में हुआ।वहां मेरा मन उचटा तो पढ़ने के लिए उदयपुर गया। प्रतापनगर की स्कूल में दाखिला लिया। ताऊजी ने तैश दिखाया तो गुस्से में उसी शाम बिना टिकट चेतक एक्सप्रेस में बैठ जयपुर पहुंचा और पिताजी का इलाज करवा रहे मां-मामा का पता खोजते-खोजते सांगानेरी गेट की धर्मशाला में जा पहुंचा। उफ! बचपन में अकेले का वह सफर!

तो मौज-मस्ती, सुख, रस, लगाव, स्वाद, स्वभाव के बचपने का अपना जोड़ कुल जमा दस-ग्यारह साल का है। छप्पन में जन्म से 65-66 तक। फिर तो वक्त से दीन-दुनिया की चेतना बनने लगी। पिता की बीमारी और इलाज के बाद प्रताप नगर की सेकेंडरी-हायर सेकेंडरी की 1970 व 1972 में परीक्षा से एमएलवी कॉलेज में 1975 में ग्रेजुएशन तक का लड़कपन तंगी में गुजरा, मगर हां, सबकुछ फिर भी हुआ।

मैं अपने बेटे-बेटी, कुनबे के समवर्ती भाई-बहनों और उनके बच्चे-बच्चियों व बचपन की याद में पैठे नगर सेठों के कुनबों पर विचार करता हूं तो दो निष्कर्ष गहरे हैं। एक, वंशावलियों में, कुनबे, परिवार में उतार-चढ़ाव, लक्ष्मीजी की चंचलता का आना-जाना सहज वृत्ति है। दूसरा, भारत में 1947 के बाद की पीढ़ी ने ज्यादा संघर्ष किया। उन्होंने संघर्ष से अपने को गढ़ा और इससे बाद वाली पीढ़ी सुख भोगती हुई बनी। तीसरा, जो संघर्ष करता है वहीं बनाता है, उसी से निर्माण है। बाद वाली पीढ़ी उसे भोगते हुए बचा ले तो दादा-दादी याकि बुजुर्ग पीढ़ी का उत्तरार्ध हुआ धन्य। यहीं लक्ष्मीजी की चंचलता का चक्र है।

मैं भटक रहा हूं। पते की बात है कि जिंदगी में सुख-दुख के पड़ाव सभी के होते हैं। अपना मानना है कि 1947 में आजादी के बाद की पीढ़ी ने संघर्ष, कष्ट से जीवन अधिक जीया है। बतौर उदाहरण पंडित दामोदर शास्त्री का मेरा कुनबा है। उन्होंने बहुत मुश्किलों से सभी बेटों को पढ़ाया। लेकिन सब क्योंकि पढ़ते ही खूंटे से अलग, दूर, संयुक्त परिवार से बाहर निकले, अपने-अपने बूते थे तो सरकारी अध्यापक वाले भाई को छोड़ बाकी तीनों का जीवन संघर्षमय बना। वह आजादी पूर्व जन्मी पीढ़ी थे। इनकी संतानें याकि मेरी पीढ़ी के लिए रोटी के लाले नहीं थे लेकिन मध्यवर्गीय सपनों की नौकरी, प्रोफेशन, व्यवसाय में जगह बनाने के सभी के संघर्ष थे। उस तुलना में हम लोगों की संतानों को बना-बनाया, पका-पकाया मिला है, मिल रहा है। लेकिन फिर मुझे बचपन के नगर सेठ पूसालाल, दूदूवाला, डालडा मिल वाले मानसिंहका परिवार जैसे कुनबे याद आते हैं तो लगता है जीवन चरित में न तो ‘बनना’ मतलब वाला है, न पैसा मतलब का है और न ठसका मतलब का है, असली मतलबअपनी धुन में स्वांत सुखाय जीने का है। अपने आपमें जीने का है। जीते हुए चैन से वक्त गुजरते हुए साठ पार हो जाने काहै। मतलब जिंदगी वह अच्छी जो जीवन के उत्तरार्ध में रहीम के इस कहे को लिए हुए हो कि- चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह।

जो हो, अपना बचपन छोटा रहा लेकिन वह वक्त और उसके बाद के दस साल दीन-दुनिया व लड़कपन के मिक्स में जैसे गुजरे उसने एक फितरत, ऐसे चस्के बनाए, जिससे समझ व गति बनी।नतीजतन विराम नहीं आया। रूकना नहीं हुआ। दरअसल मैंने कच्चे बचपन में पिता की चेतना से घर में अखबार के साथ रेलवे स्टॉल के शुक्लाजी के यहां से चंदामामा और पराग को पाया और उनसे किस्से-कहानी पढ़ने का चस्का बना। यदि मैं आज सोचूं कि मेरे पिता ने मेरे लिए क्या किया तो मैं दो बातों के लिए उन्हें शत-शत प्रणाम करूंगा। एक, उन्होंने किस्से-कहानी याकि पढ़ने का रस, चस्का बनवाया और दूसरे नुक्कड़ की हरी ओम दूध भंडार से रबड़ी-दूध-जलेबी-मिश्री मावा का स्वाद बनवाया। एक से जीभ के स्वाद की संतुष्टि और दूसरे से दिमाग में पैदा हुआ कौतुक का रसायन!

ये दोनों बातें मेरे ताउम्र के एकाउंट हैं। मै आज भी सात्विक शाकाहारी-मीठे का पंडित स्वाद लिए हुए हूं, कितनी ही डायबिटीज हो मीठा खाता हूं तो रेलवे स्टेशन के शुक्लाजी के स्टॉल में पत्र-पत्रिकाओं के बिल भुगतान का तब भी तकाजा बनवाए रखता तो वह जेएनयू में भी हॉकर के तकाजे के साथ निरंतर रहा और आज भी यह चिंता रहती है कि इकोनॉमिस्ट, फॉरेन अफेयर्स का सब्स्क्रिप्शन जमा होना है या श्रुति न्यूयॉर्क टाइम्स का चंदा क्यों नहीं जमा करा रही! बचपन से 65 साल की उम्र के इस अनवरत क्रम में जाहिर है दिमाग ताउम्र वह सुख-संतोष पाता गया, जिसका चस्का बचपन में बना था।

अपना मानना है कि यदि कोई फुरसत से बचपन के मजे के साथ जिंदगी के उत्तरार्ध के मौजूदा वक्त में दिल-दिमाग, स्वाद और दिलचस्पी के तार तलाशें तो समझ आएगा कि ऐसी-ऐसी छोटी बातों में, बालपन के रंग में आगे जीवन के कैसे रंग बनते हैं। फिर किसी का बचपन भले छोटा ही क्यों न रहा हो। (जारी)

2 thoughts on “बचपन था बहुत छोटा!

  1. I am grateful sir! Thank you! I am fond of memoirs. But here getting the unique, subjective and abstract thought process and intellection of Mr. Hari Shankar Vyas along with his life.

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