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गांवों का क्या होगा?

अगर स्थिति संभल गई, तो उसके बाद ये सवाल आएगा कि अब आगे क्या होगा। महामारी का खेती और दूसरी आर्थिक गतिविधियों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। लॉकडाउन के कारण सब्जी, फलों और डेयरी उत्पादों की बिक्री बुरी तरह प्रभावित हुई है। व्यापारी गांवों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

अब ये तो साफ है कि कोविड संक्रमण की दूसरी लहर गांवों को भी अपनी चपेट में ले चुकी है। वहां हो रही मौतें सरकारी आंकड़ों में नहीं, बल्कि गंगा और दूसरी नदियों में तैरती लाशों और असामान्य रूप से बढ़ी अंत्येष्टि की संख्याओं में जाहिर हो रही है। कमजोर मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कीमत गांवों के लोग चुका रहे हैं। बहरहाल, अगर स्थिति संभल गई, तो उसके बाद ये सवाल आएगा कि अब आगे क्या होगा। महामारी का खेती और दूसरी आर्थिक गतिविधियों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। लॉकडाउन के कारण सब्जी, फलों और डेयरी उत्पादों की बिक्री बुरी तरह प्रभावित हुई है। व्यापारी गांवों तक नहीं पहुंच पा रहे। उधर शादी-विवाह, धार्मिक और सामाजिक आयोजनों पर रोक लगी हुई है। होटल, रेस्तरां और मिठाई या खानपान की अन्य दुकानें काफी दिनों से बंद हैं। जाहिर है, दूध उत्पादों, सब्जी और फलों की मांग काफी घट गई है।

यह तो जग-जाहिर समस्या है कि स्टोरेज की व्यवस्था नहीं होने के कारण इन उत्पादों को किसान अपने पास सुरक्षित नहीं रख पाते। जबकि उनकी रोजी-रोटी तो रोजाना इनसे होने वाली आमदनी पर ही निर्भर है। तो उन्हें औने-पौने भाव में अपनी पैदावार बेचनी पड़ रही है या फिर उन्हें फेंकना पड़ रहा है। इस कारण कोरोना की दूसरी लहर ने किसानों, कृषि निर्भर समुदायों और पशुपालकों की हालत खास्ता कर दी है। उनका पूरा आर्थिक चक्र गड़बड़ा गया है। मोटे अनाज यथा गेहूं-चावल, चना उपजाने वाले किसान भी कम बेहाल नहीं हैं। बिहार की एक खबर में बताया गया है कि लॉकडाउन के पहले गांव आकर व्यापारी साढ़े सोलह-सत्रह सौ रुपये प्रति क्विंटल गेहूं खरीद रहे थे। लेकिन लॉकडाउन लगने के बाद से वे 1500 रुपये प्रति क्विंटल भी देने को तैयार नहीं हैं। जाहिर है खेती की लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। ये साफ है कि कम आमदनी होगी तो किसानों की आर्थिक सेहत बिगड़ेगी। लॉकडाउन के कारण ग्रामीण इलाकों में सड़क, आवास, सिंचाई और निर्माण संबंधी परियोजनाओं का काम रुका हुआ है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अब खेती का हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत है। बाकी हिस्सा गैर कृषि कार्यों का है। तो वे काम भी ठहरे हुए हैँ। तो आमदनी का सारा चक्र टूट गया है। सवाल है कि ये अर्थव्यवस्था कैसे संभलेगी? क्या सरकार ने इस समस्या के बारे में सोचा भी है?

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