corona vaccination Narendra modi सौ करोड़ डोज विफलताओं का जवाब नहीं!
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सौ करोड़ डोज विफलताओं का जवाब नहीं!

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कोरोना वायरस को रोकने के लिए लगाई जा रही वैक्सीन के सौ करोड़ डोज पूरे होना, निश्चित रूप से कोरोना के खिलाफ लड़ाई में एक अहम मुकाम है। भारत के लिए निश्चित रूप से यह एक बड़ी उपलब्धि है, जिसका प्रचार होना स्वाभाविक है। सरकार या देश की उपलब्धि के किसी भी प्रचार का एक मकसद हमेशा सरकार का ढिंढोरा पीटना होता है लेकिन वैक्सीनेशन के सौ करोड़ डोज के आंकड़े के प्रचार का एक मकसद यह भी होना चाहिए कि इससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को प्रेरित किया जाए कि वे जल्दी से जल्दी वैक्सीन लगवाएं। इस प्रचार का मकसद यह बताना भी होना चाहिए कि वैक्सीनेशन आसानी से हो रहा है, इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं है और यह कोरोना के खिलाफ कारगर है। लेकिन इसे सरकार की तमाम आलोचनाओं का जवाब मानना उचित नहीं है। दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री से लेकर सरकार के हर मंत्री और सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता इसे ऐसे पेश कर रहे हैं, जैसे सौ करोड़ डोज पूरे होने से कोरोना संक्रमण के प्रबंधन में विफल रही सरकार के सारे पाप धुल गए। corona vaccination Narendra modi

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैक्सीनेशन के सौ करोड़ डोज पूरे होने के बाद जब राष्ट्र को संबोधित किया तो उन्होंने कहा कि लोग कहते थे, वैक्सीन कहां से आएगी, कैसे लगेगी, भारत तो इतनी वैक्सीन लगवा ही नहीं सकता है, उन सब आलोचनाओं का जवाब इस आंकड़े से मिल गया। उन्होंने और भी कई बातें कहीं जो झूठ नहीं तो अर्धसत्य जरूर है और तुलनात्मक रूप से अवैज्ञानिक भी है। लेकिन उनकी चर्चा की जरूरत नहीं है क्योंकि उसमें कुछ भी नया नहीं है। हालांकि उनका यह कहना ठीक नहीं है कि सौ करोड़ डोज पूरे होने से सारी आलोचनाओं का जवाब मिल गया। वैक्सीन की सौ करोड़ डोज लगने को बड़ी उपलब्धि मानते हुए भी यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि अगर सरकार ने वैक्सीनेशन की नीति में गलती नहीं की होती तो यह लक्ष्य काफी पहले हासिल हो जाता।

भारत में वैक्सीनेशन अभियान 16 जनवरी को शुरू हुआ था और मार्च तक इसकी रफ्तार काफी धीमी रही थी। पहले चरण में तीन करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों को टीका लगना था। दूसरे चरण में फ्रंटलाइन वर्कर्स को टीका लगाया जाना था। तीसरे चरण में 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों और गंभीर रूप से बीमार 45 साल से ऊपर के लोगों को टीका लगना था। ऐसे लोगों की संख्या 27 करोड़ थी। यानी सरकार को 30 करोड़ लोगों को प्राथमिकता के आधार पर टीका लगाना था। परंतु सरकार इस लक्ष्य के आसपास भी नहीं पहुंच पाई और उससे पहले ही टीके का निर्यात शुरू हो गया और वैक्सीन कूटनीति के तहत प्रधानमंत्री ने टीके दान करने भी शुरू कर दिए। जब इस पर सवाल उठे और राज्यों ने वैक्सीन की कमी का सवाल उठाया तो केंद्र सरकार ने वैक्सीनेशन की नीति बदल दी और राज्यों से कह दिया कि वे खुद वैक्सीन खरीद कर 18 साल से ऊपर के लोगों को लगवाएं।

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केंद्र को पता था कि किसी राज्य को वैक्सीन नहीं मिलने वाली है क्योंकि वैक्सीन का उत्पादन उतना नहीं हो रहा है, जितनी जरूरत है और दूसरे वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां इस मुकाम पर राज्यों के साथ नए करार नहीं करेंगी। इतना ही नहीं केंद्र ने अप्रैल में पूरी वयस्क आबादी को वैक्सीन लगाने की नीति का ऐलान कर दिया। सोचें, वैक्सीन नहीं थी, राज्यों को अचानक कहा गया था कि वे वैक्सीन खरीदें और उसके साथ ही एक झटके में एक सौ करोड़ आबादी को वैक्सीन लगाने का पात्र बना दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ है कि मई और जून के पहले तीन तीन हफ्ते तक वैक्सीन की गाड़ी पटरी से उतर गई। जब वैक्सीनेशन लगभग ठप्प हो गया और कोरोना की दूसरी लहर से देश त्राहिमाम करने लगा तब केंद्र ने फिर वैक्सीनेशन नीति बदली और खुद वैक्सीन खरीद कर राज्यों को देने का ऐलान किया। जाहिर है सरकार के एक फैसले ने वैक्सीनेशन अभियान को कई महीने पीछे कर दिया। क्या केंद्र ने इसकी जिम्मेदारी ली है?

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दूसरी खास बात यह है कि क्या सौ करोड़ डोज पूरा होने के बाद सवाल, जिन्हें प्रधानमंत्री आलोचना कह रहे हैं, खत्म हो गए हैं? सवाल तो अब भी हैं। क्योंकि कोरोना के खिलाफ लड़ाई अब भी चल रही है और अब भी देश की पूरी वयस्क आबादी को वैक्सीन लगाने के लिए सौ करोड़ और डोज लगाने की जरूरत है। इसके अलावा दो से 18 साल के बच्चों और किशोरों को भी वैक्सीन लगाई जानी है, जिनके लिए 70 करोड़ अतिरिक्त डोज की जरूरत होगी। वह कब से लगनी शुरू होगी और कब तक लगेगी? साथ ही जिनको बिल्कुल शुरुआत में वैक्सीन की डोज लगी है और जिनके शरीर में एंटीबॉडी खत्म हो रही है या जो संवेदनशील आबादी है उसको वैक्सीन की बूस्टर डोज देने की जरूरत है वह कब से लगेगी? सरकार ने साल के अंत तक पूरी आबादी को वैक्सीन लगा देने का लक्ष्य रखा था, क्या इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा? सरकार किस तरह से बचे हुए 70 से कम दिनों में सौ करोड़ डोज और लगा देगी?

सवाल अब भी हैं। इसलिए सरकार को सवालों को आलोचना नहीं समझना चाहिए और वैक्सीनेशन का कोई भी लक्ष्य हासिल करने को आलोचनाओं का जवाब नहीं बताना चाहिए। आखिर वैक्सीनेशन का अभियान सिर्फ केंद्र सरकार के चलाए नहीं चल रहा है। ध्यान रहे अमेरिका में राजनीतिक कारणों से कई राज्य सरकारों ने वैक्सीनेशन का विरोध किया है, जिसकी वजह से अपेक्षाकृत छोटी आबादी और सारी सुविधाओं के बावजूद सिर्फ 66 फीसदी आबादी को पहली डोज लग पाई है। भारत में केंद्र के साथ साथ राज्य सरकारों ने जिम्मेदारी और प्रतिबद्धता के साथ वैक्सीनेशन अभियान में हिस्सा लिया है। स्थानीय निकायों और जन प्रतिनिधियों ने लोगों को वैक्सीनेशन के लिए प्रेरित किया। स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स ने दिन-रात मेहनत की और आम लोगों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। जो सवाल उठा रहे थे वे भी वैक्सीनेशन में शामिल हुए। प्रधानमंत्री ने खुद भी इस उपलब्धि के पीछे जन भागीदारी की बात कही। इसलिए इस उपलब्धि को आलोचनाओं का जवाब बता कर इसका महत्व कम नहीं करना चाहिए।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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