वहां की अव्यवस्था भारत जैसी नहीं!

महामारी हर देश में अव्यवस्था बनवा देती है। जब कोई बीमारी, महामारी बन कर जीवन के लिए खतरा बने तो व्यवस्था पटरी से अपने आप उतरेगी। सबकुछ गडबडा जाएगा। राष्ट्रपति, सरकार सब फेल होंगे। नई-नई दस तरह की दिक्कतों का मेस बनेगा, अव्यवस्था होगी। उस नाते कोविड़-19 की महामारी ने जनवरी से पहले दुनिया में बनी व्यवस्था, आर्डर को छिन्न-भिन्न बहुत किया है। बतौर उदाहरण यदि हम अमेरिका पर फोकस करें तो वह न केवल महामारी का सर्वाधिक मारा हुआ है बल्कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सत्ता मैस के चलते जाती हुई लगती है।

बावजूद इसके अमेरिका में वह अव्यवस्था नहीं है जो भारत में है। दुनिया के तमाम देशों और भारत का फर्क यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत सरकार, भारत के हम लोग पहले दिन से झूठ में जी रहे है। डोनाल्ड ट्रंप ने कई झूठ बोले लेकिन वहा की व्यवस्था में विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी, संसद, अमेरिकी मीडिया, वैज्ञानिक-डाक्टर, संस्थाएं और खुद ट्रंप प्रशासन भी पहले दिन से वायरस की चुनौती को नंबर एक इश्यू बनाए हुए है। महामारी का मतलब क्या होता है, इसका अर्थ अमेरिका, ब्रिटेन की व्यवस्था ने समझते हुए व्यवहार किया। दुनिया के किसी राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री, कौम ने यह मूर्खता नहीं दिखलाई कि महाभारत 18 दिनों में जीता तो इस महामारी पर 21 दिनों में विजय पा लेंगे। या महामारी को खत्म करने के लिए लोग घरों से बाहर निकल कर रात को नौ बजे नौ मिनट ताली, थाली बजा, दीया जलाएंगे तो वायरस भाग जाएगां। या यह हल्ला कि हमने दुनिया को मलेरिया की गौलियां दे कर निरोगी बना डाला।

भारत वायरस से व्यवस्था में, उसकी सत्यता से लड़ते हुए नहीं है बल्कि अंधविश्वास, तीर-तुक्के, मौके का फायदा उठाने की अराजक प्रवृति में है। दुनिया के किसी प्रधानमंत्री ने जनता को यह नहीं कहां कि महामारी अवसर है। पिछले आठ महिनों में धूल में लठ्ठ वाले भारत के तमाम प्रयोग अमेरिका-ब्रिटेन के अनुभव से मैच नहीं करते है। ब्रिटेन में इस समय वित्त मंत्री और गृह मंत्री भारतीय मूल के है। इन दोनों का व्यवहार, इनका काम, इनके पैकेज और जमीनी अनुभव-फीडबैक के अनुसार इनके द्वारा गाइडलाइन में परिवर्तन-सुधार सब व्यवस्थागत चुस्ती के अहसास के साथ है। भारत में आठ महिने से व्यवस्था नागरिकों को लगातार एक ही रूख में मूर्ख बना रही है कि वायरस नहीं है या वायरस कुछ ही जिलों, कुछ ही ऱाज्यों में है, संक्रमण खत्म हो रहा है, पीक गुजर गया, दूसरा पीक गुजरा आदि आदि। जबकि बाकि देशों की व्यवस्थाएं वायरस से लगातार लड़ते हुए है। संक्रमण बढ़ा तो फिर लॉकडाउन और सामान्य-नियंत्रित स्थिति बनी तो जनजीवन सामान्य। यदि लोगों की जान सरकार की पहली चिंता है तो हमेशा सर्वोपरि कसौटी जान बचाने की ही रहेगी। वहां यह अराजकता, यह अव्यवस्था नहीं हुई कि जब संक्रमण नहीं के बराबर तो बिना तैयारी के पूरा देश तालाबंद और जब 75 हजार, 90 हजार प्रतिदिन का संक्रमण तब भी देश अनलॉक की और बढ़ता हुआ। जाहिर है भारत में फैसले अव्यवसथा और बिना बुद्धी व समझदारी से है। तभी सब रामभरोसे है। जैसे महामारी पर एप्रोच है वैसे ही आर्थिकी में है और चीन से पंगे की चुनौती के मामले में भी है।

इसलिए भारत जैसा मेस, वैसी अव्यवस्था दुनिया में कहीं नहीं है। और इसके लिए हम सब जिम्मेवार है। लोग जिम्मेवार है तो विपक्ष और विपक्षी नेता भी। सरकार तो खैर सभी में माईबाप है।

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