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पलायन के और भी खतरे हैं

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात या केरल से प्रवासी मजदूरों के पलायन की दो तरह से व्याख्या हो रही है। पहली व्याख्या मानवीय आधार पर हो रही है। इन मजदूरों के बारे में लिखने और बोलने वाला हर आदमी भावुक हो जा रहा है। देश के अलग अलग राजमार्गों पर पैदल चल रही उनकी भीड़ को देख कर सबका हृद्य द्रवित हो रहा है। यह अलग बात है कि ये तमाम मजदूर अपनी झुग्गियों, खोलियों या कच्ची कॉलोनियों में हमेशा से ऐसी ही अमानवीय स्थितियों में रहते आए हैं, तब किसी को उन पर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझ में आई थी।

उनके पलायन की दूसरी व्याख्या कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ने के नजरिए से की जा रही है। सबको लग रहा है कि इस तरह से लाखों लोग अगर एक जगह से उठ कर दूसरी जगह पहुंचेंगे तो वे अपने साथ वायरस का संक्रमण भी ले जा सकते हैं। इसी तर्क के आधार पर इन मजदूरों के गृह राज्यों के मुख्यमंत्री इनको आने से रोक रहे हैं और इसी आधार पर इनको क्वरैंटाइन करने की व्यवस्था बनी है।

पर इन प्रवासी मजदूरों के पलायन के दूसरे पहलुओं को भी देखने की जरूरत है। यह सिर्फ एक मानवीय परिघटना नहीं है और न सिर्फ स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या है। इसके खतरे ज्यादा गहरे हैं। कम से कम तीन क्षेत्रों में यह साफ दिख रहा है। मजदूरों के पलायन से फैक्टरियों पर ताले लगें हैं और जरूरी वस्तुओं का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। दूसरे कई राज्यों में अभी रबी की फसल कटी नहीं है, उसका कटना मुश्किल में पड़ा है और तीसरा, ई-कॉमर्स को मंजूरी देने के बावजूद जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति नहीं हो पाएगी। यानी कृषि, फैक्टरी उत्पादन और आपूर्ति शृंखला तीनों पर इसका बड़ा असर होगा।

सबसे पहले कृषि संकट के बारे में सोचें। पंजाब और हरियाणा में और राजस्थान के कुछ इलाकों में भी रबी की फसल, खास कर गेहूं की कटाई होने वाली है। फसल पूरी तरह से तैयार हो चुकी है और इससे पहले ही तेज गरम हवाएं चलने लगें और बालियों में से अनाज टूट कर खेत में गिरने लगे, उसे खलिहान या फिर मंडी तक पहुंचाना जरूरी है। ध्यान रहे पंजाब और हरियाणा में खेती लगभग पूरी तरह से बिहार से आने वाले खेत मजदूरों पर निर्भर है। बड़ी संख्या में इन मजदूरों का पलायन हुआ है। सो, दोनों राज्यों में खेती-किसानी का काम संकट में फंसा है। ऐसा नहीं है कि इसका नुकसान सिर्फ किसान को होगा, बल्कि अगर समय पर अनाज मंडी में नहीं पहुंचा तो इनकी आपूर्ति भी प्रभावित होगी।

दूसरी चिंता फैक्टरी उत्पादन की है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लेकर हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात में फैक्टरियां बंद पड़ी हैं। कुछ राज्यों ने फैक्टरियों में उत्पादन शुरू कराया है और सरकार ने भी गैर आवश्यक श्रेणी में रखी गई वस्तुओं की ढुलाई की मंजूरी दे दी है। इससे फैक्टरियों में जरूरी वस्तुओं के उत्पादन के लिए कच्चा माल पहुंचना शुरू हो जाएगा। पर सवाल है कि इस कच्चे माल से जरूरी वस्तुओं का उत्पादन कैसे होगा, जब मजदूर ही नहीं होंगे? जिस तरह खेत मजदूरों का पलायन हुआ है उसी तरह पैनिक में फैक्टरी मजदूरों का भी पलायन हुआ है। अचानक हुई लॉकडाउन की घोषणा से फैक्टरी मालिक भी घबराए थे और उनको लग रहा था कि मजदूर रहे तो उन्हें बिना काम कराए पैसे देने होंगे। सो, उन्होंने भी मजदूरों को जाने दिया। अब जब फैक्टरियों में उत्पादन शुरू करने की जरूरत पड़ी तो मजदूर नहीं हैं।

तीसरा संकट आपूर्ति शृंखला का है। सरकार लगातार लोगों को भरोसा दिला रही है कि वह जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति नहीं प्रभावित होने देगी। इसके लिए हर राज्य, शहर में विशेष पास बनवाए जा रहे हैं ताकि लोगों तक जरूरी सामान पहुंचे। सरकार ने ई-कॉमर्स कंपनियों को भी ऑनलाइन ऑर्डर लेने और डिलीवरी करने की मंजूरी दी हुई है। पर सवाल है कि इनकी डिलीवरी कौन करेगा? चाहे जो भी जरूरी सामान हो- दूध, सब्जी, फल, अनाज सबकी डिलीवरी के लिए लोगों की जरूरत है। चाहे इनकी आपूर्ति खुदरा दुकानों के जरिए हो या ई-कॉमर्स कंपनियों के जरिए हो, दोनों के लिए कर्मचारियों की जरूरत है। इस काम में लगे हजारों लोग भी पलायन कर गए हैं। सो, खेत से लेकर फैक्टरी तक, उत्पादन से लेकर आपूर्ति तक पूरी चेन टूटी हुई है। संकट की इस घड़ी में इसे जोड़ना आसान नहीं होगा। यह तय मानें कि आने वाले दिनों में जरूरी सामानों की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित होगी।

यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि लॉकडाउन का जरूरी फैसला करने से पहले प्रवासी मजदूरों के बारे में विचार नहीं किया गया। उनको सबसे आसानी से पीछा छुड़ा लिए जाने वाला समूह मान कर उनकी अनदेखी की गई। यह नहीं सोचा गया कि जरूरी सामान उत्पादित करने से लेकर उनकी आपूर्ति सुनिश्चित करने तक की शृंखला में एक अहम कड़ी ये मजदूर हैं। इनका पलायन शुरू होने के बाद भी जो आरंभिक प्रतिक्रिया थी वह सिर्फ इस पर आधारित थी कि इससे संक्रमण फैल सकता है। बाकी पहलुओं का पता तो अब धीरे धीरे लग रहा है। तब सरकारों से लेकर निजी कंपनियों तक की चिंता बढ़ी है। अगले कुछ दिनों में कई चीजों पर इसका असर देखने को मिल सकता है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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